राजनीति

संघ की साधना: व्यक्ति नहीं, “राष्ट्र सर्वोपरि”

पवन शुक्ला

​राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
के विचार दर्शन, कार्यपद्धति और जीवन-दृष्टि का यदि कोई एक मूल मंत्र है, तो वह है—
“राष्ट्र सर्वोपरि”। संघ की संपूर्ण साधना का केंद्र बिंदु व्यक्ति पूजा या व्यक्ति केंद्रित विमर्श नहीं, बल्कि राष्ट्र की परम वैभव संपन्न स्थिति है। संघ मानता है कि व्यक्ति नश्वर है, संगठन एक माध्यम है, लेकिन राष्ट्र सनातन और शाश्वत है। इसी शाश्वत सत्य को आत्मसात कर लाखों स्वयंसेवक मौन साधक बनकर राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में आहुति दे रहे हैं।

​व्यक्ति नहीं,तत्व और विचार की पूजा

​संघ की कार्यपद्धति में सबसे अनूठी बात यह है कि यहाँ किसी जीवित व्यक्ति को ‘गुरु’ या सर्वोच्च मार्गदर्शक के रूप में नहीं पूजा जाता। संघ ने अपने स्थापना काल से ही किसी व्यक्ति के स्थान पर ‘भगवा ध्वज’ को अपना गुरु माना है। व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, उसमें मानवीय त्रुटियाँ होना स्वाभाविक है।यदि साधना व्यक्ति-केंद्रित हो जाए, तो व्यक्ति के अवसान या विलन के साथ ही संस्था और विचार भी समाप्त हो जाते हैं।भगवा ध्वज त्याग, वैराग्य, ज्ञान और निरंतर कर्मशीलता का प्रतीक है। संघ की साधना इसी तत्व की साधना है,जहाँ व्यक्ति का अहंकार विसर्जित हो जाता है और केवल राष्ट्रहित शेष रहता है।

​अहंशून्यता और मौन साधना का मार्ग

​डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने जब संघ की स्थापना की थी, तब उन्होंने एक ऐसे तंत्र की कल्पना की थी जहाँ स्वयंसेवक ‘प्रसिद्धि परांगमुख’ (नाम और प्रसिद्धि से दूर) रहकर काम करें। संघ में ‘मैं’ का कोई स्थान नहीं है,यहाँ केवल ‘हम’और ‘हमारा राष्ट्र’ ही मुख्य है। स्वयंसेवक समाज के विभिन्न क्षेत्रों में मूक सेवक की भांति काम करते हैं। वे बाढ़, भूकंप, महामारी जैसी आपदाओं में सबसे पहले सेवा के लिए पहुंचते हैं, लेकिन कभी अपनी तस्वीरों या प्रचार की लालसा नहीं रखते। यह अहंशून्यता ही संघ की साधना का मूल तत्व है, जहाँ व्यक्ति खुद को राष्ट्र रूपी विराट पुरुष का एक अदना सा हिस्सा मानता है।

​राष्ट्र सर्वोपरि: एक जीवंत दर्शन

​”राष्ट्र सर्वोपरि” केवल एक नारा नहीं है, बल्कि यह स्वयंसेवकों के दैनिक जीवन का आचरण है। संघ की दृष्टि में राष्ट्र केवल भूमि का एक टुकड़ा या सीमाओं से घिरा भू-भाग नहीं है। राष्ट्र एक जीवंत, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना है। इस चेतना की रक्षा और संवर्धन के लिए व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत सुखों,स्वार्थों और आकांक्षाओं का त्याग करना पड़ता है।जब भी व्यक्ति और राष्ट्र के हितों में टकराव होता है, तो संघ का स्वयंसेवक बिना किसी हिचकिचाहट के राष्ट्रहित को चुनता है।यही वह साधना है जो एक साधारण मनुष्य को राष्ट्र-निर्माता बना देती है।

​व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण

​यद्यपि संघ की साधना में व्यक्ति सर्वोपरि नहीं है, लेकिन राष्ट्र निर्माण का मार्ग व्यक्ति निर्माण से होकर ही गुजरता है।संघ की दैनिक शाखा इसी व्यक्ति निर्माण की पाठशाला है।शाखा में होने वाले खेल,व्यायाम, समता और बौद्धिक विमर्श के माध्यम से व्यक्ति के भीतर अनुशासन,देशभक्ति, सहकारिता और कर्तव्यबोध के संस्कार बोए जाते हैं। संघ व्यक्ति का विकास इसलिए करता है ताकि वह समाज और राष्ट्र के काम आ सके। यहाँ व्यक्ति साध्य नहीं,बल्कि राष्ट्र रूपी साध्य को प्राप्त करने का एक पवित्र साधन मात्र है।

​संगठन सूक्त और एकात्मता का भाव

​ऋग्वेद के संगठन सूक्त-

“संगच्छध्वं संवदध्वं सं
वो मनांसि जानताम्”

(हम सब साथ चलें, साथ बोलें और हमारे मन एक हों) को संघ ने अपने व्यवहार में उतारा है। संघ की साधना किसी एक जाति,वर्ग या संप्रदाय के उत्थान के लिए नहीं है। यह संपूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरोने की साधना है। जब स्वयंसेवक शाखा में एक कतार में खड़े होते हैं,तब उनका कोई सामाजिक या आर्थिक भेदभाव नहीं रह जाता।वे केवल भारत माता के पुत्र होते हैं। व्यक्ति की पहचान को राष्ट्र की सामूहिक पहचान में विलीन कर देना ही संघ की सांगठनिक शक्ति का रहस्य है।

​विविधता में एकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

​भारत एक विविधताओं से भरा देश है,और संघ की साधना इस विविधता को नकारती नहीं, बल्कि इसे एक अंतर्निहित सूत्र से जोड़ती है,जिसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा जाता है। संघ का मानना है कि हमारी संस्कृति ही हमारी राष्ट्रीयता का आधार है। व्यक्ति की अपनी स्थानीय पहचान,भाषा और रीति-रिवाज हो सकते हैं, लेकिन जब राष्ट्र की बात आती है, तो ये सभी नदियां राष्ट्र रूपी महासागर में आकर मिल जाती हैं। संघ इसी एकात्म भाव को जगाने का प्रयास करता है ताकि प्रांतीयता या भाषावाद के नाम पर राष्ट्र खंडित न हो।

​इतिहास की सीख और भविष्य का संकल्प

​संघ का इतिहास गवाह है कि जब-जब देश पर संकट आया, स्वयंसेवकों ने अपनी जान की परवाह किए बिना राष्ट्र की रक्षा की। चाहे १९४७ का विभाजन हो, १९६२, १९६५ और १९७१ के युद्ध हों, या फिर देश में लगने वाला आपातकाल—संघ के स्वयंसेवकों ने हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहकर संघर्ष किया। यह प्रेरणा उन्हें किसी व्यक्ति विशेष के आदेश से नहीं, बल्कि “राष्ट्र सर्वोपरि” के उस संकल्प से मिलती है जो उन्होंने संघ स्थान पर लिया होता है। संघ की यह साधना अविरत है, जो भूतकाल के गौरव से सीख लेकर भविष्य के परम वैभवशाली भारत के निर्माण के लिए संकल्पबद्ध है।

​समर्पण की पराकाष्ठा

​अंततः, संघ की साधना को यदि संक्षेप में समझना हो, तो यह ‘स्व’ से ‘समष्टि’ की यात्रा है। यहाँ व्यक्ति दीये की तरह स्वयं जलकर समाज को आलोकित करता है।
संघ की प्रार्थना की अंतिम पंक्तियाँ—

“विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
परं वैभवं नेतुमेतत्स्वरूपं स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वाशिषा ते॥”
इसी सत्य को उद्घोषित करती हैं कि हे ईश्वर! हमारी यह संगठित कार्यशक्ति विजयी हो और हम अपने इस राष्ट्र को परम वैभव की स्थिति में ले जाने में समर्थ हों।

​इस साधना में व्यक्ति का विलय ही राष्ट्र की अमरता की गारंटी है। यही कारण है कि संघ में व्यक्ति नहीं, बल्कि केवल और केवल “राष्ट्र सर्वोपरि” था, है और सदैव रहेगा।

लेखक- पवन शुक्ला