राजनीति

कीट-पतंगों के नाम पर सजी सियासी बिसात: ‘कॉकरोच’ के बाद ‘चींटी’ जनता पार्टी का उदय

ओ.पी. पाल 
भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में आंदोलनों और राजनीतिक दलों के गठन की एक लंबी और गौरवशाली परंपरा रही है। आम तौर पर किसी राजनीतिक दल की नींव दशकों के जमीनी संघर्ष, वैचारिक मंथन या किसी बड़े सामाजिक असंतोष से पड़ती है। भारतीय राजनीतिक के इतिहास में किसी राजनीतिक आंदोलन में देश, समाज, धर्म, जाति या मजहब, सांस्कृतिक आदि के नाम पर राजनीतिक पार्टी बनाई गई है,  लेकिन शायद देश में यह पहला मौका हो सकता  है, जब हाल ही में कीट पतंगों के नाम से भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसी अनूठी और अभूतपूर्व घटना देखने को मिली, जिसने पारंपरिक राजनीति के पंडितों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। हम बात कर रहे हैं राजनीतिक संचार रणनीतिकार अभिजीत दिपके की कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के जन्म की, जो भले ही एक अदालत कक्ष से निकली नाराजगी और इंटरनेट की दुनिया के एक मजाक से हुआ हो, लेकिन आज यह भारत की जर्जर हो चुकी शिक्षा व्यवस्था और बेरोजगारी के खिलाफ एक मजबूत हुंकार बन सकती है। हालांकि कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के तत्काल बाद ही मेरठ के एक भाजपा नेता और अधिवक्ता अनूप राघव ने चींटी जनता पार्टी की नींव रख दी है। अब देखना है कि जमीन पर रेंगने वाले कीट-पतंगों के नाम से सियासी रणनीति देश के बदलते परिवेश में क्या भविष्य की राजनीति में कोई नया अध्याय जोड़ पाएंगी?

इंटरनेट मीम से उपजा यह जन-आंदोलन कॉकरोच मास्क पहने जंतर-मंतर पर खड़ा वह युवा इस बात के प्रतीक नजर आया, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी वर्ग की आवाज को दबाया या उपेक्षित नहीं किया जा सकता। सात दिनों के अल्टीमेटम के बाद के बाद सीजेपी की रणनीति यह तय करेगी कि यह आंदोलन भारतीय राजनीति में कोई स्थायी बदलाव ला पाता है या केवल एक अल्पकालिक डिजिटल बवंडर बनकर रह जाता है। हालांकि यह जनाक्रोश छात्रों की समस्याओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग तक ही सीमित  नजर आया। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ तो यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या दीपके अमेरिका से केवल शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेने ही भारत पहुंचे। हालांकि सीजेपी के समर्थन में मंच पर पर्यावरण आंदोलन से जुड़े सोनम वांगचुक ने चुटकी लेते हुए कहा कि इस्तीफा छात्रों की समस्या का समाधान नहीं है, इसके लिए जब तक जनप्रतिधियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण नहीं करते, यह शैक्षिक व्यवस्था बदलने वाली नहीं है। फिर भी माना जा रहा है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने देश के नीति-नियंताओं को यह साफ संदेश दे दिया है कि युवाओं को ‘कॉकरोच’ समझने की भूल कतई न की जाए क्योंकि ये वो तिलचट्टे हैं जो व्यवस्था की हर मार को झेलकर भी अपने अधिकारों के लिए रेंगना और लड़ना बंद नहीं करेंगे।

एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन
सोशल मीडिया के गलियारो से 16 मई 2026 में शुरू हुआ यह आंदोलन मात्र कुछ ही हफ्तों में डिजिटल स्क्रीन की सीमाओं को लांघकर देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर की सड़कों पर एक विशाल छात्र और युवा विरोध प्रदर्शन के रूप में तब्दील हो गया। हालांकि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) कोई चुनाव आयोग द्वारा पंजीकृत पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं है बल्कि यह देश के युवाओं, विशेषकर ‘जेन-जी’ पीढ़ी का एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन है। इस अनूठी पार्टी के जन्म, इसके पीछे के कारणों, इसकी कार्यशैली, विचारधारा और भारतीय राजनीति व शिक्षा व्यवस्था पर इसके प्रभाव का एक विस्तृत विश्लेषण किया जाए, तो अभिजीत दिपके जो पहले अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ के साथ काम कर चुके हैं, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल की व्यवस्था को लेकर एक दशक तक दिल्ली की सत्ता में रही है। शायद आप से प्रेरित होकर ही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) की स्थापना की गई। अब सवाल सामने है कि क्या चुनाव आयोग इस पार्टी को पंजीकरण कराने में आगे आएगा। हालांकि जंतर मंतर पर आंदोलनों को संकुचित किया जा चुका है, लेकिन छह मई शनिवार को सरकार या पुलिस प्रशासन की तरफ से इतनी नरमी बरती गई की, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने सहजता से अनुमति दे दी गई, जिसके लिए सुरक्षा और कानून व्यवस्था की दृष्टि से भी पुख्ता इंतजाम रहे।

इस टिप्पणी ने युवाओं में भरा जोश
दरअसल कॉकरोच जनता पार्टी की नींव एक ऑनलाइन अभियान के रूप में तब पड़ी, जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा एक सुनवाई के दौरान के दौरान यह टिप्पणी करते हुए कथित तौर पर कुछ ऐसे युवाओं का जिक्र किया, जिन्हें रोजगार नहीं मिलता या पेशे में जगह नहीं मिलती और उनकी तुलना ‘कॉकरोच’ (तिलचट्टे) से कर दी, जो आगे चलकर सोशल मीडिया एक्टिविस्ट या पत्रकार बन जाते हैं। इस टिप्पणी ने देश के उन लाखों शिक्षित बेरोजगार युवाओं और छात्रों की दुखती रग पर हाथ रख दिया, जो सालों से प्रतियोगी परीक्षाओं, नौकरी के अवसरों और एक बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। युवाओं ने इस अपमानजनक तुलना को सहने के बजाय इसे ही अपनी ताकत और पहचान बनाने का फैसला किया। इस आक्रोश को राजनीतिक संचार रणनीतिकार अभिजीत दिपके एक संगठित रूप दिया और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) की स्थापना कर डाली। उन्होंने कॉकरोच (तिलचट्टे) को ही इस आंदोलन का शुभंकर बना दिया। इसके पीछे का दर्शन यह था कि कॉकरोच एक ऐसा जीव है जो बेहद विपरीत परिस्थितियों में, यहाँ तक कि परमाणु विस्फोट में भी जीवित रह सकता है। उसे कुचला जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता। इसी तरह, देश का युवा भी राजनीतिक और आर्थिक उपेक्षा के बावजूद डटकर खड़ा रहेगा। सीजेपी की यह विकास यात्रा किसी चमत्कार से कम नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, विशेष रूप से इंस्टाग्राम पर, इस पैरोडी और व्यंग्यात्मक अकाउंट ने कुछ ही दिनों में लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए इस मामले में भारत के कई स्थापित राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के सोशल मीडिया फॉलोअर्स को भी बौना कर दिया।

सोशल मीडिया पर चली जंग
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने तो सार्वजनिक रुप से यहां तक दावा किया इस तूफानी उभार को दबाने की कोशिशें की गई, जिसमें उन्होंने व्यक्तिगत और पार्टी के इंस्टाग्राम अकाउंट्स को हैक करने के प्रयास और उन्हें ऑनलाइन धमकियाँ मिलने का भी आरोप लगाया। इस आंदोलन के शुरुआती हफ्तों में उनका ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया। शायद इसी वजह से इस व्यंग्यात्मक आंदोलन की धार इतनी तेज चली कि मुख्यधारा के कई राजनेताओं ने भी इसे अपनी अनौपचारिक स्वीकृति दी। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा और कीर्ति आज़ाद, वामपंथी छात्र संगठनों और सीपीआई (एमएल) के दीपांकर भट्टाचार्य व एनी राजा जैसे नेताओं ने इसके मीम्स और मांगों को शेयर कर युवाओं के इस डिजिटल विद्रोह का समर्थन किया। विपक्ष के परोक्ष समर्थन के सहारे ही पार्टी ने खुद को मजाकिया लहजे में आलसी और बेरोजगारों की आवाज घोषित किया। लेकिन इस मजाक के पीछे बेहद गंभीर और तीखे सवाल छिपे थे। सीजेपी की वेबसाइट पर जारी किए गए घोषणापत्र और पोस्ट्स में मोदी सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार किया गया है। जिसमें देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट) और अन्य भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को सीजेपी ने अपना सबसे प्रमुख मुद्दा बनाया गया है। वहीं डिग्री होने के बावजूद युवाओं को रोजगार न मिलने और सरकार द्वारा नए पदों पर भर्तियां न निकालने को लेकर तीखे व्यंग्य बाण छोड़े गए। सीजेपी की मांगों में देश में घटती प्रेस स्वतंत्रता और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को संसद या अन्य सरकारी पदों पर नियुक्त करने की परंपरा पर गंभीर सवाल उठाए गए। सीजेपी ने सत्ता पक्ष द्वारा की जाने वाली मजहबी की राजनीति को पूरी तरह खारिज करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे वास्तविक जन-मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की मांग की।
कॉकरोच के जवाब में आई चींटी
देश की राजनीतिक बिसात पर समय-समय पर बेहद अनूठे और अतरंगे प्रयोग देखने को मिलते रहे हैं। इसी कड़ी में अब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के जवाब में क्रांतिधरा मेरठ से ‘चींटी जनता पार्टी’ (सीजेपी) का उदय हुआ है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व नेता और अधिवक्ता अनूप राघव ने इस नए दल की आधिकारिक नींव रखी है। उनका दृढ़ दावा है कि जिस तरह साल 1857 में देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नींव मेरठ शहर से रखी गई थी, ठीक उसी तरह देश से भ्रष्टाचार के खात्मे की शुरुआत भी इसी ऐतिहासिक शहर से होगी और यह भगीरथ काम ‘चींटी जनता पार्टी’ पूरी ईमानदारी से करेगी। राघव का तर्क है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का गठन देश विरोधी मानसिकता के लोगों ने किया है, जिसके करारे जवाब में उन्होंने देश के ईमानदार और राष्ट्रप्रेमी लोगों के लिए ‘चींटी जनता पार्टी’ (सीजेपी) को धरातल पर उतारा है। राघव के अनुसार, चींटी का मूल स्वभाव बिना थके, लगातार और पूरी ईमानदारी से काम करना होता है और वह सामूहिक शक्ति से अपनी राह में आने वाली बड़ी से बड़ी बाधाओं को भी हटा देती है; उनकी नई पार्टी भी इसी सिद्धांत को अपनाकर आगे बढ़ेगी।

 ओ.पी. पाल