लेखक परिचय

के.डी. चारण

के.डी. चारण

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार है

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vulture(अचानक एक मटमैले और कुरूप से पक्षी का प्रवेश होता है, वहां उपस्थित लोग चौक जाते है।)

क्या हुआ ?
चौक गये………..? मुझे देखकर……….
अरे! मैं भी मूर्ख हूं, कई दिनों बाद देखा होगा,
मेरी प्रजाति का वंशज,
मैं गिद्ध हूं,
मिट्टी का भक्षक,
कालचक्र का अदना सा राही,
चौकिए मत……..
एक सच बयान करना था,
जो कचोट रहा था भीतर तक,
आखिर क्यों आते हम यहां,
दुर्भिक्ष और अकाल के देश में,
जरा और दारूण्य के देश में,
मस्त है हम,
घनी आबादी वाले अमीर शहरों में,
बहुत मिल जाता है खाने को,

इतना कि-
रोज ईद और दिवाली बनी रहती है,
इतना कि-
बच्चे सुबह का बचा शाम को,
अर्
शाम का बचा सुबह को नहीं खाते,
नहीं उड़ना पड़ता सैकड़ो कोसों क्षितिज पर,
धरती पर कहीं नजर पड़ी,
मिल जाती है ताजा गोस्त की पेटी,
वो भी जानवरों की नहीं,
कहते हुए घिन्न आती है………..
इंसानों की………..हां, सच में इंसानों की।।
(गिद्ध की नजरें झुक जाती है।)
याद हैं मुझे पुरखों के किस्से,
जब नसीब नहीं था, मांस का एक टुकड़ा,
हफ्ते बीत जाते थे-
किसी पशु की अस्थियां चंचोलते-चंचोलते,
बहुत तप किया तब पायी पुरखों ने,
ये सौ कोस की पैनी नजर,
ताकि उपर से दिख सके धरती का मंज़र,
वीराने में पड़ा बेज़ान अस्थिपंजर,
टूट पड़ते थे बोटी-बोटी के लिए,
बड़ी कसमकस थी,
एक दुसरे को पछाड़ने की होड़ थी,
जीने की जुगत में दौड़ थी,
पर आज……….
सब कुछ बदल सा गया है…………….(गिद्ध की आंखें भर आती है।)
लौटाना चाहता हूं पुरखों का वह दुर्लभ वर
जिसमें बख्शी थी सौ कोस की पैनी नजर,
हर तरफ दिखते है मौत के बवंडर,
सच कहता हूं दिखते है……….
इंसान बहुत कम, हैवान हद से ज्यादा,
मौत का मंज़र देखने की,
काफी है मेरी नैसर्गिक आंखें,
मन उड़ान चाहता है,
दो पल की सैर चाहता है बच्चों संग,
पर,
सहम जाते हे पंख पिछली उड़ान के,
विभत्स दृश्यों का प्रत्यास्मरण कर………..(गला अवरूद्ध हो जाता है।)
बचाना चाहते हो ना मानव मेरी प्रजाति को……??
सौ दफा सोचो अपनी जाति पर आया संकट,
हम तो बचे है अभी अनुपात में,
पर तुम खुद को तो पहचानो,

कितने बचे है तुम्हारी जाति के………??
बहुत कम होंगे मानव,
जो रखते है मानवता का अंश निज में,
हैवान अर् शैतान ही नजर आते है,

हर गलियारे और नुक्कड़ पर,
मैं देखता हूं हर रोज फफकती,बिलखती मानवता को,
जो बचे हैं गुंथे है निज स्वार्थों की गुदड़ी में,
बोलकर कुछ कहना नहीं चाहते,
और,
बदलकर कुछ खोना नहीं चाहते,
मैं भी भयभीत हूं,
छिपा के आया था बच्चों को,
खेजड़े की खोह में,
छोटे है अभी,
देना चाहता हूं अपनी प्रजाति के संस्कार,
जैसे भी मुझे मिले है,
माफ करियेगा महानुभाव,
कुछ ज्यादा तो नहीं बोल गया
गौर कीजिएगा मेरी बात पर……………
(गिद्ध उड़ जाता है धीरे-धीरे नज़रों से ओझल हो जाता है।)

3 Responses to “गिद्ध का बयान”

  1. कमलेश तिवारी

    के डी अपने अद्भुत तेवर में हैवानियत में डूब चुके इंसान को बेनकाब करती है तुम्हारी ये कविता।

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