विश्ववार्ता

विकास और विनाश को समझता विश्व

डॉ. नीरज भारद्वाज

वैश्विक परिदृश्य को जब हम अलग-अलग दृष्टि और दृष्टिकोण से देखते हैं तो हमें राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, संस्कृति आदि बहुत से विषय मिल जाते हैं। इन विषयों पर बड़े स्तर पर काम भी किया जा सकता है और काम हो भी रहा है। वर्तमान वैश्विक आर्थिक स्थिति को देखते हैं तो बाजार में रोज बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। देश-दुनिया आर्थिक संकट से गुजर रही है। वहीं दूसरी ओर ध्यान से देखें तो हम पाते हैं कि सभी देश किसी न किसी तरह से युद्ध में उलझे हुए से दिखाई पड़ रहे हैं। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सभी किसी समूह से जुड़े हुए हैं।विश्व में आर्थिक संधियों का दौर तेजी से बढ़ रहा है। सभी देश एक दूसरे देश के साथ आर्थिक वित्तीय समझौते करने में लगे हुए हैं।

एक दृष्टि से समझे तो अमेरिका आज पूरे विश्व में आर्थिक उथल-पुथल मचाने में लगा हुआ है। कोई देश स्थिर होकर उसके साथ व्यापार नहीं कर पा रहा है। कभी अमेरिकी टैरिफ का दाम बहुत ऊंचे उठ जाता है तो कभी वह उसमें कटौती कर देता है। पिछले दिनों तो अमेरिका की कोर्ट ने भी ट्रंप के टैरिफ को गलत बता दिया। अब व्यापारियों के लिए उलझन यह बनी हुई है कि वह किस टैरिफ को सही माने और किस दाम पर क्या खरीदें या क्या बेचे? बाजार की हालत सुधर नहीं रही है। यह आर्थिक अस्थिरता ही पूरी दुनिया में भूचाल मचा रही है। कभी सोने-चांदी के दाम आसमान छू जाते हैं तो कभी धड़ाम से नीचे गिर जाते हैं। छोटे और मध्यम वर्ग के व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। बाजार शांत कम अस्त-व्यस्त ज्यादा दिखाई दे रहा है। सही मायनों में अमेरिका की नीति ही बाजार में अव्यवस्था उत्पन्न कर देना है। दूसरे विश्व युद्ध का सबसे बड़ा कारण आर्थिक मंदी रहा है। उस समय विश्व की हालत कुछ और थी. उपनिवेशवाद अपने चरम पर था।

दूसरी ओर नजर दौड़ा कर देखें तो अमेरिका अपने पड़ोस के देशों पर व्यर्थ में युद्ध थोप रहा है। अपनी मनमर्जी  चला रहा है। किसी को भी बंधक बना रहा है। पड़ोसी देशों पर समझौते और करार करने का दबाव बना रहा है। खाड़ी देशों में भी युद्ध जैसा माहौल बना रखा है। छोटी सी चिंगारी बड़े युद्ध को न्योता दे रही है। ऐसा भी प्रतीत हो रहा है कि एक दूसरे देशों को लड़वाने में अमेरिका अपनी भूमिका निभा रहा है। हर तरफ एक अजीब सा वातावरण बना रखा है। लोग कुछ समझ नहीं पा रहे हैं।

विचार करें तो अमेरिका की शुरू से ही एक बड़ी रणनीति यह रही है कि वह युद्ध में ही अपना नफा अर्थात फायदा देखता है। उसका अधिकतर व्यापार भी युद्ध के सामान बेचने से ही चल रहा है। दूसरे शब्दों में कहे तो युद्ध के सामान बेचने का सबसे बड़ा व्यापारी यही देश है. आंकड़े भी यही बताते हैं। शांति में यहां व्यापार संभव दिखाई नहीं दे रहा है। गोला, बारूद, तकनीक के नए-नए अस्त्र-शस्त्र देशों को बेचना ही इनकी रणनीति रही है। दूसरे विश्व युद्ध में परमाणु बम को डालकर जापान के दो शहरों को बर्बाद करने की घटना, अपनी ताकत को दिखाने के साथ ही परमाणु शक्ति के परीक्षण का काम कर रही थी। अपने आधुनिक तकनीक के हथियारों को बेचना ही अमेरिका का मूल उद्देश्य दिखाई दे रहा है।

अब विश्व आधुनिक से अत्याधुनिक दौर में पहुंच गया है। विश्व के देश विकल्प खोज रहे हैं। अब वैश्विक रणनीतियों में देश बदलाव करना चाह रहे हैं। विश्व में शांति से भी विकास किया जा सकता है. सभी का भला किया जा सकता है। फूट डालो और लोगों को लड़वाओ, तभी लाभ कमाया जा सकता है, यह अमेरिका की रणनीति का बड़ा हिस्सा बन चुका है जिसे विश्व समझ चुका है। आज यूरोप भी अमेरिका के इस कुचक्र से बाहर निकलकर अपने लिए अलग-अलग देशों से व्यापारिक समझौते कर रहा है। जन सामान्य को मारकर या युद्ध से एक पीढ़ी लाभ कमा सकती है लेकिन उससे विश्व शांति भंग हो रही है। आने वाली पीढियों के लिए अविश्वास, शत्रुता, रंज आदि का भी बीजारोपण किया जा रहा है।

आज विश्व के अलग-अलग देश अपनी विदेश नीति और व्यापार नीति के समझौतों में अलग-अलग रणनीति के साथ काम कर रहे हैं। कोई भी देश अब राजनीतिक अस्थिरता और व्यर्थ के युद्ध जैसे वातावरण से बचना चाह रहा है। युद्ध विकास का नहीं, विनाश का मार्ग है।

डॉ. नीरज भारद्वाज