राजनीति

अवैध मतांतरण की समस्या से सख्ती से निपटने की जरूरत

 संदर्भ : मध्यप्रदेश में सरकारी कर्मचारी करा रहे हैं धर्मांतरण
प्रमोद भार्गव
  मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार धर्मांतरण कर ईसाई बने सरकारी कर्मचारियों द्वारा लगातार अशिक्षित और गरीब आदिवासियों को प्रलोभन देकर मतांतरित कराने के मामले सामने आ रहे हैं। हाल ही में शिवपुरी जिले के पटवारी और शिक्षकों द्वारा भील आदिवासियों का मतांतरण कराने का बड़ा मामला सामने आया है। जिला प्रशासन और पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एक पटवारी, दो सरकारी शिक्षिकाएं, एक शिक्षक और चर्च के पादरी को धर्म परिवर्तन में लिप्त पाए जाने पर अपराध दर्ज कर गिरफ्तार तो किया ही सभी को निलंबित भी कर दिया। अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया। यह कार्यवाही ग्राम गुडाल डांग के सरपंच की शिकायत पर की गई। अवैध रूप से बनाई गई चर्च को भी जमींदोज कर दिया। गरीब भील आदिवासियों को 25-25 हजार रुपए का लालच देकर धर्मांतरित किया गया था। मध्यप्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 की धारा 3-5 के तहत पंजीबद्ध मामले में दोश सिद्ध होने पर 2 से लेकर 10 साल तक की सजा और 50 हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।
छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण का खेल बहुत बड़े पैमाने पर चल रहा है। मुख्यमंत्री विश्णुदेव साय मतांतरण की समस्या से निपटने के लिए एक कड़ा कानून लाने की तैयारी में हैं। इसके तहत दोहरा लाभ ले रहे मतांरित अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को सरकारी योजनाओं के लाभ से बाहर रखने के प्रविधान रखे जाएंगे। दरअसल इस राज्य में अवैध मतांतरण ने गंभीर समस्या उत्पन्न कर दी है। यह प्रविधान हो जाता है तो, जिस तरह से संवैधानिक व्यवस्था के चलते मतांतरण की स्थिति में अनुसूचित जातियों (एससी) के लोग आरक्षण सहित लोक कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हो जाते हैं, उसी तरह जनजातियों के लोग भी वंचित होने लग जाएंगे। जबकि ईसाई या मुस्लिम बने आदिवासी न केवल एसटी वर्ग का लाभ ले रहे हैं, बल्कि ईसाई के रूप में अल्पसंख्यक वर्ग की योजनाओं का भी लाभ उठा रहे हैं। राज्य सरकार इस कानूनी विसंगति को कठोर कानून बनाकर दूर करना चाहती है। इस प्रस्तावित विधेयक में बिना सूचना के मत परिवर्तन करने या कराने पर 10 वर्श तक की सजा का प्रावधान किया जा सकता है। यह कानून छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 1968 की जगह लेगा।    
एक  आदिवासी नेता हुए हैं बाबा कार्तिकउरांव ! वे हमेशा हिंदुत्व के पक्षधर रहे और धर्मांतरित आदिवासियों को आरक्षण देने का विरोध करते रहे। बाबा कार्तिक उरांव तीन बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। जीवन के अंतिम समय में वे नागरिक उड्डयन एवं संचार मंत्री थे। उरांव अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। गुमला से मैट्रिक करने के बाद, वे ठक्कर बाप्पा के आश्रम में चले गए। उन्हीं की प्रेरणा से उरांव ने अभियांत्रिकी की कई डिग्रियां प्राप्त कीं। वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए। वहां उन्होने नौ वर्ष बिताए। विश्व के सबसे बड़े नाभिकीय ऊर्जा का प्रारूप उन्होंने ही बनाया था, जो आज हिंकले न्यूक्लियर पावर प्लांट के नाम से जाना जाता है। इंग्लैंड में उनकी भेंट  जवाहरलाल  नेहरू से हुई, उन्हीं के आग्रह पर वे भारत लौटे। यहाँ भारी अभियांत्रिकी निगम में काम करने लगे। 1962 में कांग्रेस के आग्रह पर, उन्होंने तत्कालीन बिहार के लोहरदगा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन स्वतंत्र पार्टी के डेविड मुंजनी से मात्र 17000 वोटों से हार गए। 1967 में फिर से उन्होंने कांग्रेस की टिकट पर लोहरदगा से चुनाव लड़ा और वे सांसद बने। 1977 की जनता लहर का अपवाद छोड़ दें, तो अपनी मृत्यु (1981) तक वे लोहरदगा का प्रतिनिधित्व लोकसभा में करते रहे। 8 दिसंबर 1981 को संसद भवन में ही दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई थी। तब वे केंद्रीय उड्डयन और संचार मंत्री थे।
वनवासियों के ईसाई धर्मांतरण से वे क्षुब्ध थे। इसलिए 1967 में वे संसद में ‘अनुसूचित जाति एवं जनजाति आदेश संशोधन विधेयक-1967‘ लाए । इस विधेयक पर संसद की संयुक्त समिति ने बहुत छानबीन की और 17 नवंबर 1969 को अपनी सिफारिशें दीं। इनमें प्रमुख सिफारिश थी, कोई भी आदिवासी व्यक्ति, जिसने जनजाति आदिवासी  मत तथा विश्वासों का परित्याग कर दिया हो और ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया हो, वह अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं समझा जाएगा और न ही वह आदिवासियों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं का पात्र रह जाएगा। अर्थात धर्म परिवर्तन करने के पश्चात उस व्यक्ति को अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत मिलने वाली सुविधाओं से वंचित होना पड़ेगा। संयुक्त समिति की सिफारिश के बावजूद, एक वर्ष तक इस विधेयक पर संसद में बहस ही नहीं हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर ईसाई मिशनरियों का जबरदस्त दबाव था कि इस विधेयक का विरोध करें। ईसाई मिशन के प्रभाव वाले 50 संसद सदस्यों ने इंदिरा गांधी को पत्र दिया कि इस विधेयक को खारिज कर दें । कांग्रेस में रहते हुए इस मुहिम के विरोध में अपने राजनीतिक भविष्य को दांव पर लगाकर कार्तिक उरांव ने 10 नवंबर को 322 लोकसभा सदस्य और 26 राज्यसभा सदस्यों के हस्ताक्षरों का एक पत्र इंदिरा गांधी को दिया, जिसमें यह जोर देकर कहा गया था की वे विधेयक की सिफारिशों का स्वीकार करें, क्योंकि यह तीन करोड़ वनवासियों के जीवन-मरण का प्रश्न हैं। किंतु ईसाई मिशनरियों के दबाव में इस विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल दिया। आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ सरकार इन्हीं कार्तिक उरांव की प्रेरणा से इस विसंगति को दूर करने की तैयारी में है।
      झारखंड से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और मध्य-प्रदेश के ढालसिंह बिसेन ने संसद में कहा था कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन का चलन लगातार बढ़ रहा हैं। दरअसल संविधान के अनुच्छेद-342 में धर्म परिवर्तन के संबंध में अनुच्छेद-341 जैसे  प्रावधान में लोच है। 341 में स्पष्ट है कि अनुसूचित जाति (एससी) के लोग धर्म परिवर्तन करेंगे तो उनका आरक्षण समाप्त हो जाएगा। इस कारण यह वर्ग धर्मांतरण से बचा हुआ है। जबकि 342 के अंतर्गत संविधान निर्माताओं ने जनजातियों के आदि मत और पुरखों की पारंपरिक सांस्कृतिक आस्था को बनाए रखने के लिए व्यवस्था की थी कि अनुसूचित जनजातियों को राज्यवार अधिसूचित किया जाएगा। यह आदेश राष्ट्रपति द्वारा राज्य की अनुशंसा पर दिया जाता है। इस आदेश के लागू होने पर उल्लेखित अनुसूचित जनजातियों के लिए संविधान सम्मत आरक्षण के अधिकार प्राप्त होते हैं। इस आदेश के लागू होने के उपरांत भी इसमें संशोधन का अधिकार संसद को प्राप्त है। अनुच्छेद 341 के अनुसार अनुसूचित जातियों के वही लोग आरक्षण के दायरे में हैं, जो भारतीय धर्म हिंदू, बौद्ध और सिख अपनाने वाले हैं। गोया, अनुच्छेद-342 में 341 जैसे प्रावधान हो जाते हैं, तो अनुसूचित जनजातियों में धर्मांतरण की समस्या पर स्वाभाविक रूप से अंकुश लग जाएगा।          
संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, जाति,लिंग और जन्म स्थान के आधार पर राष्ट्र किसी भी नागरिक के साथ पक्षपात नहीं कर सकता। इस दृष्टि से संविधान में विरोधाभास भी हैं। संविधान के तीसरे अनुच्छेद, अनुसूचित जाति आदेश 1950, जिसे प्रेसिडेंशियल ऑर्डर के नाम से भी जाना जाता है, के अनुसार केवल हिंदू धर्म का पालन करने वालों के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं माना जाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में अन्य धर्म समुदायों के दलित और हिंदू दलितों के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा है, जो समता और सामाजिक न्याय में भेद करती है। इसी तारतम्य में पिछले 60 सालों से दलित ईसाई और दलित मुसलमान संघर्षरत रहते हुए हिंदू अनुसूचित जातियों को दिए जाने वाले अधिकारों की मांग करते चले आ रहे हैं। इस बाबत रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट ने इस भेद को दूर करने की पैरवी की थी। लेकिन संविधान में संशोधन के बिना यह संभव नहीं था। 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा था कि एक बार जब कोई व्यक्ति हिंदु धर्म या मत छोड़कर ईसाई या इस्लाम धर्मावलंबी बन जाता है तो हिंदु होने के चलते उसके सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से कमजोर होने की अयोग्ताएं समाप्त हो जाती हैं। लिहाजा उसे संरक्षण देना जरूरी नहीं है। इस लिहाज से उसे अनुसूचित जाति का व्यक्ति भी नहीं माना जाएगा। अतएव मतांतरण रोकने के लिए इस तरह का कानून अब छत्तीसगढ़ में ही नहीं पूरे देश के लिए संसद के माध्यम से लाना अनिवार्य हो गया है।      

प्रमोद भार्गव