हिसार में सामने आया कोकीन तस्करी का ताज़ा मामला केवल एक आपराधिक घटना
नहीं, बल्कि समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
समाचारों के अनुसार, एक पीजी में रह रही युवती पर आरोप है कि वह लगभग 11
महीनों से विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को लक्ष्य बनाकर कोकीन की
सप्लाई कर रही थी। यह घटना इस बात का संकेत है कि नशे का कारोबार अब
सुनियोजित तरीके से उन युवाओं तक पहुँचने का प्रयास कर रहा है, जिनके
हाथों में देश का भविष्य सुरक्षित माना जाता है।
कुछ वर्ष पहले तक “चिट्टा” जैसे घातक नशे ने अनेक परिवारों की खुशियाँ
छीन ली थीं। अब उससे भी अधिक महंगे और खतरनाक माने जाने वाले कोकीन जैसे
मादक पदार्थों का विद्यार्थियों तक पहुँचना अत्यंत चिंताजनक है। यदि
विश्वविद्यालय और महाविद्यालय, जो ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण
के केंद्र हैं, वहीं नशे के नेटवर्क का निशाना बनने लगें, तो यह केवल
कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज का विषय बन जाता है।
हर माता-पिता अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए अनेक त्याग करते
हैं। वे अपनी आवश्यकताओं में कटौती करके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते
हैं, इस आशा के साथ कि उनका बेटा या बेटी पढ़-लिखकर जीवन में आगे बढ़ेगा,
परिवार का नाम रोशन करेगा और राष्ट्र निर्माण में योगदान देगा। ऐसे में
यदि कोई विद्यार्थी नशे की गिरफ्त में चला जाए, तो यह केवल उस परिवार का
नहीं, बल्कि पूरे समाज का दुःख है। माता-पिता के वर्षों के परिश्रम, सपने
और विश्वास एक ही झटके में टूट सकते हैं।
नशा केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की सोच, चरित्र, शिक्षा,
स्वास्थ्य और भविष्य को भी नष्ट कर देता है। इसकी गिरफ्त में आया युवा
धीरे-धीरे परिवार से दूर होता जाता है, अपराध की ओर बढ़ सकता है और
आर्थिक रूप से भी बर्बाद हो सकता है। नशे के कारण अनेक प्रतिभाशाली
विद्यार्थी अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ देते हैं, जबकि कुछ मानसिक तनाव, अवसाद
और अन्य गंभीर समस्याओं का सामना करने लगते हैं।
यह भी समझना होगा कि नशा तस्कर किसी के मित्र नहीं होते। उनका उद्देश्य
केवल अधिक से अधिक धन कमाना होता है। वे पहले युवाओं को आकर्षित करते
हैं, फिर उन्हें इसकी लत लगाकर स्थायी ग्राहक बना देते हैं। आज सोशल
मीडिया, निजी आवास, पीजी, किराये के फ्लैट और अन्य माध्यमों का दुरुपयोग
कर ऐसे गिरोह युवाओं तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए केवल पुलिस
कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज की सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है।
इस चुनौती से निपटने के लिए बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता है। पुलिस और
सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे नेटवर्क के विरुद्ध कठोर और निरंतर अभियान
चलाना चाहिए। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में समय-समय पर नशा
विरोधी जागरूकता कार्यक्रम, परामर्श सत्र और गोपनीय शिकायत व्यवस्था
विकसित की जानी चाहिए। छात्रावासों और पीजी संचालकों को भी अपने यहाँ
रहने वाले विद्यार्थियों की गतिविधियों पर कानूनी दायरे में सतर्क
निगरानी रखनी चाहिए तथा किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत प्रशासन
को देनी चाहिए।
परिवारों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। माता-पिता को केवल आर्थिक
व्यवस्था तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि बच्चों से नियमित संवाद बनाए
रखना चाहिए। उनके मित्रों, दिनचर्या, व्यवहार और मानसिक स्थिति पर भी
संवेदनशील दृष्टि रखनी चाहिए। विश्वासपूर्ण पारिवारिक वातावरण अनेक
युवाओं को गलत रास्ते पर जाने से रोक सकता है।
युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि यही शक्ति
नशे के दलदल में फँसने लगे, तो देश के विकास की गति प्रभावित होना
स्वाभाविक है। इसलिए आज आवश्यकता केवल अपराधियों को पकड़ने की नहीं,
बल्कि समाज में ऐसा वातावरण बनाने की है जहाँ युवा नशे से दूर रहकर
शिक्षा, संस्कार, खेल, नवाचार और राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।
हिसार की यह घटना हम सभी के लिए एक चेतावनी है। यदि सरकार, प्रशासन,
शैक्षणिक संस्थान, अभिभावक और समाज मिलकर समय रहते ठोस कदम उठाएँ, तो आने
वाली पीढ़ी को इस विनाशकारी जाल से बचाया जा सकता है। युवा पीढ़ी को नशे
से बचाना केवल कानून का नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा दायित्व है।
-सुरेश गोयल धूप वाला