राजनीति

ममता राज के पीड़ितों को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी ‘सुपरकॉप’ आईपीएस दमयंती सेन पर

रामस्वरूप रावतसरे
पश्चिम बंगाल में ‘माँ-माटी-मानुष’ का नारा देकर सत्ता में आई ममता बनर्जी सरकार को जनता ने क्यों नकार दिया । अब उनका असली चेहरा सामने आ रहा है जब उन्होंने अपनी ही सरकार की नाक के नीचे हुए एक खौफनाक गैंगरेप को ‘मनगढ़ंत कहानी’ बता दिया था। उस दौर में राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर मुख्यमंत्री ममता के सुर में सुर मिला रहे थे लेकिन एक निडर महिला आईपीएस अधिकारी दमयंती सेन ऐसी थीं जिन्होंने सत्ता के दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया।


ममता सरकार ने सच को उजागर करने के बदले इस जांबाज अधिकारी को इनाम देने के बजाय सालों-साल हाशिए (साइडलाइन) पर धकेल कर रखा लेकिन कहते हैं न कि सच कभी हारता नहीं है। बंगाल में भाजपा की सरकार बनते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बड़ा और सराहनीय कदम उठाया है। उन्होंने तृणमूल कॉन्ग्रेस के 15 साल के काले शासनकाल के दौरान महिलाओं और बच्चों पर हुए अत्याचारों की जाँच के लिए एक हाई-लेवल विशेष आयोग बनाया है। सीएम शुभेंदु अधिकारी ने इस बेहद महत्वपूर्ण जाँच आयोग का ‘सदस्य सचिव’ दमयंती सेन को नियुक्त कर उन्हें वो सम्मान लौटाया है जिसकी वो हकदार थीं।


दमयंती सेन 1996 बैच की भारतीय पुलिस सेवा  की एक बेहद तेजतर्रार अधिकारी हैं। 1970 में जन्मी दमयंती पढ़ाई-लिखाई में बचपन से ही बेहद होनहार और हमेशा फर्स्ट क्लास रही हैं। उन्होंने कोलकाता के प्रतिष्ठित जादवपुर विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। उनकी काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह कोलकाता पुलिस के इतिहास में जॉइंट कमिश्नर (क्राइम) के पद पर तैनात होने वाली पहली महिला अधिकारी थीं। इसके बाद वे कोलकाता पुलिस की स्पेशल कमिश्नर भी बनीं। प्रशासनिक हलकों में उनकी ईमानदारी, कड़क स्वभाव और बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम करने के अंदाज की मिसाल दी जाती है।


6 फरवरी 2012 को कोलकाता के आलीशान पार्क स्ट्रीट इलाके में एक नाइट क्लब से लौट रही महिला के साथ चलती कार में सामूहिक बलात्कार (पार्क स्ट्रीट गैंगरेप) होता है। तब ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार को सत्ता में आए कुछ ही समय हुआ था। अपनी सरकार की छवि को बचाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बिना किसी जाँच के इस भयानक कांड को ‘सजानो घोटोना’ (एक मनगढ़ंत कहानी) करार दे दिया। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि यह उनकी सरकार को बदनाम करने की एक राजनीतिक साजिश है। मुख्यमंत्री का यह बयान पीड़ित महिला के घावों पर नमक छिड़कने जैसा था।


जानकारी के अनुसार ममता बनर्जी ने तो इसे झूठ मान लिया था लेकिन उस समय क्राइम ब्रांच की प्रभारी जॉइंट कमिश्नर दमयंती सेन चुप नहीं बैठीं। उन्होंने मुख्यमंत्री के राजनीतिक बयानों की परवाह न करते हुए पूरी लगन से जाँच की। दमयंती सेन और उनकी टीम ने वैज्ञानिक और पुख्ता सबूत जुटाए और यह साबित कर दिया कि बलात्कार की घटना कोई अफवाह नहीं बल्कि 100 फीसदी कड़वा सच थी। उन्होंने चंद दिनों के भीतर ही रसूखदार आरोपितों को दबोचकर सलाखों के पीछे भेज दिया।


बताया जाता है, ममता बनर्जी के दावों को झूठा साबित करना और पीड़ित महिला को न्याय दिलाना दमयंती सेन के करियर पर भारी पड़ गया। बौखलाई ममता सरकार ने केस सुलझने के तुरंत बाद ही उनका ट्रांसफर कोलकाता पुलिस मुख्यालय (लालबाजार) से हटाकर बैरकपुर पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज में एक बेहद मामूली और कम महत्वपूर्ण पद पर कर दिया। सरकार ने इसे ‘रूटीन ट्रांसफर’ कहा लेकिन पूरा बंगाल समझ गया था कि सच का साथ देने की वजह से एक ईमानदार अफसर को प्रताड़ित किया जा रहा है। इसके बाद टीएमसी के पूरे कार्यकाल में उन्हें मुख्यधारा से दूर रखा गया।


हालाँकि, कलकत्ता हाई कोर्ट को उनकी ईमानदारी पर इतना भरोसा था कि अदालत ने 2014 के ‘मध्यमग्राम बलात्कार कांड’, साल 2022 के चार बड़े रेप केस और चर्चित रसिका जैन मौत मामले की जाँच सीधे दमयंती सेन को सौंप दी थी।


जानकारों के अनुसार दमयंती सेन अपनी निजी जिंदगी को हमेशा मीडिया और लाइमलाइट से दूर रखती हैं। उनके माता-पिता या भाई-बहन के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं है। उन्होंने जीवन में कभी शादी नहीं की लेकिन वह एक बेहद गौरवान्वित ‘सिंगल मदर’ हैं। उन्होंने एक बच्चे को गोद लिया है और अकेले ही उसका बेहतरीन पालन-पोषण कर रही हैं।


पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ताबड़तोड़ और कड़े फैसले ले रहे हैं। पिछली सरकार के दौरान हुए संस्थागत भ्रष्टाचार, ‘कट मनी’, रिश्वतखोरी और महिलाओं-बच्चों के खिलाफ हुई हिंसा के खिलाफ उन्होंने कड़ा रुख अपनाया है। शुभेंदु सरकार ने इसके लिए दो अलग-अलग जाँच आयोगों का गठन किया है।


पहला है संस्थागत भ्रष्टाचार की जाँच, जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस विश्वजीत बसु की अध्यक्षता में यह कमेटी काम करेगी, जिसमें एडीजी रैंक के अधिकारी जयरमन सदस्य-सचिव होंगे।


दूसरा है महिला एवं बाल उत्पीड़न की जाँच, जिसमें रिटायर्ड जस्टिस समाप्ति चटर्जी की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी में आईपीएस दमयंती सेन को ‘सदस्य सचिव’ बनाया गया है। यह आयोग विशेष रूप से अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अल्पसंख्यक समुदायों की पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाएगा।


ममता सरकार जहाँ अपराधियों को बचाने और सच छुपाने के आरोपों से घिरी रही, वहीं शुभेंदु सरकार ने सीधे जनता के द्वार जाने का फैसला किया है। यह विशेष आयोग आगामी 1 जून से राज्य के अलग-अलग थानों में जाकर ‘जनसुनवाई’ करेगा, जहाँ पीड़ित महिलाएँ बिना किसी डर के सीधे अपनी शिकायतें दर्ज करवा सकेंगी।


1 जून से पहले दमयंती सेन की देखरेख में अधिकारियों की टीम पुराने सभी लंबित मामलों का डेटा जुटा रही है। सालों तक हाशिए पर रहने के बाद दमयंती सेन की यह वापसी बंगाल की कानून-व्यवस्था के लिए एक नया सवेरा है और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की न्यायप्रिय सोच का सबसे बड़ा प्रमाण बताया जा रहा है।