वीरेन्द्र सिंह परिहार
बंगाल के 294 सीटों पर पहले चरण में 152 सीतों पर मतदान 23 अप्रैल को सम्पन्न हो गया। जहाँ पर प्रत्याशा के विपरीत 92 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ। जबकि उसी समय तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में 88 प्रतिशत मतदान की खबरे हैं। बड़ी-बात यह कि जहाँ तमिल नाडु में अमूमन शांतिपूर्ण मतदान सम्पन्न हुआ वहीं बंगाल में अभूतपूर्व तैयारी और सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद वह हिंसा से प्रभावित रहा। 29 अप्रैल के चुनाव में बंगाल की 142 सीटों में भी कमोवेश यही स्थिति देखने को मिल रही है।
यह बताने की जरूरत नहीं कि यह आक्रामकता ज्यादातर मामलों में टी.एम.सी. की ओर से देखने को मिली। जहाँ दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज विधानसभा के भाजपा प्रत्याशी सुवेन्द्र सरकार के साथ मारपीट की गई, वहीं आसनसोल दक्षिण के भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्रा पाल की कार पर पथराव हुआ जिससे उनका वाहन क्षतिग्रस्त हो गया। मुर्शिदावाद के नौदा में मतदान से पहले रात देशी बम फेंका गया, जिससे कई लोग घायल हो गये। इसके बाद वहाँ पहुँचे हुमायु कबीर की कार पर पत्थरों और लाठियों से हमला किया गया। सिलीगुड़ी में भाजपा/टी.एम.सी. कार्यकर्ताओं में झड़प की खबरे हैं लेकिन इन कुछ घटनाओं के बावजूद यह कहा जा सकता है कि अमूमन वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने भयमुक्त होकर मतदान के अधिकार का प्रयोग किया। निश्चित रूप से बंगाल में चाहे जिसके चुनाव हों, चाहे वह विधानसभा हो या पंचायत जहाँ व्यापक तौर पर राज्य-पोषित हिंसा का इतिहास रहा है, वहाँ वह यह एक बड़ी उपलब्धि है।
बंगाल में जहाँ 92.6 प्रतिशत औसत मतदान की खबरे हैं, वहीं मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में यह 95 प्रतिशत तक को पार कर गया। उदाहरण के लिए मुर्सिदाबाद जिले की 4 मुस्लिम बहुल सीटों पर जहा 77 प्रतिशत से अधिक मुसलमान हैं, उन विधानसभा सीटों पर मतदान का प्रतिशत 95 को भी पार कर गया। ऐसी स्थिति में बड़ा सवाल यह कि इसके निहितार्थ क्या हैं ? इसके निहितार्थ यही कि बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं ने मतदान को लेकर पूरी ताकत झोंक दी। यह कहा जा सकता है कि इसकी वजह क्या रही होगी ? तो इसकी सबसे बड़ी वजह भाजपा को सत्ता में आने से किसी भी कीमत पर रोकना है क्योंकि भाजपा एक-एक घुसपैठिये को (जो अमूमन मुस्लिम है) उन्हें बंगाल से बाहर करने की बात करती है। अपने घोषणा-पत्र में कामन सिविल कोड लागू करने की बात भी कर चुकी है। यह बड़ी सच्चाई है कि सिर्फ सीमावर्ती बंगाल में ही नहीं, मुस्लिम बहुल इलाकों में भी वहाँ हिन्दू प्रताड़ित ही नहीं, असहाय भी हैं। उसे समाप्त करने और कानून का शासन लाने की बात भाजपा करती है। परन्तु तुष्टिकरण की प्रवृत्ति में पोषित वहाँ का मुसलमान यह स्थिति क्यों आने दे। इसी लिये झूठी धर्म निरपेक्षता के नाम पर बंगाल को मुसलमान भाजपा को हटाने के लिये टी.एम.सी. के पक्ष में एकजुट होकर मतदान के सभी रिकार्ड तोड़ रहा है।
यह तो तस्वीर का एक पहलू है, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। वहाँ पर व्यापक स्तर पर घुसपैठ को संरक्षण, अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के चलते हिंसा-दंगो की प्रवृत्ति का घर कर जाना। सिंडिकेट राज जिसके चलते एक ऐसा समानान्तर तंत्र विकसित कर दिया गया, जिसके चलते सरकारी स्कीमों का लाभ तृणमूल पार्टी से जुड़े लोगो और गुंडो को मिल रहा है। वस्तुतः वहाँ का आम हिन्दू तृणमूल के राज्य में जो भय और हिंसा के साये में जी रहा है- उसके चलते हिन्दुओं में प्रति- धु्रवीकरण की प्रवृत्ति को जन्म दिया जो वर्तमान में अपने चरम पर है। उस तृष्टिकरण का नतीजा यह कि 2010-11 में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग का आवंटन 472 करोड़ रूपये था जो 2024-25 में 5530.65 करोड़ रूपये हो गया। यानी 117 गुना की वृद्धि। ऐसे ही वृद्धि मदरसा शिक्षा विभाग के बजट में भी की गई। 2021 से 2026 के बीच जहाँ एस.सी./एस.टी. कल्याण बजट की वृद्धि दर औसत 8.10 प्रतिशत रहा वहीं अल्पसंख्यक विभाग के सभी बजटों में 25 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि देखी गई।
ममता बनर्जी मुस्लिम वोट बैंक के संदर्भ में खुद भी कह चुकी है कि दूध देने वाली गाय के लात भी सहूँगी। ममता बनर्जी या दूसरे वोट बैंक की राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञों को यह पता है कि मुस्लिम समुदाय ‘अस्तित्वगत सुरक्षा’ के कारण एक मुश्त मतदान करता है। इसके विपरीत हिन्दू मतदाता जाति, वर्ग और विचारधारा में बंटा होता है। इसके साथ बड़ी बात यह भी कि टी.एम.सी. के गुंडो और मुस्लिम अतिवादियों के भय से हिन्दुओं को एक बड़ा तबका 2021 के विधानसभा चुनावों में भी तृणमूल को वोट करता रहा है लेकिन अब बंगाल के हिन्दुओं को यह बखूबी पता चल चुका है कि यदि उन्होंने भय और दूसरे कारणों को छोड़कर भाजपा को सत्ता में नहीं लाया तो वह दिन दूर नहीं जब उनकी स्थिति बांग्लादेशी हिन्दुओं जैसी हा जायेगी। वह राज्य में द्वितीय श्रेणी के नागरिक तो बन ही जायेंगे। पश्चिम बंगाल को बांग्लादेश में मिलाकर उसे पूरी तरह मुस्लिम राष्ट्र बनाने के दौर की शुरूआत हो जायेगी। इसीलिये 92 प्रतिशत मतदान का मतलब हिन्दू जागरण और एकता है ही, साथ ही इस बात की एलान भी कि 15 वर्ष बंगाल में शासन करने के बाद अब ममता की चला-चली की बेला आ गई है।