राजनीति

आपातकाल का अंत कितना भयावह : लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा

सौरभ वार्ष्णेय
25 जून 1975 की आधी रात का काला अध्याय कैसे कोई भूल सकता है? गर्मी, तपिश और आंधी ने तो जनमानस को पहले से ही झुलसा रखा था ऊपर से रेडियो पर आया संदेश से पूरा देश सकते में आ गया। आपातकाल न तो पढ़ा था न पहले कभी देखा था अचानक आए राजनीतिक तूफान ने देश में अफरातफरी मचा दी।  देश में लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय माना जाता है। लगभग 21 महीनों तक चले इस दौर ने न केवल राजनीतिक व्यवस्था को झकझोर दिया, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं, अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक मूल्यों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े किए। मार्च 1977 में जब आपातकाल समाप्त हुआ, तब देश ने राहत की सांस तो ली, लेकिन इसके पीछे छिपी पीड़ा, भय और लोकतांत्रिक संस्थाओं को हुई क्षति लंबे समय तक महसूस की गई।आपातकाल का अंत इसलिए भी भयावह कहा जाता है क्योंकि उस समय तक लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता काफी कमजोर हो चुकी थी। संसद, न्यायपालिका और मीडिया पर सत्ता का प्रभाव बढ़ गया था। जनता के अधिकार सीमित हो गए थे और भय का वातावरण बन गया था। लोगों को यह एहसास होने लगा था कि यदि लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों की रक्षा न हो तो शासन निरंकुशता की ओर बढ़ सकता है।
आपातकाल के दौरान प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई थी। अखबारों को सरकारी अनुमति के बिना समाचार प्रकाशित करने की स्वतंत्रता नहीं थी। विरोधी नेताओं को जेलों में बंद कर दिया गया। हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया। लोकतंत्र की आत्मा मानी जाने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगभग समाप्त हो गई थी।
आपातकाल के अंतिम चरण में सबसे अधिक आलोचना जबरन नसबंदी अभियान और झुग्गी-झोपडिय़ों को हटाने की कार्रवाइयों को लेकर हुई। कई स्थानों पर प्रशासनिक दबाव में लोगों को नसबंदी के लिए मजबूर किया गया। गरीब और कमजोर वर्ग इस नीति का सबसे बड़ा शिकार बना। इससे जनता में व्यापक असंतोष पैदा हुआ। अनेक परिवारों ने सामाजिक, आर्थिक और मानसिक कष्ट झेले, जिसकी पीड़ा आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
आपातकाल का अंत इसलिए भी भयावह कहा जाता है क्योंकि उस समय तक लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता काफी कमजोर हो चुकी थी। संसद, न्यायपालिका और मीडिया पर सत्ता का प्रभाव बढ़ गया था। जनता के अधिकार सीमित हो गए थे और भय का वातावरण बन गया था। लोगों को यह एहसास होने लगा था कि यदि लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों की रक्षा न हो तो शासन निरंकुशता की ओर बढ़ सकता है।
हालांकि, मार्च 1977 के आम चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र की ताकत को भी साबित किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने चुनाव कराने का निर्णय लिया और जनता ने मतदान के माध्यम से अपना फैसला सुनाया। पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी और मोरारजी देसाई  के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ। यह लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का महत्वपूर्ण क्षण था।आपातकाल की समाप्ति ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की जनता लोकतांत्रिक मूल्यों से गहरा लगाव रखती है। सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंतत: जनता ही सर्वोच्च होती है। इस दौर ने संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की आवश्यकता को भी रेखांकित किया। आज,आपातकाल के पांच दशक बाद भी यह घटना एक महत्वपूर्ण चेतावनी के रूप में याद की जाती है। इसका संदेश स्पष्ट है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि नागरिक अधिकारों, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया और जवाबदेह शासन से मजबूत होता है। आपातकाल का अंत भयावह अनुभवों और लोकतंत्र की पुनर्जागृति दोनों का प्रतीक था। यह इतिहास हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए समाज को सदैव सजग रहना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जागरूक नागरिक ही होते हैं।
आपातकाल के काले छींटे कब सुलझेंगे?
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसे आज भी काला अध्याय कहा जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल ने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए थे। लगभग 21 महीने तक चले इस दौर में हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाला गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई और विरोध के हर स्वर को दबाने का प्रयास किया गया। आज, आपातकाल समाप्त हुए पाँच दशक के करीब समय बीत चुका है, लेकिन उसके काले छींटे पूरी तरह धुल नहीं पाए हैं। इसका कारण केवल इतिहास की स्मृतियां नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र को लेकर लगातार बनी रहने वाली चुनौतियां भी हैं। जब भी सत्ता के केंद्रीकरण, संस्थाओं की स्वायत्तता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या विपक्ष की भूमिका पर बहस होती है, तब आपातकाल की याद स्वत: ताजा हो जाती है। आपातकाल का सबसे बड़ा सबक यह था कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि मजबूत संस्थाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष मीडिया और जागरूक नागरिकों से संचालित होता है। यदि इनमें से किसी भी स्तंभ को कमजोर किया जाता है तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए आपातकाल की घटनाओं का स्मरण केवल अतीत को कोसने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए आवश्यक है।दुर्भाग्य से, आपातकाल पर राजनीतिक दल अक्सर अपने-अपने दृष्टिकोण से चर्चा करते हैं। एक पक्ष इसे लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला बताता है, जबकि दूसरा पक्ष वर्तमान परिस्थितियों की तुलना उस दौर से करने का प्रयास करता है। इस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच वास्तविक आवश्यकता यह है कि देश उस कालखंड का निष्पक्ष मूल्यांकन करे और उससे मिले सबकों को आत्मसात करे। आपातकाल के काले छींटे तभी पूरी तरह सुलझेंगे जब लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समाज और शासन दोनों की प्रतिबद्धता अटूट होगी। नागरिक अधिकारों का सम्मान, सत्ता की जवाबदेही, प्रेस की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती ही उस अंधकारमय दौर की पुनरावृत्ति को रोक सकती है। इतिहास को भुलाना समाधान नहीं है; उससे सीख लेकर लोकतंत्र को और मजबूत बनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि आपातकाल को केवल राजनीतिक विमर्श का विषय न बनाया जाए, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का स्थायी पाठ बनाया जाए। जब देश का प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग होगा तथा शासन संविधान की मर्यादाओं के भीतर कार्य करेगा, तभी आपातकाल के वे काले छींटे वास्तव में मिट सकेंगे और भारत का लोकतंत्र और अधिक परिपक्व तथा सशक्त बन सकेगा।