लेखक परिचय

विनायक शर्मा

विनायक शर्मा

संपादक, साप्ताहिक " अमर ज्वाला " परिचय : लेखन का शौक बचपन से ही था. बचपन से ही बहुत से समाचार पत्रों और पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं में लेख व कवितायेँ आदि प्रकाशित होते रहते थे. दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा के दौरान युववाणी और दूरदर्शन आदि के विभिन्न कार्यक्रमों और परिचर्चाओं में भाग लेने व बहुत कुछ सीखने का सुअवसर प्राप्त हुआ. विगत पांच वर्षों से पत्रकारिता और लेखन कार्यों के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्तर के अनेक सामाजिक संगठनों में पदभार संभाल रहे हैं. वर्तमान में मंडी, हिमाचल प्रदेश से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहिक समाचार पत्र में संपादक का कार्यभार. ३० नवम्बर २०११ को हुए हिमाचल में रेणुका और नालागढ़ के उपचुनाव के नतीजों का स्पष्ट पूर्वानुमान १ दिसंबर को अपने सम्पादकीय में करने वाले हिमाचल के अकेले पत्रकार.

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विनायक शर्मा 

केन्द्रिय मंत्री श्री प्रकाश जयसवाल का उत्तरप्रदेश में चुनावों के सन्दर्भ में दिए बयान ने प्रदेश की राजनीति में एक नया बवाल खड़ा कर दिया है. सत्ता के गलियारों में इसे सलमान खुर्शीद और बेनी बाबू के क्रम में एक सोची समझी रणनीति के तहत ही कांग्रेस की मतदाताओं को फुसलाने और धमकाने की कु चेष्ठा बताया जा रहा है और कुछ लोग इसे आचार संहिता के उल्लंघन के साथ-साथ राज्यपाल के संविधान प्रदत्त अधिकारों के अतिक्रमण का मामला बता रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के चुनाव के पांचवे चरण के दौरान जयसवाल का यह कथन कि ” कांग्रेस किसी को भी समर्थन नहीं देगी, या तो कांग्रेस की सरकार बनेगी या फिर राष्ट्रपति शासन लागू होगा. कांग्रेस की सरकार न बनने की स्थिति में दूसरा विकल्प राष्ट्रपति शासन ही होगा, ” क्या लोकतंत्र के विरुद्ध की जा रही एक साजिश की ओर इशारा नहीं करता है ? यह तो देश का साधारण सा व्यक्ति भी जानता हैकि चुनावों में किसी भी दल को बहुमत के न मिलने और राज्यपाल द्वारा लोकतान्त्रिक सरकार बनने की सभी संभावनाओं को तलाशने, जिनमें चुनाव पूर्व या चुनाव उपरांत बने किसी भी गठबंधन द्वारा सरकार न बना पाने की स्थिति के चलते ही केंद्र सरकार को प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा की जाती है जिसपर केन्द्रिय मंत्रीमंडल गहन विचार कर के राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजता है. यानि कि राज्यपाल द्वारा सरकार बनने के सभी विकल्पों की तलाश आवश्यक हैं. यहाँ प्रश्न यह खड़ा होता है कि सरकार द्वारा केन्द्रिय चुनाव आयोग के पर कुतरने के आरोपों के मध्य कांग्रेस के केन्द्रिय मंत्री जयसवाल द्वारा उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार न बनने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाने के इस प्रकार के गैर जिम्मेदाराना वक्तव्यों का औचित्य क्या है ? विशेषकर ऐसी परिस्थिति में जब चुनावों के तीन चरण शेष रहते हैं और ८ मार्च को मतगणना का कार्यक्रम निश्चित किया गया है. एक ओर जहाँ 403 निर्वाचन क्षेत्रों वाली विधानसभा के लगभग १५० से क्षेत्रों में प्रचार और मतदान अभी होना बाकी है और इतनी बड़ी संख्या में निर्वाचित होने वाले विधायक किसी भी दल या गठबंधन की सरकार बनाने के लिए सक्षम हो सकते है. वहीँ दूसरी ओर मतगणना पश्चात् राज्यपालद्वारा बहुत सी संभावनाओं और विकल्पों की तलाश की जानी है जिसमें सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का निमंत्रण देना भी शामिल है. तो ऐसी स्थिति में जयसवाल के एक केन्द्रिय मंत्री होने के नाते दिया गया बयान अवश्य ही सवाल खड़े करता है कि क्या जयसवाल केंद्र सरकार या राज्यपाल की ओर से बयान दे रहे थे? लोकतान्त्रिक सरकार के निर्माण के लिए करवाए जा रहे चुनावों के नतीजों के पश्चात् क्या होगा यह पूर्ण रूप से नतीजों पर निर्भर करता हैकिसी दल के नेता या मंत्री की बयानबाजी पर नहीं. यहाँ तक कि राज्यपाल भी कर्नाटक के पूर्व मुख्य मंत्री एस.आर. बोम्मई बनाम केंद्र सरकार में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए एक निर्णय, जिसमें कहा गया है कि ” बहुमत या अल्पमत का फैसला विधानसभा में होना चाहिए, राज्यपाल अपनी मनमानी नहीं कर सकते.” इस एक पंक्ति ने राज्यपालों के जरिये केंद्र सरकार की मनमानी पर पूरी तरह से रोक लगा दी है. जयसवाल के इस विवादित बयान पर जहाँ तमाम विपक्षी दल ऐतराज स्वरुप अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं वहीँ देश के प्रबुद्ध-जनों को लगता है कि सत्ता के मद की गई इस प्रकार की बयानबाजी निश्चित तौर से कांग्रेस की छवि धूमिल करनेवाली है. लंबी दूरी के धावक दौड़ की तीन-चौथाई दूरी नापने के पश्चात् लक्ष्यप्राप्ति के लिए पूरी शक्ति से विजय प्राप्ति के लिए परिश्रम करते हैं.परन्तु उत्तर प्रदेश की चुनावी दौड़ के अंतिम चरणों के नजदीक आते-आते लगताहै कि कांग्रेस की सांसें फूलने लगी हैं और पराजय की आशंका से ही उसके नेता और मंत्री विशेष इस प्रकार के अनाप-शनाप बयानबाजी कर रहे हैं.

जयसवाल तो इससे पूर्व भी उत्तर प्रदेश में रिमोर्ट कंट्रोल से सरकार चलाने का विवादित बयान दे चुके है. जिम्मेदार नेताओं और मंत्रियों के इस प्रकार के बयान अवश्य ही आशंकित करते हैं कि रिमोर्ट से पार्टी और रिमोर्ट से केंद्र सरकार चलानेके आरोपों के बीच अब लगता है कि रिमोर्ट से उत्तर प्रदेश की सरकार चलाने की पूरी तैयारी कर ली है कांग्रेस ने, कम से कम जयसवाल का बयान कुछ ऐसा हीइशारा कर रहा है. कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने जयसवाल के इस विवादित बयान परनाराजगी जाहिर करते हुए को उनसे जबाव तलबी कर के, राजनैतिक क्षेत्रों में हो रही फजीहत से बचाव का ही काम किया है. वही समाचार यह भी है की चुनाव आयोग ने जयसवाल के वक्तव्य पर कानपुर के जिला मजिस्ट्रेट से रिपोर्ट मंगवायी है. अब देखना यह है की अनर्गल बयानबाजी प्रतियोगिता के यह तीसरे धुरंदर पर चुनाव आयोग काया कार्यवाई करता है? क्या यह भी अपने पूर्व साथियों की तरह ही माफी मांग कर छूट जायेंगे ? वैसे पलटा मारने में माहिर नेताओं की तरह जयसवाल ने भी अपने बयान से पलटा मार लिए है और ठीकरा मीडिया के सर फोड़ने में तनिक भी देर नहीं की. चुनाव आयोग जो भी यथोचित कार्यवाई करे, कम से कम कांग्रेस को तो बेवजह बयानबाजी करनेवाले नेताओं पर लगाम लगानी चाहिए अन्यथा २०१४ तक तो ऐसे बयान उसकी चूलें ही हिला कर रख देंगे.

2 Responses to “बेवजह बयानबाजी के तीसरे धुरंधर : श्रीप्रकाश जायसवाल”

  1. विनायक शर्मा

    Vinayak Sharma, Editor Amar Jwala weekly, Himachal

    महेंद्र जी व मधुसुदन जी, प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद. इसी प्रकार मार्गदर्शन करते रहिये…..!
    धन्यवाद

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  2. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    उचित और सामयिक लेख|

    “आचार संहिता के उल्लंघन के साथ-साथ राज्यपाल के संविधान प्रदत्त अधिकारों के अतिक्रमण ही हैं” यह|

    बहुत धन्यवाद विनायक शर्मा जी| |

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