-ललित गर्ग-
“जल है तो जीवन है”-यह पंक्ति कोई नारा भर नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का शाश्वत सत्य है। बिना जल के जीवन की कल्पना भी संभव नहीं। किंतु विडंबना यह है कि जिस जल को हम जीवन का आधार मानते हैं, वही आज सबसे अधिक संकटग्रस्त संसाधन बन चुका है। देश-दुनिया में जल संकट के हालात विकराल हो चुके हैं और यह संकट अब केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही, भ्रष्टाचार और मूल्यहीन शासन का भी परिणाम बनता जा रहा है। विश्व स्तर पर लगभग 25 देश अत्यधिक जल तनाव से जूझ रहे हैं। चार अरब से अधिक लोग वर्ष में कम से कम एक माह पानी की गंभीर कमी का सामना करते हैं। मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्र इस संकट की अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यहां 60 करोड़ से अधिक लोग उच्च जल तनाव वाले क्षेत्रों में रहते हैं। राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु जैसे राज्य सबसे अधिक प्रभावित हैं, जबकि चेन्नई, बेंगलूरु और दिल्ली जैसे महानगरों में पानी की कमी रोजमर्रा की समस्या बन चुकी है।
दरअसल, जल संकट अब ‘वाटर स्ट्रेस’ से आगे बढ़कर ‘ग्लोबल वाटर बैंक्रप्सी’ यानी दुनिया जल के वैश्विक दिवालियेपन की ओर बढ़ रही है। स्थिति यह है कि जल स्रोतों का दोहन इतनी तीव्रता से हो रहा है कि उनकी प्राकृतिक भरपाई असंभव होती जा रही है। भूजल स्तर निरंतर गिर रहा है, नदियां सूख रही हैं और तालाब अतिक्रमण की भेंट चढ़ रहे हैं। यह संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक संकट भी है। जल संकट का सीधा प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। कृषि, उद्योग और ऊर्जा-तीनों ही क्षेत्र पानी पर निर्भर हैं। जब खेतों को पानी नहीं मिलता, उद्योग ठप होते हैं और बिजली उत्पादन प्रभावित होता है, तो देश की जीडीपी में 6 प्रतिशत तक की कमी का खतरा उत्पन्न हो जाता है। आमजन के लिए यह संकट जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाता है। जहां पानी पर्याप्त है, वहां बर्बादी हो रही है और जहां पानी की सबसे अधिक आवश्यकता है, वहां लोग बूंद-बूंद को तरस रहे हैं।
भारत सरकार ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जल संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय बनाया है। जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जैसे कार्यक्रम इसी दिशा में ऐतिहासिक पहल हैं। जल जीवन मिशन का लक्ष्य हर घर तक नल से जल पहुंचाना है, ताकि स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित किया जा सके। अटल भूजल योजना भूजल के सतत प्रबंधन और सामुदायिक सहभागिता पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना “हर खेत को पानी” के संकल्प को साकार करने का प्रयास है। इसके साथ ही जल शक्ति अभियान के तहत वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण और जनभागीदारी पर विशेष जोर दिया गया। इन योजनाओं ने निश्चित रूप से जल संरक्षण के प्रति राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत किया है। कई क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन संरचनाएं बनी हैं, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा मिला है और भूजल पुनर्भरण के प्रयास हुए हैं। लेकिन इस सकारात्मक तस्वीर के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है- प्रशासनिक भ्रष्टाचार। यही वह दीमक है जो इन योजनाओं की उपयोगिता और प्रासंगिकता को नष्ट कर रही है, उन्हें मूल्यहीन बना रही है।
जल संकट से जुड़ी योजनाओं में भ्रष्टाचार कई रूपों में दिखाई देता है-घटिया निर्माण, फर्जी आंकड़े, अधूरी परियोजनाएं, कमीशनखोरी और जवाबदेही का अभाव। कहीं कागजों में ही वर्षा जल संचयन संरचनाएं बन जाती हैं, तो कहीं पाइपलाइन बिछाने में घटिया सामग्री का उपयोग होता है। कई स्थानों पर योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंच ही नहीं पाता। परिणाम यह होता है कि करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं, लेकिन न पानी मिलता है और न संकट कम होता है। भ्रष्टाचार केवल धन की बर्बादी नहीं करता, वह भविष्य की पीढ़ियों का अधिकार भी छीन लेता है। इन जटिल होती जल संकट स्थितियों के प्रति नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियों को बूंद-बूंद के लिये तरसना पडेगा। जल जैसे जीवनदायी संसाधन के साथ किया गया भ्रष्टाचार वास्तव में मानवता के साथ अपराध है। जब जल संरक्षण की योजनाएं कागजों में सिमट जाती हैं, तब जल संकट और भी गहरा हो जाता है। यही कारण है कि आज योजनाएं तो हैं, नीतियां भी हैं, लेकिन परिणाम अपेक्षित नहीं हैं। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन, अतिदोहन, अनियंत्रित शहरीकरण और खराब प्रबंधन इस संकट को और बढ़ा रहे हैं। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोका गया, तालाब पाट दिए गए और जंगलों का विनाश किया गया। परिणामस्वरूप वर्षा का पैटर्न बदल गया और जल स्रोत सूखते चले गए। यह स्पष्ट है कि केवल सरकारी योजनाओं से ही समाधान संभव नहीं, जब तक समाज स्वयं जिम्मेदारी न ले।
दुनिया के अन्य देशों से हमें बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। इजराइल में ड्रिप इरिगेशन और डिसेलिनेशन तकनीक से 90 प्रतिशत तक पानी का पुनर्चक्रण किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया में वाटर ट्रेडिंग के माध्यम से जल संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित किया गया है। अमेरिका में अपशिष्ट जल का पुनः उपयोग और यूरोप में स्मार्ट वाटर मैनेजमेंट सिस्टम जल संकट से निपटने के प्रभावी उपाय बने हैं। भारत में भी राजस्थान जैसे राज्यों में जोहड़, खादिन और बावड़ियों जैसे पारंपरिक जल संरचनाएं आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। समाधान का रास्ता स्पष्ट है-कठोर नीतियां, पारदर्शी प्रशासन और जनभागीदारी। जल संरक्षण से जुड़ी योजनाओं में भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनानी होगी। तकनीक का उपयोग कर निगरानी और सामाजिक ऑडिट को अनिवार्य बनाना होगा। आमजन को भी जागरूक होना पड़ेगा कि वर्षा जल संचयन, जल की बचत, ड्रिप सिंचाई और अपशिष्ट जल का पुनः उपयोग केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं।
भारत में विश्व की कुल आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है, जबकि देश में पीने योग्य जल संसाधनों का मात्र 4 प्रतिशत भाग ही उपलब्ध है। देश में अत्यधिक जल दोहन तथा अकुशल प्रबंधन के कारण भू-जल स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। इसके परिणामस्वरूप आने वाले समय में देश को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। नीति आयोग के अनुसार, वर्तमान में स्वच्छ जल की अपर्याप्त पहुँच के कारण लगभग 60 करोड़ भारतीय गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं तथा इसके कारण प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु होती है। वर्ष 2030 तक देश में जल की मांग, आपूर्ति की दोगुनी होने की संभावना है। इससे देश में करोड़ों लोगों को जल के गंभीर संकट का सामना करना पड़ेगा तथा देश के सकल घरेलु उत्पाद में 6 प्रतिशत की हानि होने की संभावना है। आज समय बहुत कम है। यदि अभी भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। जल का संकट केवल वर्तमान का नहीं, भविष्य का प्रश्न है। जल है तो जीवन है-इस सत्य को हमें व्यवहार में उतारना होगा। भ्रष्टाचार मुक्त जल प्रबंधन, जिम्मेदार प्रशासन और जागरूक नागरिक ही हमें इस ‘जल-संकट’ से बचा सकते हैं। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब इतिहास गवाह बनेगा कि मानव ने अपने ही हाथों से जीवन के स्रोत को नष्ट कर दिया। भू-जल प्रबंधन, कुशल सिंचाई प्रबंधन एवं वर्षा जल संचयन उपायों को अपनाकर भविष्य के जल संकट को कम किया जा सकता है।