विधि-कानून समाज

सह-अस्तित्व की तलाश: अदालती आदेशों और जमीनी हकीकत के बीच आखिर कैसे रेबीज-मुक्त और सुरक्षित बनेंगे हमारे शहर ?

-सुनील कुमार महला 

हाल ही में हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा और खूंखार कुत्तों की बढ़ती समस्या पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए यह बात कही है कि मानव जीवन और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है।यहां यह बात बिल्कुल सही है कि सदियों सदियों से मनुष्य का सबसे वफादार जानवर सामान्यतः कुत्ते को माना जाता रहा है।न जाने कितनी सदियों से कुत्ता मनुष्य का साथी, रक्षक और सहायक रहा है। यही कारण है कि उसे मनुष्य का सबसे अच्छा मित्र कहा जाता रहा है।हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में भी कुत्ते को केवल और केवल एक पशु के रूप में नहीं, बल्कि निष्ठा, सुरक्षा और सतर्कता के प्रतीक के रूप में देखा गया है। यहां तक कि हमारे देश के प्राचीन ग्रंथों, विभिन्न लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं में तक कुत्ते का उल्लेख अनेक रूपों में मिलता है।पाठक जानते होंगे कि महाभारत में एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है, जब पांडवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर स्वर्ग की यात्रा पर जाते समय अपने साथ चल रहे कुत्ते को छोड़ने से मना कर देते हैं। अंत में वही कुत्ता धर्मराज का रूप धारण करता है। महाभारत की यह कथा वफादारी, करुणा और धर्मपालन का संदेश देती है।इतना ही नहीं, भारतीय परंपरा में भैरव के वाहन के रूप में भी कुत्ते का उल्लेख मिलता है। कई स्थानों पर काल भैरव मंदिरों में कुत्तों को भोजन कराना शुभ माना जाता है। भारतीय संस्कृति में भैरव के वाहन के रूप में भी कुत्ते का उल्लेख मिलता है। इसलिए कई लोग भैरव उपासना के साथ कुत्तों की सेवा को पुण्य का कार्य मानते हैं।और तो और भारतीय ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में शनि देव तथा कुत्ता का विशेष संबंध माना जाता है। हमारे यहां यह मान्यता है कि काले कुत्ते को भोजन कराना, उसकी सेवा करना या उसे रोटी खिलाना शनि दोष को शांत करने में सहायक होता है। विशेष रूप से शनिवार के दिन कुत्ते को तेल लगी रोटी, दूध या भोजन देने की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है। ज्योतिष शास्त्र में कुत्ते को राहु-केतु और शनि से भी जोड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि कुत्तों के प्रति दया और सेवा भाव रखने से नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं तथा जीवन में बाधाएं घटती हैं। हालांकि, ये धार्मिक और लोकमान्यताएं हैं, जिनका आधार आस्था और परंपरा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि भारतीय संस्कृति में यह भावना केवल ज्योतिष तक सीमित नहीं, बल्कि जीवों के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व की सीख भी देती है। ग्रामीण भारत में आज भी कुत्ते को घर और पशुधन का रक्षक माना जाता है। सामान्य लोकजीवन में भी कुत्ते को लेकर दो प्रकार की छवियां दिखाई देती हैं। एक ओर उसकी वफादारी और सजगता की प्रशंसा की जाती है, वहीं दूसरी ओर कुछ मुहावरों और कहावतों में उसे नकारात्मक रूप में भी प्रस्तुत किया गया है। वास्तव में, यह भारतीय समाज की विविध मानसिकताओं को दर्शाता है। आधुनिक समय में तो सुरक्षा, पुलिस सेवा, सेना और आपदा राहत कार्यों में प्रशिक्षित कुत्तों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। सच तो यह है कि पुलिस, सेना और बचाव कार्यों में भी कुत्तों का उपयोग उनकी निष्ठा, सूंघने की क्षमता और प्रशिक्षण ग्रहण करने की योग्यता के कारण किया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में कुत्ता केवल पालतू जानवर नहीं, बल्कि मनुष्य का विश्वसनीय साथी और सहायक भी है। हमारे यहां कुत्ते की वफादारी के अनेक उदाहरण मिलते हैं।वह अपने मालिक की रक्षा के लिए अपनी जान तक जोखिम में डाल देता है, घर की चोरों से रखवाली करता है, संकट आने पर चेतावनी देता है और भावनात्मक रूप से भी मनुष्य से गहरा जुड़ाव बना लेता है। हालांकि, यह बात अलग है कि वफादारी केवल कुत्तों तक सीमित नहीं है। घोड़ा, हाथी और कुछ अन्य जानवर भी अपने मालिक या समूह के प्रति अत्यंत निष्ठावान माने जाते हैं। फिर भी आम धारणा और अनुभव के आधार पर कुत्ता सबसे वफादार जानवर माना जाता है।

बहरहाल, माननीय अदालत(सुप्रीम कोर्ट) ने यह स्पष्ट किया कि हर आवारा कुत्ता खतरनाक नहीं होता, इसलिए कुत्तों की बड़े पैमाने पर या अंधाधुंध हत्या किसी भी सभ्य समाज का समाधान नहीं हो सकती है, लेकिन यदि कोई कुत्ता रेबीज से संक्रमित हो, और लगातार लोगों पर हमला कर रहा हो अथवा बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए गंभीर खतरा बन चुका हो, तो कानून के अनुसार नियंत्रित यूथेनेशिया अर्थात इच्छामृत्यु जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। दरअसल भारत में यह समस्या केवल पशु-कल्याण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी अव्यवस्था और प्रशासनिक विफलता का बड़ा प्रश्न बन चुकी है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में बड़े बड़े शहरों और अनेक कस्बों में खुले कचरे के ढेर, अधूरे नसबंदी अभियान, अपर्याप्त टीकाकरण और कुत्तों के लिए शेल्टरों(आश्रय स्थलों ) की भारी कमी ने आवारा कुत्तों की संख्या को तेजी से बढ़ाया है। परिणामस्वरूप डॉग-बाइट, रेबीज संक्रमण और बच्चों पर हमलों की घटनाओं ने आम नागरिकों में भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा कर दिया है। हाल फिलहाल,यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि दुनिया के कई देशों ने इस चुनौती(कुत्तों की समस्या) से निपटने के लिए कठोर लेकिन संतुलित व्यवस्थाएं विकसित की हैं। इस संदर्भ में नींदरलैंड को दुनिया के सबसे सफल उदाहरणों में गिना जाता है। जानकारी मिलती है कि वहां सरकार ने समय-समय पर बड़े पैमाने पर कुत्तों की नसबंदी के अभियान चलाए हैं।नींदरलैंड में पालतू कुत्तों का अनिवार्य पंजीकरण किया गया है और पशुओं को सड़क पर छोड़ने वालों पर भारी आर्थिक दंड भी लगाए गए हैं। जानकारी के अनुसार वहां प्रत्येक पालतू कुत्ते का रिकॉर्ड रखा जाता है, इसलिए आवारा कुत्तों की समस्या लगभग समाप्त हो चुकी है। इसी प्रकार से यूनाइटेड किंगडम में स्थानीय परिषदों के अधीन एनीमल कंट्रोल सिस्टम कार्य करता है। वहां पर आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टरों में रखा जाता है। इतना ही नहीं, उनके(कुत्तों के) मालिकों की पहचान माइक्रोचिप से की जाती है और यदि कोई कुत्ता अत्यधिक हिंसक या लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो, तभी यूथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) की अनुमति दी जाती है। यूनाइटेड स्टेट्स में भी लाइसेंसिंग, रेबीज टीकाकरण और माइक्रोचिप व्यवस्था अत्यंत सख्त है। वहां एनीमल शेल्टर्स तथा डॉग पाउंड्स का बड़ा नेटवर्क है, जहां आवारा कुत्तों की देखभाल की जाती है। बार-बार हिंसक व्यवहार करने वाले कुत्तों के लिए विशेषज्ञों की निगरानी में अलग प्रबंधन होता है।इसी प्रकार से जापान में भी पालतू पशुओं के प्रति अनुशासन इतना कठोर है कि किसी कुत्ते को सड़क पर छोड़ देना सामाजिक अपराध माना जाता है। वहीं टर्की ने सामुदायिक देखभाल मॉडल को अपनाया है, जहां कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें चिह्नित कर वापस छोड़ा जाता है, हालांकि वहां भी बढ़ती संख्या को लेकर बहस जारी है।

यहां पर यह कहना ग़लत नहीं होगा कि हमारे देश भारत में आवारा कुत्तों की समस्या इस समय एक बेहद संवेदनशील और जटिल मोड़ पर है। एक तरफ नागरिकों की सुरक्षा और मानवाधिकार (विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा) हैं, तो दूसरी तरफ पशु कल्याण और जीव दया। हाल ही में,​सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में इस पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि संविधान का अनुच्छेद 21 नागरिकों को बिना किसी डर के सार्वजनिक स्थानों पर घूमने का अधिकार देता है। कोर्ट ने स्थानीय प्रशासन की सुस्ती पर नाराजगी जताई और कुछ बेहद महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। यहां पाठकों को बताता चलूं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में भी कुत्तों को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी किए थे। उस समय कोर्ट ने स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, खेल परिसर, रेलवे स्टेशन, बस डिपो और एयरपोर्ट जैसे हाई-फुटफॉल (अत्यधिक भीड़भाड़ वाले) जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को तुरंत हटाने के आदेश दिए थे। कोर्ट ने साफतौर पर कहा था कि इन चुनिंदा सार्वजनिक/संस्थानिक जगहों से पकड़े गए कुत्तों को नसबंदी  या टीकाकरण के बाद वापस उसी जगह नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि उन्हें ‘डेजिग्नेटेड शेल्टर्स’ (निर्धारित आश्रय स्थलों) में रखा जाएगा। अब कोर्ट ने अपने नवंबर 2025 के आदेश को बरकरार रखते हुए और कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं और यह बात कही है कि यदि कोई कुत्ता ‘रेबीज’ से पीड़ित है, लाइलाज है, या प्रमाणित तौर पर बेहद आक्रामक/खतरनाक है, तो पशु चिकित्सकों की जांच के बाद उसे कानूनी रूप से इच्छामृत्यु(यूथेनेशिया)दी जा सकती है। इतना ही नहीं,देश के सभी हाई कोर्ट्स को आदेश दिया गया है कि वे अपने राज्यों में इन नियमों के पालन की खुद निगरानी करें। साथ ही साथ,लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर अवमानना की कार्रवाई किए जाने की बात कही है। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि इस समस्या का व्यावहारिक समाधान कैसे हो सकता है ? तो इसका सीधा सा और सटीक उत्तर यह है कि हमारे देश में  आवारा कुत्तों की समस्या के व्यावहारिक समाधान के लिए ‘इंसान बनाम जानवर’ के दृष्टिकोण को बदलकर एक वैज्ञानिक और संतुलित रणनीति अपनानी होगी। कहना ग़लत नहीं होगा कि इसके तहत सबसे पहला कदम सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट (कचरा प्रबंधन) को दुरुस्त करना है, क्योंकि सड़कों पर खुले में फेंका गया मांस और जूठा भोजन ही कुत्तों की आबादी और उनकी आक्रामकता को बढ़ाता है।यदि भोजन के यह स्रोत बंद हो जाएं, तो उनकी संख्या स्वाभाविक रूप से नियंत्रित होने लगेगी। इसके साथ ही, स्थानीय नगर निकायों को केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर एनीमल बर्थ कंट्रोल(एबीसी) नियमों को कड़ाई से लागू करना होगा,जिसके तहत हर वार्ड में बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक नसबंदी और रेबीज-मुक्त टीकाकरण अभियान चलाये जाने की आवश्यकता महत्ती है। नियमों को लागू करने से ही बात नहीं बनेगी, स्थानीय नगर निकायों को इसकी अनुपालना सुनिश्चित करवानी होगी। इतना ही नहीं,प्रशासनिक स्तर के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर भी बदलाव की आवश्यकता है‌। आवासीय या रिहायशी इलाकों में ‘डेजिग्नेटेड फीडिंग ज़ोन’ (निर्धारित भोजन स्थल) तय करने की आवश्यकता है, ताकि आम नागरिकों (विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों) की सुरक्षा से समझौता किए बिना कुत्तों को भोजन मिल सके, जैसा कि भूखे कुत्ते अधिक हिंसक होते हैं। माननीय सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के अनुसार, स्कूलों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे अत्यधिक भीड़भाड़ वाले संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों से कुत्तों को हटाकर सरकार और एनजीओ (गैर-सरकारी संस्थाओं) के सहयोग से बने सर्वसुविधायुक्त शेल्टर होम्स में स्थानांतरित किये जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा, विदेशी नस्लों को खरीदने के बजाय स्थानीय ‘इंडी’ कुत्तों को गोद लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर और सोसायटियों द्वारा उन्हें ‘कम्युनिटी पेट’ के रूप में अपनाने से समाज में इस टकराव को हमेशा के लिए कम किया जा सकता है। इसके साथ ही समय-समय पर सार्वभौमिक एंटी-रेबीज टीकाकरण अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि भारत आज भी विश्व में रेबीज से सबसे अधिक प्रभावित देशों में गिना जाता है।साथ ही पालतू पशु रखने वालों के लिए अनिवार्य पंजीकरण, माइक्रोचिप और जिम्मेदारी तय करने वाले कानूनों को सख्ती से लागू करना होगा।

असल में यह मुद्दा ‘मनुष्य बनाम पशु’ का नहीं, बल्कि संतुलन और संवेदनशीलता का है। मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च है, लेकिन पशुओं के प्रति करुणा भी सभ्य समाज(विशेषकर भारतीय संस्कृति के संदर्भ में) की पहचान मानी जाती है। इसलिए आवश्यकता न तो अंधी हिंसा की है और न ही अव्यावहारिक भावुकता की, बल्कि ऐसी व्यावहारिक नीति की है, जिसमें वैज्ञानिक प्रबंधन, कठोर प्रशासन और मानवीय दृष्टिकोण तीनों का समन्वय हो। माननीय सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी भी मूलतः इसी संतुलन की ओर संकेत करती है कि सड़कों पर भय और अव्यवस्था नहीं, बल्कि सुरक्षित और व्यवस्थित सह-अस्तित्व स्थापित होना चाहिए।