लेख

लोकतंत्र की असली ताकत: जागरूक मतदाता

-बाबूलाल नागा

   भारत में राष्ट्रीय मतदाता दिवस प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी को मनाया जाता है। विश्व में भारत जैसे सबसे बड़े लोकतंत्र में मतदान को लेकर कम होते रुझान को देखते हुए राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाने लगा था। पहली बार इसे वर्ष 2011 में मनाया गया। मतदान दिवस मनाने का मुख्य कारण है कि लोगो को मतदान का महत्व बताया जाए ताकि लोग इसके प्रति जागरूक हो और सही उम्मीदवार को चुने जिससे हमारे देश का विकास एक अवरुद्ध दिशा में चल सके। यह दिवस भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए अहम है। इस दिन भारत के प्रत्येक नागरिक को अपने राष्ट्र के प्रत्येक चुनाव में भागीदारी की शपथ लेनी चाहिए, क्योंकि भारत के प्रत्येक व्यक्ति का वोट ही देश के भावी भविष्य की नींव रखता है। इसलिए हर एक व्यक्ति का वोट राष्ट्र के निर्माण में भागीदार बनता है।

   राष्ट्रीय मतदाता दिवस भारतीय लोकतंत्र की उस बुनियाद को याद करने का अवसर है, जिस पर पूरा संवैधानिक ढांचा टिका है। यह दिन केवल मतदाता पहचान पत्र या मतदान प्रतिशत की चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि उस लोकतांत्रिक चेतना को जगाने का प्रयास है, जिसके बिना लोकतंत्र केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है। भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में मतदाता केवल एक संख्या नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा होता है।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाकर दुनिया को चौंकाया था। अशिक्षा, गरीबी और संसाधनों की सीमाओं के बावजूद देश ने यह भरोसा जताया कि उसका आम नागरिक अपने मत के माध्यम से सही निर्णय लेने में सक्षम है। यही विश्वास भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत बना। राष्ट्रीय मतदाता दिवस उसी ऐतिहासिक भरोसे को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और उसे जीवंत बनाए रखने का माध्यम है।

   आज मतदान की प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक सरल और सुलभ हो चुकी है, लेकिन मतदाता का विवेक पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। सूचना क्रांति के इस दौर में सच और झूठ के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। सोशल मीडिया, अफवाहें, भ्रामक प्रचार और नफरत की राजनीति मतदाता की सोच को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं। ऐसे समय में राष्ट्रीय मतदाता दिवस हमें आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है कि क्या हम अपने मत का उपयोग विवेक और तथ्य के आधार पर कर रहे हैं या केवल भावनाओं और पूर्वाग्रहों के सहारे।

भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में युवाओं की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। हर चुनाव के साथ लाखों नए मतदाता सूची में जुड़ते हैं। पहली बार मतदान करने वाला युवा केवल एक वोटर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की भविष्य दिशा तय करने वाला नागरिक होता है। राष्ट्रीय मतदाता दिवस का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य युवाओं को यह एहसास कराना है कि राजनीति से दूरी बनाना समाधान नहीं है, बल्कि जागरूक और जिम्मेदार भागीदारी ही वास्तविक बदलाव का रास्ता है।

   ग्रामीण भारत में मतदान केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान और पहचान का प्रतीक भी है। राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के दूर-दराज गांवों में जब बुजुर्ग महिलाएं, दिव्यांगजन और पहली बार मतदान करने वाले युवा लंबी दूरी तय कर मतदान केंद्र तक पहुंचते हैं, तब लोकतंत्र की वास्तविक तस्वीर सामने आती है। हाल के वर्षों में मतदाता जागरूकता अभियानों के चलते महिलाओं और वंचित वर्गों की भागीदारी में हुई वृद्धि लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत है।

राष्ट्रीय मतदाता दिवस यह भी याद दिलाता है कि मतदान केवल चुनावी दिन तक सीमित जिम्मेदारी नहीं है। वोट डालने के बाद भी नागरिक की भूमिका समाप्त नहीं होती। चुने गए प्रतिनिधियों से सवाल पूछना, उनके कार्यों की समीक्षा करना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब मतदाता केवल मौन दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागी बनता है।

   आज देश बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में मतदाता का निर्णय केवल व्यक्ति या दल नहीं, बल्कि नीतियों, दृष्टि और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर होना चाहिए। राष्ट्रीय मतदाता दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हमारा वोट समानता, विकास और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को मजबूत कर रहा है या नहीं।

   चुनाव आयोग द्वारा मनाया जाने वाला यह दिवस प्रशासनिक पहल से आगे बढ़कर सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है, बशर्ते इसे केवल औपचारिकता न बनाया जाए। स्कूलों, कॉलेजों, गांवों और कस्बों में लोकतांत्रिक संवाद को बढ़ावा देना, मतदान को उत्सव की तरह देखना और हर नागरिक को उसके मत की शक्ति का एहसास कराना समय की आवश्यकता है।

    अंततः लोकतंत्र की मजबूती ईवीएम, कानून या संस्थाओं से नहीं, बल्कि मतदाता की सोच, साहस और जिम्मेदारी से तय होती है। जब नागरिक यह समझ लेता है कि उसका एक वोट केवल सरकार नहीं, बल्कि समाज की दिशा बदल सकता है, तभी लोकतंत्र जीवंत बनता है। राष्ट्रीय मतदाता दिवस इसी विश्वास को दोहराने का दिन है—कि लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि जागरूक, निर्भीक और जिम्मेदार मतदाता के हाथ में है.

-बाबूलाल नागा