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गंगा के अवतरण की कथा

 

शिवानन्द मिश्रा

“क्या आप जानते हैं कि महादेव की जटाओं में बहने वाली मां गंगा वास्तव में कौन हैं?” लोग कहते हैं कि गंगा स्वर्ग से धरती पर आईं लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि गंगा का वास्तविक स्वरूप स्वयं भगवान विष्णु का द्रवित प्रेम है। हां, वही श्री हरि विष्णु जिनके चरणों का स्मरण मात्र संसार को पवित्र कर देता है। पद्म पुराण में वर्णित यह अद्भुत कथा केवल गंगा के अवतरण की कहानी नहीं है बल्कि यह हरि और हर के उस असीम प्रेम का प्रमाण है जिसे समझ पाना देवताओं के लिए भी सरल नहीं। कहते हैं जब महादेव ने ऐसा दिव्य संगीत गाया कि स्वयं भगवान विष्णु प्रेम में पिघलने लगे, तब पूरे ब्रह्मांड में एक ऐसी अलौकिक घटना घटी जिससे मां गंगा का जन्म हुआ। और यही कारण है कि गंगाजल आज भी कभी अपवित्र नहीं होता। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ था कि स्वयं श्री हरि का शरीर जल में परिवर्तित हो गया? और क्यों महादेव ने उस दिव्य धारा को अपनी जटाओं में धारण किया? यह कथा सुनते-सुनते आज भी भक्तों की आंखें नम हो जाती हैं।

बहुत समय पहले की बात है। देवर्षि नारद अपने वीणा वादन और संगीत कला के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। जहां भी वे जाते, देवता, ऋषि और गंधर्व उनके मधुर भजनों को सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते। धीरे-धीरे उनके मन में यह भाव आने लगा कि शायद पूरे ब्रह्मांड में उनसे श्रेष्ठ संगीतज्ञ कोई नहीं। उनका अभिमान सूक्ष्म था लेकिन भगवान से कुछ भी छिपा नहीं रहता। एक दिन नारद मुनि बड़े आनंद से वीणा बजाते हुए वैकुंठ पहुंचे। वहां उन्होंने बड़े गर्व से कहा, “प्रभु, आज मैंने ऐसा मधुर राग गाया कि देवता भी भावविभोर हो उठे।” भगवान विष्णु मुस्कुराए। वे समझ चुके थे कि नारद के मन में संगीत का अहंकार जन्म लेने लगा है लेकिन श्री हरि दंड दे कर नहीं, प्रेम दे कर सिखाते हैं। उन्होंने अत्यंत शांत स्वर में कहा, “देवर्षि, यदि समय हो तो आज हमारे साथ एक स्थान चलिए।”

नारद मुनि प्रसन्नता से तैयार हो गए। अगले ही क्षण भगवान विष्णु उन्हें लेकर एक रहस्यमयी लोक में पहुंचे। वहां का दृश्य देखकर नारद जी स्तब्ध रह गए। चारों ओर अनेक दिव्य आत्माएं पीड़ा में कराह रही थीं। किसी का स्वर टूटा हुआ था, किसी का शरीर विकृत था, कोई रो रहा था, कोई मौन बैठा था। वातावरण में ऐसा दुख था कि नारद का हृदय कांप उठा। उन्होंने घबराकर पूछा, “प्रभु, ये कौन हैं? और इनकी यह दशा कैसे हुई?” तभी उन पीड़ित आत्माओं में से एक ने आंसुओं से भरी आंखों से कहा, “देवर्षि, हम कोई साधारण आत्माएं नहीं। हम संगीत के राग और रागिनियां हैं।”

नारद जी आश्चर्य से उन्हें देखने लगे। तब दूसरी रागिनी बोली, “जब कोई साधक शुद्ध भाव और विनम्रता से संगीत साधना करता है तो हमारा स्वरूप दिव्य और प्रकाशमय रहता है लेकिन जब संगीत में अहंकार आ जाता है, तब हमारे अस्तित्व पर चोट पहुंचती है। आपके गर्वपूर्ण गायन ने हमारे स्वरूप को विकृत कर दिया।” यह सुनते ही नारद मुनि के हाथ से वीणा छूट गई। उनके चेहरे का गर्व पलभर में समाप्त हो गया। वे कांपते हुए भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़े। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। वे बोले, “प्रभु, मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। मैं स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगा था। कृपा करके बताइए इनकी पीड़ा कैसे दूर होगी?”

भगवान विष्णु ने अत्यंत करुणा से नारद की ओर देखा और बोले, “देवर्षि, इस पूरे ब्रह्मांड में केवल एक ही हैं जिनका संगीत इन राग और रागिनियों को पुनः जीवन दे सकता है।” नारद ने व्याकुल होकर पूछा, “कौन प्रभु?” श्री हरि मुस्कुराए और बोले, “हमारे महादेव।”

यह सुनते ही नारद मुनि तुरंत भगवान विष्णु के साथ कैलाश पर्वत की ओर चल पड़े। कैलाश उस समय गहरे ध्यान और दिव्य शांति में डूबा हुआ था। हिम से ढकी चोटियों के बीच भगवान शिव समाधि में लीन बैठे थे। उनके शरीर पर भस्म थी, जटाओं में चंद्रमा शोभा दे रहा था और आसपास गूंजती डमरू की सूक्ष्म ध्वनि पूरे वातावरण को अलौकिक बना रही थी। भगवान विष्णु और नारद मुनि ने श्रद्धा से महादेव को प्रणाम किया। कुछ क्षण बाद शिव ने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोलीं। उनकी दृष्टि अत्यंत करुणामयी थी।

भगवान विष्णु ने विनम्रता से कहा, “महादेव, संगीत के राग और रागिनियां पीड़ा में हैं। आपके दिव्य संगीत के बिना उनका उद्धार संभव नहीं।” शिव मुस्कुराए। वे सब समझ चुके थे। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “मैं अवश्य गाऊंगा, लेकिन मेरा संगीत साधारण नहीं है। उसे सुनने के लिए ऐसा श्रोता चाहिए जिसका हृदय पूर्णतः निर्मल हो और जो मेरे स्वरों की गहराई को संभाल सके।” कुछ क्षण मौन रहने के बाद शिव बोले, “और इस संपूर्ण ब्रह्मांड में भगवान विष्णु से श्रेष्ठ श्रोता कौन हो सकता है?”

यह सुनकर भगवान विष्णु ध्यान मुद्रा में बैठ गए। पूरा कैलाश मौन हो गया। देवता, ऋषि, गंधर्व सभी एकत्र हो गए। फिर महादेव ने धीरे-धीरे अपनी आंखें बंद कीं। अगले ही क्षण उनके कंठ से ऐसा अलौकिक स्वर निकला जिसे शब्दों में बांध पाना असंभव है। वह संगीत केवल ध्वनि नहीं था, वह स्वयं ब्रह्मांड की आत्मा थी। हर स्वर में करुणा थी, हर लय में प्रेम था, हर कंपन में सृष्टि का रहस्य छिपा था। जैसे-जैसे शिव का संगीत गूंजता गया, वैसे-वैसे पूरा ब्रह्मांड समाधि में डूबने लगा। पर्वत स्थिर हो गए। नदियों का प्रवाह धीमा पड़ गया। देवताओं की आंखें बंद हो गईं। स्वयं समय मानो थम गया।

उधर भगवान विष्णु उस दिव्य संगीत में पूरी तरह लीन हो चुके थे। उनके हृदय में ऐसा प्रेम उमड़ा कि उनका शरीर धीरे-धीरे द्रवित होने लगा। महादेव के स्वरों में हरि के प्रति जो प्रेम था, वह इतना गहरा था कि श्री हरि स्वयं प्रेमरस में पिघलने लगे। उनका दिव्य शरीर जल की तरह बहने लगा। यह दृश्य इतना अद्भुत था कि देवताओं की आंखों से आंसू बहने लगे। पूरे ब्रह्मांड में दिव्य प्रकाश फैल गया।

लेकिन उसी समय ब्रह्मा जी चिंतित हो उठे। यदि भगवान विष्णु का यह द्रव्य स्वरूप यूं ही बहता रहा तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ सकता था। वे तुरंत आगे बढ़े और बड़े आदर के साथ उस दिव्य जल को अपने कमंडल में धारण कर लिया। उस समय ब्रह्मा जी की आंखें भी नम थीं। वे जानते थे कि यह कोई साधारण जल नहीं। यह स्वयं श्री हरि का प्रेममय स्वरूप है।

उसी क्षण आकाशवाणी हुई, “यह दिव्य धारा अब सृष्टि को पवित्र करेगी। यह विष्णुपदी कहलाएगी। यह द्रव रूपा होगी। यही आगे चलकर गंगा के नाम से तीनों लोकों का उद्धार करेगी।”

समय बीतता गया। युग बदल गए। फिर वह समय आया जब राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए मां गंगा को पृथ्वी पर लाने का कठोर तप किया। गंगा को धरती पर उतरना था लेकिन उनका वेग इतना प्रचंड था कि पूरी पृथ्वी बह सकती थी। तब सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिव मुस्कुराए क्योंकि वे जानते थे कि यह कोई साधारण नदी नहीं। यह तो स्वयं श्री हरि का द्रवित प्रेम है। महादेव ने अपनी विशाल जटाएं खोल दीं और मां गंगा को अपने शीश पर धारण कर लिया। जिस दिव्य धारा का जन्म शिव के संगीत से हुआ था, उसे धारण करने का सौभाग्य भी स्वयं शिव को ही मिला। तभी से महादेव गंगाधर कहलाए।

यही कारण है कि गंगा केवल एक नदी नहीं मानी जातीं। वे हरि और हर के प्रेम का जीवित स्वरूप हैं। विष्णु का जल रूप शिव के शीश पर विराजमान है। इसलिए गंगाजल को अमृत समान माना गया है। कहते हैं उसमें कभी सड़न नहीं आती क्योंकि उसमें स्वयं भगवान का स्पर्श और महादेव की शक्ति विराजमान है।

यह कथा हमें बताती है कि शिव और विष्णु दो नहीं हैं। जहां हरि हैं वहां हर हैं और जहां हर हैं वहां हरि हैं। एक प्रेम हैं तो दूसरा करुणा। एक संगीत हैं तो दूसरा श्रोता। एक धारा हैं तो दूसरा आधार। यही कारण है कि सनातन धर्म में हरि और हर को एक ही परम सत्य के दो स्वरूप माना गया है।