लेखक परिचय

डॉ. राजेश कपूर

डॉ. राजेश कपूर

लेखक पारम्‍परिक चिकित्‍सक हैं और समसामयिक मुद्दों पर टिप्‍पणी करते रहते हैं। अनेक असाध्य रोगों के सरल स्वदेशी समाधान, अनेक जड़ी-बूटियों पर शोध और प्रयोग, प्रान्त व राष्ट्रिय स्तर पर पत्र पठन-प्रकाशन व वार्ताएं (आयुर्वेद और जैविक खेती), आपात काल में नौ मास की जेल यात्रा, 'गवाक्ष भारती' मासिक का सम्पादन-प्रकाशन, आजकल स्वाध्याय व लेखनएवं चिकित्सालय का संचालन. रूचि के विशेष विषय: पारंपरिक चिकित्सा, जैविक खेती, हमारा सही गौरवशाली अतीत, भारत विरोधी छद्म आक्रमण.

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डॉ. राजेश कपूर

डॉ. मीणा जी ने जो मुद्दे उठाए हैं वे सारे तो ठीक से स्पष्ट नहीं होते पर जितने भी मुद्दे समझ आने वाले हैं, उन पर अपनी सम्मति प्रमाणों के आधार पर प्रकट करने का विनम्र प्रयास है. …

१. आर्य कहीं बाहर से आये थे, इसके बारे में एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता. पर वे भारत से सारे संसार में गए, इस पर विश्व भर के विद्वानों ने ढेरों प्रमाण दिए है. अनेक ग्रन्थ इस पर है. पाठक चाहेंगे तो एक छोटा सा लेख इस पर सप्रमाण प्रेषित करने में कोई कठिनाई नहीं. ख़ास कर डा.मीणा जी जैसे मित्रों को तो इन तथ्यों को ज़रूर जानना चाहिए.

२.हिन्दुओं के वास्तविक दुश्मन कौन हैं? कमाल है, यह भी कोई छुपा हुआ है. जो हर रोज़ हिन्दुओं को सता रहे है, मार रहे हैं. जो हिन्दुओं को मारने वालों को गले लगा कर पाल-पोस रहे है, उन्हें जेलों में भी वी.आई.पी. सुविधाएं दे रहे हैं. भारत के देशभक्तों की हत्याए कर रहे हैं. संसद पर व हमारे मंदिरों पर आक्रमण करने वालों को फांसी नहीं होने दे रहे. ये सब केवल हिंदुओं के नहीं, देश के शत्रु है. ……… देश को टुकड़ों में बांटने के लिए अगड़े, पिछड़े, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, प्रांत, भाषा के आधार पर टुकड़ों में बांटने के षड्यंत्र कर रहे हैं; वे सब देश व समाज के शत्रु ही तो हैं. जो भारत में खतरनाक साबित हो चुकी परमाणु ऊर्जा तकनीक लगा रहे हैं, विदेशी बैंकों जमा देश के धन को वापिस लाने में रोड़े अटका रहे हैं, किसानों की ज़मीनें छीन कर मैगा कंपनियों को दे रहे है ; ये सब हमारे समाज के शत्रु हैं. …….. जिन लोगों ने अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया से लेकर मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा, नागालेंड तक मूल संस्कृति वालों का सफाया कर दिया, ये सब भी तो देश व हिन्दू समाज के शत्रु है.

३. जिन दर्शन व धर्म ग्रंथों को विश्व भर के विचारकों व विद्वानों ने विश्व का सर्वोतम ज्ञान बतलाया, उनमें केवल कमियाँ देखने वाले, उन्हें विष भरा बतलाने वाले शत्रुओं की श्रेणी में ही तो आएंगे. … इसलिए मुझे नहीं लगता की डा. मीणा जी के कहे पर हिन्दू और अन्य अल्पसंख्यक विश्वास करेंगे, भरोसा करेंगे.

४. जहाँ तक बात है जाति व्यवस्था और मनु की ; तो इसके बारे में विश्व के अनेक विद्वानों का मत मीणा जी जैसे मित्रों से बिलकुल अलग है. वे लिखते है कि दुनिया में ईसाई क्रूसेडर जहां भी गए वहाँ की संस्कृति को समूल नष्ट कर दिया. पर भारत में ऐसा सैंकड़ों साल में भी नहीं हो सका (इस्लामी और मुस्लिम काल मिला कर). इसका एक मात्र कारण भारत की जाति व्यवस्था है. इस बारे में विद्वान लेखक प्रो. मधुसुदन जी (अमेरिका) शायद अधिक विस्तार से जानकारी दे सकें क्यूंकि ऐसे कुछ लेखक अमेरिकी है.

५. मैं अनेकों बार पहले भी निवेदन कर चुका हूँ कि यह पूरी तरह से असत्य है की भारत में अतीत काल में अस्पृश्यता थी. १८२० से १८३५ तक के एडम और मैकाले के सर्वेक्षणों से इसके ठोस प्रमाण मिलते हैं की भारत में डोम, नाइ, ब्राहमण, क्षत्रीय, चंडाल तक साथ मिलकर पाठशालाओं में पढ़ते, पढाते और रहते व खाते, पीते थे. जातियां तो थीं पर उनमें छुआ-छूत या किसी भी प्रकार का ऊंच-नीच का भाव नहीं था. श्री धर्मपाल जी ने ब्रिटेन के पुस्तकालयों में ३० साल तक अध्ययन करके ये सारे तथ्य ” दी ब्यूटीफुल ट्री ” नामक पुस्तक में विस्तार से दिए हैं. सर्वेक्षण रपटें व सन्दर्भ साफ़, साफ़ उधृत किये गए है…… विचार और खोज की बात तो यह है की मैकाले व उसके साथियों और उनके डा. मीणा जी जैसे मानस पुत्रों ने भारत के इस स्वरुप को कैसे विकृत किया, जातिवाद की आग लगा कर हिन्दू समाज ही नहीं सारे देश को दुर्बल बना दिया, समाज को टुकड़ों में बाँट दिया तो कसे यह सब किया ? कमाल तो यह है की ये सब किया हमारे हित व कल्याण के नाम पर. …. इतिहास के इस अविश्वसनीय लगने वाले तथ्यों को हमारे शत्रु या काले अँगरेज़ तो कभी भी जानने का प्रयास करेंगे नहीं, पर हर देशभक्त को इन तथ्यों को जानने का प्रयास करना चाहिए. जहां से हमारी जड़े खोदी गयी हैं , वहाँ तक तो जाना ही पडेगा.

पुनश्‍च:

एक ख़ास बात रह गयी. हिन्दुओं के धर्म ग्रंथों और संस्कृति की आलोचना करने को उचित ठहराने की बात अनेकों बार सही ठहराने के कोशिश आप द्वारा की जा चुकी है. ताकि हम अपनी जड़ें स्वयं खोदते रहें और दूसरों द्वारा हमारे जड़ें खोदे जाने को गलत न कहें ? यही मतलब हुआ न ? … यदि ये आत्म आलोचना या स्व निंदा बड़ी उत्तम बात है तो मीना जी आपने यह उपदेश कभी मुस्लिम बंधुओं को दिया ? अनेक सम्प्रदायों में बनते हुए ईसाई मित्रों को ये परामर्श दिया ? नहीं न ? तो फिर ये आत्म निंदा का उपदेश, ये हीन भावना बढ़ने व जगाने वाला उपदेश हिन्दू समाज के लिए ही क्यूँ है ? यही चाहते हैं न आप लोग कि आत्म आलोचना के नाम पर हिन्दू समाज के ग्रंथों, परम्पराओं व संस्कृति की इतनी दुर्दशा की जाये कि कोई भी हिन्दू स्वयं को हिन्दू कहलाने में शर्म महसूस करे. मुझे तो स्पष्ट लगता है कि आपके अधिकांश लेखों का छद्म उद्देश्य यही है. एक उद्देश्य होता है आप सरीखों का कि समाज को अधिक से अधिक टुकड़ों में कैसे बांटा जाए. आपके सारे लेखों को यदि एकत्रित कर के देखा जाए तो कोई भी यह अर्थ सरलता से निकाल लेगा. यदि आप अल्प संख्यकों के सचमुच हित चिन्तक हैं तो बतलाईये कि आज तक आपने किस किस के कोई काम करवाए जिनसे उन अल्प संख्यकों का कोई भला हुआ हो ? आखिर इतनी बड़ी संस्था है न आप की जिसके आप प्रमुख हैं . क्या काम किये हैं आप लोगों ने अभीतक जो समाज के हित में या भारत देश के हित में हों ? उचित समझें तो ज़रा पाठकों को बतलाने की कृपा करें. .. महोदय आप इतना कड़वा, इतना अनर्गल व अनुचित लेखन करते हैं, इतनी कुटिलता होती है, इतने गुप्त प्रहार होते हैं कि न चाहते हुए भी कुछ कठोर भाषा का प्रयोग करना ही पड़ जाता है….. अस्तु आपका शुभचिंतक

27 Responses to “ये हैं हिंदुओं के वास्‍तविक दुश्‍मन”

  1. डॉ राजीव कुमार रावत

    विद्वान साथियो.
    मैं पता नहीं क्यूं हिंदू हूं ऐसा मेरे घर वालों ने समाज ने बताया . पर न तो मेरे ब्राह्मण पिता ने कभी मेरे मुस्लिम मित्रों को रोका आने जाने से और न मैंने कभी एसा सोचा कि ये मुस्लमान हैं- कह कह के जरुर इस समाज के कुछ धुरंधर ये काम कर रहे हैं और पीढि़यों तक पहुंचा रहे हैं
    रहा मंदिरों में भेदभाव- कहां नहीं होता-बैसे तो मैंने कहीं किसी मंदिर में देखा नहीं कि कोई डिटेक्टर लेके खड़ा होता हो और कहता हो कि कौन हिंदू है- जितने नौंटकींबाज दरगाह शरीफ पहुंचते हैं दिखाने को, फोटो खिंचाने को, मंदिर जाने में क्यों डरते हैं.
    मेरे विचार से अब मीणा जी जैसे अति अप्राकृतिक विद्वानों को लिखना छोड़ समाज में जाना चाहिए और वजाए बघिया उधेड़ने के कुछ जमीनी कसरत करनी चाहिए. अगर कोढ़ है तो उसका इलाज करिए उसकी तरह तरह से फोटो खीचकर व्यापार मत करिए. वह लिखना किस काम का जो न प्रसन्नता देता हो पढ़ने वाले को और न उसमे कोई समाधान हो बस शब्दवीरता हो.
    जातियों समाजों में सब में कमियां हैं सब में अमानवीयता भी है और एक चीज ध्यान में रहनी चाहिए कि कोई भी आदर्श स्थिति नहीं होती न कभी थी न कभी है न कभी होगी-
    इस लिए वर्तमान को सुधारने में यदि कोई योगदान हम दे सकते हैं वही ठीक है- कमजोर तांगे के घोड़े को हम फटकारते रहें चाबुक चलाते रहें और तांगे में बैठे भी रहें और अपने जागरुक होने का सम्मान चाहें- शायद यह सनक ठीक नहीं है- हमारे बचपन में हमें चोट लगती है कोई आपरेशन होता है तो क्या सारे जीवन हम उन्हें याद रखते हैं-ऐसे ही यह समाज एक शरीर है और इसके भरे जख्मों को विद्वान लेखक ठेकेदार
    (अ) मानवाधिकारी प्रचारित न करें तो सब ठीक हो जाएगा – पर और इन लोगों की योग्यता ही क्या है दुकान बंद हो जाएगी- अच्छा एक बड़े आश्चर्य की बात है कि आप कितने ही सबाल उठाइए कश्मीरी पंडितों के मंदिरो के तोड़ने को असम के नागालैंड के बनबासियों के—– ये जबाव किसी के नहीं देते- बस अपनी राग ही अलापेंगे- खैर भगवान सब को सद्बुबुद्धि दे मुझे भी मीणा जी को भी- प्रणाम

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  2. RAJ

    पता नहीं जाती व्यवस्था के बारे मैं मुझे तो दकोसला लगता है वैसे जाती व्यवस्था लागु की गयी होंगी सभी के मर्जी से की गयी होंगी , पर उससे फायदा नहीं हुआ है उल्टा नुकसान ही हुआ है सायद हम भूल गए है की afghanithan और बाकि के स्थान जो दुनिया मैं है वो सब अभी हिन्दू नहीं रहे , इस्लाम की तलवार के आगे झुक गए अगर दूसरा उपाय धुंध होता तो सायद इस्लाम इस धरती पे इतनी बड़ी संख्या मैं नहीं होता

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  3. swamisamvitchaitanya

    हिन्दू स्वयम अपने दुश्मन है कई सम्प्रदायों में विभाजित धर्म और जिवाव के बारे में शून्य और बाते करने में आगे

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  4. डॉ. मधुसूदन

    Prof. Madhusudan

    आदरणीय सिंह साहब (१) महोदय जी,मैं ने तो, यह “Castes of Mind” by Nicholas Dirks,और
    “Homo Hierchicas ” by Luis Dumont
    पुस्तकों में जो कहा गया है, वह लिखा है| (६५० पृष्ठ)
    उसको हर भारतीय ने पढ़ना जानना चाहिए| मैं ने अभी पूरा पढ़ा भी नहीं है|मेरा विषय ना होनेसे, और पुस्तकें अंग्रेजी होनेसे भी और ही अधिक समय लगता है| फिर जीविका भी जुटानी होती है|
    (२) सच्चाई हमेशा श्वेत-कृष्ण नहीं होती| यहाँ भी नहीं है| हर पहलू को परखने से सच्चाई पता चलने की संभावना बढ़ सकती है|
    शट दर्शन में भी, छः अलग दृष्टी बिंदु होते हैं, आप जानते ही होंगे|
    (३) यहाँ, मैं अपनी मान्यता ओं की तो बात ही नहीं कर रहा|
    (4)मुझे तो बहुत अचरज हुआ जब मैं ने इन पुस्तकों में पढ़ा कि वह जाती व्यवस्था थी, जिसके कारण हम सभी आज “भारत” बचा पाए है|
    नहीं तो आज आप न सिंह होते न मैं मधुसुदन|
    (5)तब मुझे पता चला, क्यों,(किस कारण)
    यूनानो मिस्र रोमा सब मिट गए जहांसे||
    अब तक मगर है बाकी नामों निशाँ हमारा||
    कुछ बात है की ऐसी —
    तो कौनसी बात है? आप की दृष्टी से?
    यह लेखक जाती-और वर्ण मानते हैं|
    (6) “संसार में पूर्णता कहीं भी नहीं है”.. विवेकानंद
    (7) Egalitarian समाज से आप भारतीय समाज की तुलना करके देखीए | और उस पर कभी लिखिए |
    (8) दो से तीन निबंधों में इसे मैं करना चाहता हूँ|
    छुआछूत से लेकर सारे पहलू लूँगा| पश्चिम और पूरब सामाजिक तुलना करूंगा| दोनों की त्रुटियाँ और गुणवत्ता रखूँगा| आप तब सारे सवाल कीजिएगा|
    (9) “समानता कृत्रिम है” ऐसा लुईस Dumont कहता है –जो “जाती व्यवस्था” पर पाठ्य पुस्तक का २० वी शतिका सबसे तगड़ा लेखक माना जाता है|
    (10) दोनों प्रणालियों में त्रुटियाँ है, मैं मानता हूँ|पर मुझे भारतीय प्रणाली में त्रुटियाँ कम नज़र आती है| लुईस को भी|
    इस टिपण्णी के निष्कर्ष अंतिम ना समझे| लेख की राह देखने की सविनय बिनती| धन्यवाद|

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  5. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    तो डा. मीणा जी आप आही गए . मुझे भी विश्वास था की आप इस अवसर पर ज़रूर प्रगट होंगे और समाज में दरारें पैदा करने, विद्वेष बढाने के अपने प्रिय कार्य को करने का कोई भी अवसर क्यूँ छोड़ेंगे. जितने सवाल इस उपरोक्त लेख में हैं, उनमें से एक का भी उत्तर महोदय आपने नहीं दिया. प्रो. कुसुमलता केडिया जी के लेख पर एक भी तर्कसंगत तो क्या कैसा भी उत्तर नहीं दिया. उनके इतने विद्वत्ता पूर्ण और ऐतिहासिक प्रमाणों से भरपूर लेख को बेकार बतला अपनी विद्वत्ता (?) का परिचय दे दिया. उत्तर नहीं दे सकते तो वहां प्रकट ही न होते तो आपकी लाज रह जाती. मेरे और उनके लेखों का उत्तर देने से भागने के कारण पाठकों को आपकी नीयत और समझ का अधिक अच्छी तरह पता चल गया. ……… अब ज़रा बात करते हैं आपकी इस टिपण्णी के बारे में. व्यक्ती के भीतर जो भरा होता है वही बहार आता है. ज़रा आप देखें की आपके भीतर क्या भरा है. ” कुकर्मी पूर्वज, गालीगलौच, नीच जाती, दुष्कर्मी, दुष्ट, ज़हरीले कीड़े, बौधिक ज़हर, कलंक” . एक छोटी सी टिपण्णी में आपने इतने सारे शांति, सभ्यता और अपनी सोच व व्यक्तित्व का परिचय देने वाले शब्दों का प्रयोग कर डाला. मुझे कुछ विशेष कहने की आवश्यकता नहीं. आपके भीतर क्या है, साफ़ नज़र आ रहा है. आपकी नीयत आपके भाषा से प्रगट हो ही जाती है. फिर से दोहराता हूँ की ईश्वर आपको सदबुधि दे.

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  6. आर. सिंह

    आर.सिंह

    ऐसे तो यहाँ विवाद ने ऐसा रूप ले लिया है की किसी को भी निष्पक्ष रूप में सही और गलत की मीमांसा करना बहुत कठिन होगा,पर अगर प्रोफ़ेसर मधुसुदन ऐसा कहतें हैं की “1823 में दुबोईस नामक फ़्रांसिसी मिशनरी के आलेख के अनुसार, जाती व्यवस्था के कारण ही हिन्दूओं का धर्मान्तरण असंभव था|” तो शायद यह प्रमाणित हो जाता है की हिन्दुओं में जाति प्रथा कम से कम इससे पहले से विद्यमान थी और हिदू मनु के वर्णाश्रम के चार स्तम्भों से ज्यादा भाग में विभाजित हो चुके थे.. .अब जो दूसरी बात विवाद का विषय है ,वह यह है की जाति प्रथा के साथ छुआ छूत था या नहीं .अगर प्रोफ़ेसर साहब इस पर भी प्रकाश डालें तो ज्यादा अच्छा हो,

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  7. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    सिंह साहेब सचमुच आपने सिरफिरा शब्द मेरे लिए प्रयोग नहीं किया है. मुझे इस विषय में गलती लगी है.
    मैं भी इस विषय में खेद प्रकट करता हूँ. जहां तक विद्वान होने की बात है सो मैं विद्यार्थी तो हूँ पर विद्वान नहीं. एकांगी सोच के बारे में मैं केवल इतना प्रयास करता रहता हूँ कि मैं पूर्वाग्रही न बनूँ. मेरे अनेक मित्र पक्के कम्युनिस्ट, पक्के संघी, अनीश्वर वादी भी हैं. उनके साथ बड़े ठन्डे दिमाग के साथ लम्बी बहस और चर्चा होती रहती है.पर मित्रता में कभी कोई कटुता नहीं आई. फिर भी मनुष्य के नाते मैं अपूर्ण हूँ, जब भी समझ आता है कि कुछ वैचारिक भूल है तो उसे सुधारने और नया सीखने का इमानदारी से प्रयास करता रहता हूँ. ईश्वर कृपा से अभीतक यह भ्रम या घमंड तो नहीं हुआ की मैं सबसे अधिक जानता हूँ. आपसे कुछ सीख सका तो वह भी सीखूंगा. अपना शेष सारा जीवन इसी के लिए समर्पित करने का प्रयास रहता है कि समाज जैसा है उससे कुछ अधिक अच्छा बनाने में जो भी योगदान हो सके करदें. समस्याओं के मूल कारणों को जान-समझ कर उसके समाधान के संभव प्रयास किये जाएँ. …… महोदय मुझे आपकी नीयत पर अनास्था नहीं विश्वास और श्रधा है. मुझे लगता है कि समाज की समस्याओं और उनके समाधान के उपायों के बारे में मतभेद है. इसका कारण हमारी सूचनाओं व अध्ययन के साहित्य में अंतर व जीवन में घटी घटनाओं के प्रति दृष्टी कोण में अंतर हो सकता है. मत भिन्नता से कटुता तो नहीं आनी चाहिए. केवल भारत की परम्परा है कि यहाँ परस्पर विरोधी मत के लोग भी सह जीवन व्यतीत करते है. अनेक भाषाए, अनेक सम्प्रदाय ( पर मूल संस्कृति एक ) , अनेक रीति-रिवाज़ यहाँ हैं. गौतम जी के लेख पर आपकी टिपण्णी से मैं समझ सकता हूँ कि आप इस तथ्य को जानते हैं कि मत भिन्नता का अर्थ शत्रुता की परम्परा सेमेटिक सम्प्रदायों की है. असहमति के लिए वहाँ स्थान ही नहीं. या तो सहमत हो जाओ या मरो. इस्लाम, ईसाइयत, साम्यवाद आदि विचारधाराएँ इसी वर्ग में आती हैं……अंत में आशा करता हूँ संवाद कम-अधि जो भी हो पर स्नेह बनाए रखेंगे.. धन्यवाद सहित, सादर…

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  8. -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    आदरणीय श्री आर सिंह साहब|
    नमस्कार|

    मुझे तो पहले से ही ज्ञात है कि प्रवक्ता पर ऐसे पाठकों का झुण्ड या कहोगैंग है, जो चाहता ही नहीं, कि उनके पूर्वजों के कुकर्मों द्वारा स्थापित मनमानी व्यवस्था के खिलाफ कोई बोले! अत: मुझे शुरू से ही लग रहा था कि आपको बहुत जल्दी कटघरे में खड़ा किया जाने वाला है| इससे पहले कि आपको गाली-गंलोच भरी भाषा में अलंकृत करके ये लोग अपनी स्वघोषित संसार की सर्वोत्तम संस्कृति का परिचय देते आपने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जिससे इनके वैचारिक धरातल की चूलें हिल गयी| इनके पास आपके इस कथन के बारे में कहने को कुछ भी नहीं है :

    ‘‘गन्दा करे वह तो उच्च जाति का और जो साफ करे वह नीच जाति का हुआ, जबकि होना यह चाहिये था कि जो सफाई करे उसका सम्मान समाज में सबसे ज्यादा हो, जो गन्दा करता है?’’

    अत: मेरा अनुभव तो यही कहता है कि दुष्टों और अपराधियों के दुष्कर्मों का उल्लेख करते समय यदि इंसाफ पसन्द लोग यह सोचकर भय से कांपने लगे कि दुष्ट और दुष्कर्मी नाराज होंगे तो देश में इंसाफ का नाम लेने वाला कोई नहीं बचेगा| जज जब गुण्डों को सजा देता है तो उस समय वह सिर्फ इंसाफ कर रहा होता है| उसे गुण्डों को समर्थन देने वाले राजनेताओं का भय नहीं होता है| इसी के परिणामस्वरूप वह न्याय कर पाता है| इसी प्रकार से लेखक को लिखते समय केवल अपने लेखकीय धर्म का पालन करना चाहिये, समाज सुधारक को समाज के जहरीले कीड़ों को निकानफेंकने के लिये कार्य करते समय कीड़ों के जहर की परवाह नहीं करनी होती है, बेशक इससे कुछ कथित राष्ट्रभक्तों और छद्महिन्दुत्ववादियों को मिर्ची लगें| उन्हें तो लगनी हैं, क्योंकि जब तक ऐसे रुग्ण विचारों से गस्त और जन्मजातीय कुलीनता के थोथे अहंकार से ग्रस्त लोगों के शिकंजे से इस देश को मुक्त नहीं किया जाता है, तब तक इस देश में इंसाफ सम्भव नहीं है! आज नहीं तो कल इन आतताईयों का अन्त तय है| खुशी की बात है कि इनमें से बहुतों को अहसास हो गया है कि उनके पूर्वजों ने जो कुकर्म किये थे, वे मानवता के चेहरे पर कभी न मिटने वाले कलंक हैं| ऐसे लोग आज हमारे साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर रुग्ण लोगों द्वारा फैलाये जा रहे बौद्धिक जहर के खिलाफ कार्य कर रहे हैं|

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  9. डॉ. मधुसूदन

    Prof. Madhusudan

    डॉक्टर राजेश कपूर जी, विलम्ब से और संक्षेप में उत्तर दे रहा हूँ| प्रवास पर हूँ| पूरा लेख समय लेकर दूंगा| कुछ उद्धरण प्रस्तुत है “Castes of Mind ” Nicholas Dirks की पुस्तक से|
    (१) 1823 में दुबोईस नामक फ़्रांसिसी मिशनरी के आलेख के अनुसार, जाती व्यवस्था के कारण ही हिन्दूओं का धर्मान्तरण असंभव था|
    (२) कहता है कि भारत बार बार परकीय सत्ताके जुए तले से गुजरा पर उसकी जाती व्यवस्था ने उसे मतांतरण से बचाकर सुरक्षित रखा|
    (३) Without Brahmanically ordered caste system, Dubois felt that India would “necessarily fall into a state of hopeless anarchy, and …….
    (4) Alexander Duff, in the Madras missionary Conference in 1850 , put forward a minute, in which was held, “Caste …is one of the greatest obstacles to the progress of the Gospel in India…..
    (5) Caste was consistently seen as the primary enemy of conversion.—
    बहुत ही बड़ा विषय अनेक सन्दर्भों से दिया गया है|
    (६) मनुस्मृति की प्रशंसा की गयी है| हमारे अनगिनत शास्त्रों, और १०८ उपनिषदों, ६ दर्शन, १८ पुराण. १८ उप पुराण, गीता, रामायण, महाभारत इत्यादि इत्यादि— क्या संन्यस्ताश्रम के समर्पित योगदान हो सकता था?
    सारा, ब्रिटिश लेखागार में उपलब्ध है, पर हमारे इतिहास लेखक जो नहीं खोजते वह निकोलस Dirks खोजकर लाया है| ||साहेब वाक्यं प्रमाणं||
    उत्तर देने में विलम्ब होगा|

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  10. आर. सिंह

    आर.सिंह

    कपूर साहेब मेरी टिप्पणी को फिर से पढिये.मैंने आपको सिरफिरा नहीं कहा.मैं अपने टिप्पणी के उस भाग को उद्धृत कर रहा हूँ,
    “ऐसे अपनी ओर से मैंने वार्तालाप बंद कर दिया था ,पर आपका उद्वेग पढ़ कर लगा की अगर मैं चुप रह जाता हूँ तो कम से कम दो बाते होगी ,एक तो आप खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचें वाली स्थिति से गुजरेंगे या फिर मेरे बारे में यह सोच कर संतोष कर लेंगे की नाहक एक सिरफिरे के मुंह लगा..कपूर जी मैं अपने को एक सिरफिरा ही मानता हूँ “.अगर आप अपनी उतेजना को परे रख कर पढ़ेंगे तो आप को पता चल जाएगा की सिरफिरा शब्द मैंने अपने लिए इस्तेमाल किया है आपके लिए नहीं. .ऐसे भी आप जैसे विद्वान को मैं सिरफिरा कहने की गुस्ताखी कर ही नही सकता.आपने और बहुत कुछ भी लिखा हैतो आपको बतादूँ की मैं ऐसा असंतुलित कभी नहीं होता की मुझे बाद में अपने किये पर पछताना पड़े.आपको एक सलाह देता हूँ आप ठंढे दिमाग से अपने इस लेख से लेकर मेरी टिप्पणियों तक को फिर से अवलोकन कीजिये,आपको स्वयं अपनी गलती समझ में आ जायेगी.आपने मौक़ा दिया है तो एक बात और बता दूं की आपका यह एकांगी दृष्टिकोण केवल इसी लेख में नहीं दिख रहा है,बल्कि अन्य लेखों में भी झलकता है,पर आपतो इसे मानेंगे नहीं ,इसलिए मेरा यह कहना भी बेकार ही है.

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  11. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    मान्यवर महोदय आर. सिंह जी अप ठीक कहते हैं कि आगे अब संवाद नहीं बढाया जा सकता. मैं आपके लिए उन उपमाओं का प्रयोग नहीं कर सकूंगा जिनका आपने मेरे सम्मान में किया है. श्रेष्ठता के अपने अहंकार को कुछ क्षण एक और रख कर थोड़े ठन्डे दिमाग से सोचियेगा कि आखिर मुझ ” सरफिरे ” का अपराध क्या है जो अप सभ्यता ही भूल गए ? आपके तर्क को तर्क से काटने का प्रयास आपकी नज़र में इतना बड़ा अपराध है की आप क्रोध में असंतुलित हो गए, या आप आयु में बड़े हैं इस लिए अपशब्दों का प्रयोग उचित है ? सचमुच इस मानसिकता के साथ तो संवाद संभव नहीं है. आपको मेरी बातों से जो कष्ट हुआ, उसके लिए मुझे खेद है. शायद मैंने ही गलत दवाजा संवाद हेतु खटखटा दिया.

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  12. आर. सिंह

    आर.सिंह

    ऐसे अपनी ओर से मैंने वार्तालाप बंद कर दिया था ,पर आपका उद्वेग पढ़ कर लगा की अगर मैं चुप रह जाता हूँ तो कम से कम दो बाते होगी ,एक तो आप खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचें वाली स्थिति से गुजरेंगे या फिर मेरे बारे में यह सोच कर संतोष कर लेंगे की नाहक एक सिरफिरे के मुंह लगा..कपूर जी मैं अपने को एक सिरफिरा ही मानता हूँ .मैं जिन्दगी भर धारा के विरुद्ध चला हूँ..आप पता नहीं मेरे जैसे साधारण व्यक्तियों का लेखन पढ़ते है की नहीं,पर अगर आपको फुर्सत मिले तो मेरी प्रवक्ता पर उपलब्ध दो रचनाएं पढने का कष्ट कीजियेगा’.’धारा के विरुद्ध’ नामक कविता और ‘वे दिन’ नामक संस्मरणात्मक कहानी.पहली रचना जहां मेरी मानसिकता को दर्शाती है,वही दूसरी उस माहौल को दर्शित करती है,जसके साथ मैं पला बढ़ा हूँ.पुस्तकें पढने का शौक औरजिज्ञाशा जो वचपन से शुरू हुई थी वह आज भी ख़त्म नहीं हुई है.पर जीवन ने एक चीज अवश्य सिखाया है की जो लिखा गया है या जो दूसरे कहते है उसको बिना तर्क की कसौटी पर कसे स्वीकार मत करो.रही विदेश की बात तो मैं जानता हूँ की दूसरों की तुलना में मेरा विदेश का अनुभव बहुत ही कम है,पर जब मैं डाक्टर कलाम जैसे लोगों को पढता हूँ,जिन्होंने लिखा है की हम जब दूसरे देशों में जाकर हर तरह के अनुशासन को मानने लगते हैं तो अपने देश में आते ही अनुशासन हीन क्यों हो जाते हैं?इस क्यों का उत्तर मुझे आज भी नहीं मिला है.जब एक नव युवक मुझसे कहता है की मैं अमेरिका में तो ठहर ही नहीं सकता ,क्योंकि वहां तो थूकने की भी आजादी नहीं है,तो मुझ जैसे लोगोंको सोचने पर वाध्य होना पड़ता है.मैं फिर दुहराता हूँ की दूसरे में एक नहीं अनेक बुराइयां हो सकती हैं है,पर मुझे यह भी मालूम है की हिन्दू समाज में और खास कर हमारे समाज के उच्च कहे जाने वालों में आरम्भ से ही बुराइयां इतनी गहरी बैठ गयी हैं की अब तो उनको यह दिखता भी नहीं. एकलव्य की कहानी आज की नहीं है. एक बार मेरे छोटे भाई ने ,जो बिहार में डाक्टर है एक बहुत बड़ी बात कही थी की भैया यह कब तक चलेगा की जो गंदा करे वह तो उच्च जाति का हुआ और जो साफ करे वह नीच जाति का हुआ,जब की होना यह चाहिए था की जो सफाई करे उसका सम्मान समाज में उससे ज्यादा हो,जो गंदा करता है.कपूर साहब मैं फिर कहता हूँ की ,कबीर दास की वाणी याद कीजिये,
    बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोए .
    जो दिल ढूंढा आपना मुझ सा बुरा न कोए.
    यही आकर आप लोगों में और मुझ जैसे लोगों में फर्क हो जाता है,क्योंकि मैं महात्मा गांधी के उस कथन में विश्वास करता हूँ की जब तक मैं गुड खाना नहीं छोड़ता,दूसरों को गुड खाने से रोकने का मुझे कोई अधिकार नहीं.अगर मैं गलत भी हूँ तो अब तो इस तरह की गलती करना स्वभाव हो गया है अगर इस कथन में भी आपको पूर्वाग्रह या दुराग्रह दिखता है तो आपके दृष्टिकोण को तो मैं नहीं बदल सकता.अब तो आप शायद यह सोच कर मेरी जान बख्श दे की एक मुर्ख के मुंह क्या लगना. कपूर साहेब आपातकाल में मैं जेल तो नहीं गया,अतः वह तगमा मुझे नहीं मिला,पर अन्याय का विरोध मैं हमेशा करता रहा हूँ और यह काम आपातकाल में भी मैंने अपने ढंग से अवश्य किया था.

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  13. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    संवाद की कृपा के लिए सिंह महोदय आपका धन्यवाद. (१).आपने निर्णय दे दिया की अब विषय को आपकी ओर से बंद किया जाता है. महोदय यह तो तानाशाही मानसिकता नहीं है ? आप मुझ पर आरोप लगाए बिना विषय को बंद कर देते तो सही होता. अपने मुझ पर जो आक्षेप लगाये हैं, कृपा करके उनका उत्तर देने का अधिकार मुझसे न छीनें. यह तो जियादती हो जायेगी. असहमति के प्रति उदारता का भाव तो बना रहना चाहिए. (२). मुझे कभी यह भ्रम तो आज तक नहीं हुआ की मुझ से अधिक जानकारी किसी को नहीं. मैं तो आज भी साठ साल की आयु में अनेक प्रश्नों के समाधान के लिए कई घंटे तक पढता और विद्वानों की सगत में जाकर सीखने का प्रयास करता रहता हूँ. मेरी किस बात से आपको लगा है कि मैं स्वयं को सबसे अधिक ग्यानी समझ रहा हूँ ? प्रमाण देकर कुछ कहें तो सहर्ष आपकी बात मानूंगा. आपके साथ घटी कुछ घटनाएँ प्रमाण नहीं हो सकतीं. वे केवल आपका अनुभव मात्र है. किसी विद्वान द्वारा सर्वेक्षण, शोध द्वारा स्थापित स्थापनाओं को काटने के लिए तो शोध ही होना चाहिए. इतना तो हम सब समझ ही सकते हैं. या फिर अनेक लोगों के अनुभव एक जैसे हों तो भी वह बात प्रमाणिक हो सकती है. (३). बाल की खाल निकालने की क्या बात है ? आपके कथनों की गहराई तक जाना-समझना आपको पसंद नहीं ? क्या आपकी किसी बात का अर्थ समझने में मुझ से भूल हुई है ऐसा है तो मैं उसे सुधारने को तैयार हूँ. (४). आपको अपने विचारों में कोई दुराग्रह और पूर्वाग्रह नज़र नहीं आता. अधिकाँश लोगों के साथ ऐसा ही होता है. हिन्दू समाज के बुरा होने ओर पश्चिमी समाज के अछा होने का आपका अतिवादी दुराग्रह और पूर्वाग्रह नहीं तो और क्या है ? अप किसी भी तर्क या प्रमाण के आधार पर इसमें संशोधन के लिया तैयार नहीं. महोदय इसी को पूर्वाग्रह कहते हैं, यही दुराग्रह है, वैचारिक कंडीशनिंग है. (५).मुस्लिमों और ईसाईयों के प्रति आपकी उदारता ओर हिन्दुओं के प्रति आपकी संकीर्णता की पराकाष्ठा है. आपके अनुसार ईसाई सम्प्रदायों में हत्याकांड तो कितने भी होते हों पर उनमें अस्पृश्यता नहीं है, इसलिए वे लाखों की निर्मम ह्त्या करके भी हिन्दुओं से अछे हैं. यानी यदि हिन्दू भी सम्प्रदायों के नाम पर आपस में हत्याकांड करें पर अस्पृश्यता न हो तो वे वर्तमान स्थिति से अधिक अछा है. अतः मुस्लिम व ईसाई हिन्दुओं से हर हाल में अधिक अछे है. इतनी ज़ियादती ….. ? हिन्दुओं के प्रति इतना विद्वेष … ? यह तो हद ही है. तो अब भी आप कहेंगे कि आप में पूर्वाग्रह नहीं हैं ? (६). अधूरा ज्ञान खतराए जान. जनाब आप जिस सन्डे टाईम्स ऑफ़ इंडिया की बात कर रहे हैं उन अख़बारों में सुनियोजित ढंग से हिन्दू विरोधी मुहीम चलाई जाती है. भारत के उन्ही शत्रुओं द्वारा लिखी इन प्रायोजित रपटों, लेखों के शिकार बन कर अनेकों अप सरीखे पढ़े-लिखे लोग अपने हिन्दुओं से घृणा करने लगते है. श्री राजाराम की शोध रपट में इसकी विस्तृत जानकारी दी गयी है जिसे एक बार प्रवक्ता पर दे चुका हूँ. क्या आप उसे पढेंगे ? इस रपट के अनुसार भारत के अधिकाँश टी.वी.चैनल तथा प्रिंट मीडिया विश्व के अनेक चर्चों द्वारा खरीद लिए गए है. है न कमाल की बात ? आखिर चर्च भारत के मीडिया को खरीदने पर करोड़ों रुपया हर वर्ष क्यूँ खर्च कर रहा है ? जानना चाहेंगे आप ? शायद नहीं. हिन्दुओं को लताडने की कोई बात होती तो आप ज़रूर जानने में रूचि लेते. हिन्दुओं पर हो रहे आक्रमण को जानने और उससे रक्षा के उपायों के बारे में है आपकी रूचि ? (6) आपका सन्देश और नेक सलाह सर-माथे. पर आपको हमारी नीयत पर ऐसा अविश्वास क्यूँ है की हम दूसरों की बुराईयों को इस लिए गिन रहे हैं कि हमें उनकी आड़ में स्वयं बुरे काम करने का लाईसेंस लेना है. एक और अहुचित बात. यानी आप सही हैं और सब की नीयत खराब है ? इतनी जियादती तो न करिए. ज़रा दूसरों की नियत पर भी तो भरोसा करिए. क्या हम समाज को बुरा बनाने के लिए काम कर रहे हैं ? हमारी बात को भी तो समझने का प्रयास करिए, केवल अपनी कहेंगे तो कैसे चलेगा.. ? (७) जो हमारे समाज में हीनता के बीज १५० साल से बो रहे हैं और सफल हो रहे हैं, उनकी वास्तविकता को उजागर कर देने में आप को बुरा क्यूँ लगता है…? हमने कभी नहीं कहा और न चाह है कि हिन्दू समाज की बुराईयों पर पर्दा डाला जाये. अनेकों बार दोहराया है कि समाज की केवल बुराईयों की नहीं, अछईयों की भी चर्चा होना चाहिए जिससे अछा बनने को प्रोत्साहन मिले और बुराईयों को दूर करने की प्रेरणा मिले. जो हिन्दुओं से, हिन्दू समाज से प्यार नहीं रखते, उनसे घृणा करते हैं : उनके उपदेश या सलाह की परवाह कोई हिन्दू क्यूँ करेगा ? यदि किसी को सुधारना हो तो उसके प्रति प्रेम की भावना तो हो.
    (८) एक और निवेदन कर दूँ कि शिया, सुन्नी व ईसाईयों के अनेक वर्गों से मेरा सीधा संपर्क है. उनके साथ काम करने के अनेक अवसर मिलते हैं. अतः यह तो न कहें कि आप विदेश जा आये तो आप जो जानते हैं वह अधिक प्रमाणिक हो गया. प्रो. मधुसुदन शर्मा जी भी तो अमेरिका में रहते हैं. वे तो वहाँ की संस्कृति और समाज के प्रशंसक नहीं बने. फ्रांस्वा,गोयातियर जैसे आधुनिक विद्वान तोपश्चिम की संस्कृति को भारत से बहुत बुरा बतला रहे हैं. हम भी अपनी उन विशेषताओं को समझ कर उनसे प्रेरणा पाने और देने का प्रयास कर रहे हैं तो इसमें गलत क्या है …? विदेशों में आप ने पता नहीं कितना, क्या देखा-समझा. पर अनेक विचारक और समाज शास्त्र के विज्ञानी भारत आने पर भारत की संस्कृति के प्रशंसक बन जाते हैं. क्या आप भारत की उन विशेषताओं के बारे में जानते हैं ? केवल कमियों को ही क्यूँ जाना है आपने ? गुणों व विशेषताओं को भी तो जाना होता. तब आपकी बात एकांगी न होती, संतुलित होती. # आपकी बात मुझे बहुत पसंद आई की हमें अपनी कमियों को पहचान कर उन्हें दूर करना चाहिए. पर समाज के शत्रुओं को पहचान पर पर्दा डालने से देश नहीं बचने वाला. उन्हें पहचान कर उनका समाधान तो करना ही होता है. * संवाद में ज़रूरी तो नहीं की हर बात हमारी मर्जी की सब कहें. अतः असहमति सहन करने व तर्क करने का धैर्य और विरोध सहन करने की उदारता संवाद में जरुरी है और ये गुण आप में काफी है. . … आशा है की यदि प्रति उत्तर देंगे तो बिना बुरा माने अपनी बात कहने की कृपा करेंगे और मेरे अभिव्यक्ति के अधिकार का विरोध नहीं करेंगे.

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  14. आर. सिंह

    आर.सिंह

    कपूर जी ,आपके साथ यही दिक्कत है की आप हमेशा कठ तर्क पर उत्तर आते हैं और समझते हैं की आप से ज्यादा जानकारी किसी को है ही नहीं.यह सत्य भी हो सकता है,पर यह अपने मुंह से कहने कीबात नहीं.दूसरों को तो मौक़ा दीजिये की आपका सही मूल्यांकन कर सके .मैंने तो बार बार स्वीकार किया है की मैं कोई विद्वान या विचारक नही,बल्कि एक आम आदमी हूँ और उसीकी भाषा बोलता हूँ..हाँ इतना अवश्य है की मेरे विचारों में न कोई दुराग्रह है न कोई पूर्वाग्रह.मैंने जब छुआ छूत की बात की थी तो मुझे मालूम था की आप जैसे स्वयम्भू विचारक और विद्वान अपने तर्क अवश्य प्रस्तुत करेंगे,पर एक तो आपका ज्ञान पता नहीं हिंदुत्व के बारे में कितना गहरा है,पर यह अवश्य है की आप शिया और सुन्नी या ,कैथोलिक और प्रोतेस्तैंत के सम्पर्क में आये ही नहीं.आपको बता दूं की शिया सुन्नी या कैथोलिक प्रोतेस्तैंत लड़ाई चाहे जो रूप ले,पर आपसी छुआछूत उनमे एकदम नहीं है.यह कानों सोनी या अन्तर्जल के माध्यम की बात नहीं है यह मेरा निजी अनुभव है,क्योंकि एक तो मं ऐसे संस्थानों का छात्र रहा हूँ जहाँ हर धर्म या मजहब के लोगों के सम्पक में आने का मौक़ा मिला या फिर नौकरी भी सरकारी केन्द्रीय उद्योगों में की और थोड़ा मौक़ा विदेश जाने का भी मिला.अतः ये सब अनुभव लाभ हुआ .ऐसे शैव और वैष्णव की लड़ाई या बौध और स्नातानिओं की लड़ाई के बारे में भी आपने अंतरजाल पर पढ़ा होगा , ऐसे आप जैसे लोगों के लिए अंतर्जाल भगवान् भले ही हो पर अंतर्जाल ने इतनी उल जल्लूल चीजों को जन्म दिया है और समाज में इतनी विभाजन लाने की चेष्टा की है की है की उसका कोई जवाब नहीं.लोगों को गाली देने की छुट भी अंतर्जाल ने ही मुहाया कराया है.रह गयी बात दलितों या अत्यंत पिछड़े हुओं का समाज में स्थान तो आप आज यानि ०७.०८.11 का सन्डे टाइम्स ऑफ़ इंडिया देखिये आपको पता चल जाएगा की हम,यानी हिन्दू,खासकर वे जो अपने को उच्च समझते है कितने गिरे हुए हैं. कपूर जी मैं आपको एक नेक सलाह देकर मैं अपनी तरफ से यह वार्तालाप बंद करताहूं ,आप भरसक हिन्दुओं की महिमा का बखान कीजिए,पर हिंदुत्व में जन्म जन्मान्तर से चली आ रही बुराइयों पर पर्दा मत डालिए और यह तो कभी मत कहिये की हम बुरे हैं तो दूसरे हमसे ज्यादा बुरे हैं.मैं अपने बारे में ज्यादा तो नहीं कहता पर इतना अवश्य कहूँगा की दूसरा अगर चोर,बेईमान या भ्रष्ट है तो मुझे यह लाइसेंस नहीं मिल जाता की मैं भी वैसा ही बनू.मैंने अभी तक की उम्र इसी सिद्धांत को मानते हुए बिताई है और यही मेरा संदेश भी है.

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    • Bharat Mishra

      र. सिंह जी.
      प्रणाम.

      मैं आपकी बात समझ सकता हूँ हमें जाती वाद को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ना चाहिए. हमारे समाज में जो बुराइयाँ थीं उन्हें सकारात्मक रूप से धीरे धीरे मिटाना चाहिए. हमारी अखंडता एक साथ रहने और एक साथ काम करने में ही है. में एक छात्र हूँ और मैंने अपने पुरे करियर में कभी भी इस जातिवाद पर ध्यान ही नहीं दिया. मुझे ऐसा लगता है की सिख्षा एक ऐसा माध्यम है जिसके कारन हम इस भेदभाव को दूर कर सकते है. शर्तिया अगर हम अपने मानसिक सोच पर बदलाव करें . मेरे बहोत सारे दोस्त दलित है लेकिन हम लोग कभी भी कोई भेदभाव नहीं करते, साथ में ऑफिस जाते है, साथ में काम करते है. साथ में टूर पर जाते है. और सब कुछ नोर्मल है. लेकिन हमें भारतवर्ष को एक ही रखना है. और हम सबको मिलके बुराइयों को दूर करना होगा. जय हिंद.

      आपका शुभचिंतक
      भारत मिश्र
      सॉफ्टवेर इंजिनियर.

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  15. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    अनेक लोगों की यही तो समस्या है की जिस बारे में कुछ जानते नहीं, जिसके बारे में कभी कुछ पढ़ा नहीं, उसके बारे में गैर जिम्मेदारी से कुछ भी गंभीर आरोप जड़ दिए. किसी सभ्य, समझदार और जिम्मेदार व्यक्ति से ऐसी नासमझी और हठधर्मिता की आशा नहीं होती. सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कुछ भी कह दिया, यह तो कोई अच्छी बात नहीं. कितने भी ठोस प्रमाण दो, फिर भी कुछ लोग तो ऐसे ढीठ हैं की कभी हिन्दू प्रशंसा की किसी बात से सहमत होते ही नहीं. अब इसे नीयत की खराबी कहें या दिमाग की ? दोनों में से कुछ तो होगा ही………..
    अनपढ़, अल्प समझ के लोग भी देख सकते हैं की इस्लाम कई मतों में बंटा हुआ है. शीया, सुन्नी, अहमदपंथी हर रोज़ तो एक-दूसरे का रक्त बहाते रहते है. एक-दूसरे की मस्जिद में जाने का तो सवाल ही नहीं. जब भी जायेंगे तो रक्तपात के लिए ही जाना होगा. नैट पर ही देखलो, दर्जनों महजबी सम्प्रदायों के सूचि मिल जायेगी. …….
    ईसाई पंथ की बात करें तो भाई भारत में ही उसके दर्जन भर सम्प्रदायों के चर्च है. एक-दूसरे के चर्च में वे कैसे जा सकते है. कैथोलिक और प्रोटेस्टेट चर्च के संघर्ष में कई लाख लोगों की निर्मम हत्याएं यूरोप, अमेरिका में हुई हैं और आज भी इनके खूनी संघर्ष होते रहते हैं. … हिन्दुओं के सम्प्रदायों में ( किसी छोटे-मोटे अपवाद को छोड़ कर ) ऐसे किसी खूनी सघर्ष का इतिहास नहीं है. फिर भी जिनकी बुद्धि पर हिन्दू विरोध का पर्दा पडा हो, उन्हें ये सच नज़र नहीं आता और या फिर वे जान कर भी अनजान बने रहना चाहते है. ऐसे कपटी लोगों की परवाह हिन्दू समाज न तो करता हैं और न ही करनी चाहिए. हाथी की चाल चलते रहें और ………स्वस्थ व ज्ञान वर्धक संवाद के लिए तर्क को समझने की समझ और इमानदारी भी तो होनी चाहिए. असंमति तो हो पर तर्क के साथ न की कुतर्क के साथ. इसे हमारे शास्त्रों में वितंडा कहा गया है. बस एक ही रट ” मैं न मानून ”

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  16. Satyarthi

    हिन्दू धर्मं तथा समाज व्यवस्था दो अलग बातें हैं. हिन्दू धर्मं या कहिये सनातन धर्म अत्यंत प्राचीन है उसके धर्मं ग्रन्थ भी प्राचीन हैं और केवल कुछ बाद में लिखे गए पुरानों को छोड़ कर अपने गहरे आध्यात्मिक ज्ञान के लिए जाने जाते हैं. हिन्दू समाज व्यवस्था samay के अनुसार बदलती रही है कालांतर में उसमें काफी दोष भी पैदा हुए परन्तु इन दोषों के लिए धर्म को दोषी ठहराने का कोई औचित्य नहीं है. धर्मं में कहीं मंदिर प्रवेश पर रोक नहीं जो रोक लगनेवाले हैं वे अपने स्वार्थ या बुद्धिहीनता के कारन ऐसा करते हैं. पंडों का शास्त्रज्ञान विहीन तथा लोभी होना अनेक तीर्थ यात्रियों को बुरा लगता है. आवश्यकता है इन कुरीतिओं के विरुद्ध एक सशक्त सामाजिक आन्दोलन की . साथ ही यह भी आवश्यक है की साधारण हिन्दू जन अपने धर्मं का थोडा बहुत ज्ञान प्राप्त करें. अभी तो बहुत से हिन्दू ऐसे हैं जिन्हें शायद यह भी ज्ञात न हो की वेद कितने हैं और उनका क्या नाम है ऐसी स्थिति में हिन्दू धर्मं के विरुद्ध दुष्प्रचार करनेवालों को बहुत सुविधा है.

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  17. आर. सिंह

    आर.सिंह

    राजेश कपूर जी, अगर आप बाल की खाल निकालने के बदले मेरे कथन का निहितार्थ समझने की कोशिश करते तो ज्यादा अच्छा होता. जब मैंने कहा की,”एक बात तो साफ़ है की आप सब मिल कर जो कर रहे हैं ,उससे न हिन्दुओं की प्रतिष्ठा बढ़ रही है और न हिन्दुस्तान की.आप लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालना और गड़े मुर्दे उखाड़ना छोड़ कर अगर इस बात पर विचार करें की हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी, तो ज्यादा अच्छा हो”, तो इसमे गलत क्या है? पर आप को लगा की यह तो आपके वरीयता और आपके विभाचन वाली विचार धारा पर सीधा प्रहार है.अब मैं आपसे से सीधा प्रश्न करता हूँ की इसमे मेरा कौन सा अंहकार झलकता है?.कपूर जी ,आपको दो बातें बताना चाहता हूँ,एक तो यह की मैं तोड़ने में नहीं बल्कि जोड़ने में विश्वास करता हूँ और दूसरा यह की मेरे विचारानुसार हिन्दुओं की दुर्दशाके कारण कोई दूसरे नहीं ,बल्कि हमारी अपनी मानसिकता है.मैं गलत भी हो सकता हूँ,पर मैं फिर दुहराता हूँ की ये मेरे विचार हैं और मुझे इसकी सत्यता में कोई संदेह नहीं,अगर किसी को है तो वह तर्क द्वारा इसको गलत सिद्ध करे,न की अपने मुँह मियां मिठ्ठू बन कर.

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  18. आर. सिंह

    आर.सिंह

    मेरी कल वाली टिप्पणी के साथ एक अन्य चीज भी जोड़ना चाहता हूँ .जहां तक मेरा ज्ञान है(यह एक आम आदमी का ज्ञान है किसी विशिष्ठ व्यक्ति का नहीं)जैसा भेद भाव मन्दिर प्रवेश में है,वैसा मस्जिद या चर्च में नहीं है.पहले तो हिन्दुओं के तथाकथित निम्न जाति वालों के लिए मन्दिर प्रवेश पर पूर्ण रूकावट थी,जो आज भी आंशिक रूप में विद्यमान है.मेरी जहां तक जानकारी है ऐसी रूकावट न मस्जिद में प्रवेश में है और न चर्च में प्रवेश में..मुझे नहीं पता की मंदिरों में इस तरह के भेदभाव के पीछे किसका हाथ रहा है.इन सब बातों से तो मुझे यह सोचने पर वाध्य होना पड़ता है की छुआ छूत असल में हिन्दू धर्म की देन है.दूसरे मतावलम्बियों को इससे कोई लेना देना नहीं.डाक्टर मीणा की पीड़ा मैं समझ सकता हूँ,क्योंकि ऐसे रूकावट के शिकार उनके विरादरी वाले भी अवश्य रहे होंगे.बिहार के एक पुराने कवि श्री आरसी प्रसाद की पंक्तिया याद आरही है.
    “किन्तु रो रो कह रहा इतिहास यह,
    आदमी का शत्रु केवल आदमी”
    यहाँ आदमी की जगह हिन्दू रख दीजिये ,आप लोग समझ जायेंगे की मैं क्या कहना चाहता हूँ.

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  19. Mahendra kumar

    dr.mina ke lekhon ko galat kahne walon ko bharat ka sachha itihas nahi malum he.ye wahi itihas jante hain jo farzi aur dhongion dwara nirmit he.kyonki adiwasion aur janjation dwara bihar aur m.p. me swatantrata se sambandhit santhal aur neel bidroh hue the.yadi brahman,dom,nai,chandal ek sath khana khate hote to muslimo aur angrejon dwara bharat 600 varshon tak gulam nahi rehata.(aryon dwara nimn jation ke liye chandal sabd ka piryog kiya jata tha kya yeh uchit tha)

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  20. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    # पाठकों / लेखकों की उत्साह वर्धक टिप्पणियों के लिए धन्यवाद. कुछ टिप्पणियाँ तो मन को गहरे से स्पर्श कर जाती हैं. इंजी.दिनेश दिवस गौड़ जी के कहे अनुसार शीघ्र ही आर्य आक्रमण के असत्य पर एक लेख भेजने का प्रयास रहेगा. # .संवाद का अर्थ है की हम एक-दूसरे के मत व विचारों का सम्मान करते हुए उनपर अपनी समझ व अध्ययन के अनुसार अपनी-अपनी राय व्यक्त करते है. इस प्रक्रिया के स्वस्थ रूप से चलने में केवल लोकतंत्र की सुरक्षा ही नहीं, मानव समाज की सोच सही दिशा में विकसित की यह एक मात्र प्रक्रिया भी नज़र आती है. * भारत में इस परम्परा का इतिहास ( भारतीय संस्कृत साहित्य के अनुसार ) मानव की उत्पत्ति जितना पुराना है.
    * ऐसे में कोई कहे की दूसरों के मत की उसे परवाह नहीं तो यह उसकी स्वस्थ मानसिकता का परिचायक नहीं. उसकी तानाशाही व अति अहंकारी स्वभाव के साथ अहितकर कंडीशनिंग का परिचायक है. ऐसे लोग मानकर चलते हैं की वे ही सही हैं, बाकी सब गलत. तो यह प्रवृत्ति स्वयं उन लोगों के विकास में बाधक होती है, और स्वस्थ संवाद भी ऐसे लोगों के साथ संभव नहीं हो सकता. इनके अंतर मन में एक भाव गहरे से बैठा रहता है की केवल ”मैं” बुद्धिमान हूँ बाकी सब तो नासमझ है. ये लोग सीखते कभी नहीं, सिखाने का अधिकार जन्म सिद्ध मानते हैं. करेला और नीम चढ़ा, कभी कुछ पढ़ने का सुझाव दो तो उसे पढ़ते भी नहीं. तो ऐसे बुद्धिमानों से पार कौन पा सकता है ? # .समाज विज्ञान के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों के अनुसार अतीत के सही ज्ञान के बिना भविष्य का निर्माण असंभव है. इस स्थापित सिद्धांत को न समझने वाले इस के विरोध में कहें तो आप उनकी समझ पर तरस खाने के इलावा कर ही क्या सकते है ?
    * ये सही है की कोई भी व्यक्ति हर विषय का विद्वान नहीं हो सकता. इस लिए तो हम संवाद करते हैं की एक दूसरे से कुछ जानते,समझते हुए अपने अपने ज्ञान को समृद्ध करते जाएँ. पर जो बिना पढ़े, बिना सीखे स्वयं को हर विषय का अधिकृत विद्वान मान कर निर्णायक भाषा में टिप्पणियाँ करते हैं, उन्हें सहन करने के इलावा और उनकी समझ पर ( और उन्हें सहन करने की अपनी मजबूरी पर ) तरस खाने के इलावा आप कर ही क्या सकते है.
    # विद्वान विरोधी हमारे विचारों की विचार प्रक्रिया में बाधक नहीं साधक बनते हैं, पर जो लोग विषय की समझ के बिना निर्णायक टिप्पणियाँ करते हैं …? वे लोग स्वस्थ विचार प्रक्रिया में बाधक बनते हैं और अपनी ना समझी को प्रकट करते है. …
    * पर मित्रो अपनी बात कहने का अधिकार तो सबका है, इसका विरोध नहीं किया जा सकता और न किया जाना चाहिए. केवल आशा कर सकते हैं की हमारे ये मित्र भी अपनी बात कहने का सही तरीका सीखेंगे, दूसरों के मत का आदर करना सीखेंगे व उन्हें समझने का इमानदार व विनम्र प्रयास करें. हो सके तो इतनी कृपा भी (स्वयं पर और हम सब पर) कर सकते हैं की वे जिस विषय पर आधिकारिक, निर्णायक भाषा में टिपण्णी करना चाहते हैं, उस पर कुछ पढ़ा भी करें…..
    # सीखने व सीखाने के लिए संवाद का विकल्प कोई नहीं हो सकता. (आचरण के इलावा, सर्वोत्तम तो वही है ) अतः अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा तो देश की सीमाओं की रक्षा से भी पहले होनो चाहिए. यदि इसकी रक्षा न हुई तो सीमाएं भी सुरक्षित न रह सकेंगी. अतः मेरे किसी भी कथन का अभिप्राय अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में व्यवधान नहीं .
    * पर इसकी कोई सीमा या कसौटी भी तो होनी चाहिए. वह क्या हो ? क्या किसी दूसरे को हम अभिव्यक्ती के अधिकार के नाम पर गाली देने को स्वतंत्र है ? देश द्रोह की भाषा बोलने को स्वतंत्र हैं ? ( भारतीय सन्दर्भ में, वर्तमान सरकार के रहते तो देशद्रोह के कार्य ही सम्मानित होने की गारंटी हैं. देशभक्ती की बात से आप प्रताड़ित होने के लियी सुपात्र सिद्ध होंगे ). इस विषय पर विचार-विमर्श, संवाद की आवश्यकता है.

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  21. आर. सिंह

    आर.सिंह

    मुझे नहीं पता की आप लोगों में कौन सही है ,कौन गलत,पर एक बात तो साफ़ है की आप सब मिल कर जो कर रहे हैं ,उससे न हिन्दुओं की प्रतिष्ठा बढ़ रही है और न हिन्दुस्तान की.आप लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालना और गड़े मुर्दे उखाड़ना छोड़ कर अगर इस बात पर विचार करें की हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी, तो ज्यादा अच्छा हो.ऐसे यदि मीणा जी कहते हैं की आर्य बाहर से आये थे या जैसा कपूर जी का कथन है की आर्य यहीं के निवासीथे तो ,उससे इतना अंतर नहीं पड़ता ,जितना इस कथन से की हमारा नैतिक चरित्र इतना दुर्बल था,हम इतने कमजोर थे की जिसने चाहा हममे छुआ छूत फैला दिया ,जिसने चाहा उसने हमें अगड़ो पिछडो में विभाजित कर दिया.यह कहने और सुनने में आप सब को अच्छा लग सकता है,पर मेरे जैसे लोग तो शर्म से गर्दन झुकाने पर वाध्य हो जाते हैं क्योंकि हम तो सोच भी नहीं पाते की आखिर हमारी इस कमजोरी का कारण क्या था.अगर आज मुझे कोई गुमराह करने का प्रयत्न करे और मैं गुमराह हो जाऊं तो यदि गुमराह करने वाला दोषी है तो उससे ज्यादा दोषी मैं अपने आप को मानता हूँ. ऐसे हो सकता मेरा यह कहना भी आप लोग को अच्छा न लगे ,पर यह मेरा निजी विचार है और यह जब तक मुझे अच्छा लग रहा है तब तक मैं अन्य किसी के अच्छा या बुरा लगने की परवा नहीं करता.

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  22. K. S. Dwivedi

    आदरणीय कपूर जी, आप भी कहाँ गैडे को गुदगुदी कर रहे हैं. हिन्दू धर्म या भारत को किससे खतरा है ये तो मुझे नहीं पता लेकिन मीणा या इन जैसे जो भी लोग हैं उनसे किसी को कोई खतरा नहीं है. ये भटके हुए लोग हैं. कुछ अच्छा करना इनके बस की बात नहीं, और कुछ गलत भी ये नहीं कर सकते. सिर्फ बदबू फैला सकते हैं. इन्हें भी पता है की अपने विचारों से जब ये खुद ही सहमत नहीं हैं तो कोई और क्या होगा. इनका अपना कोई अस्तित्व नहीं है, इसीलिए ये उसका विरोध करते हैं जिसका अस्तित्व है.

    किसी सिरफिरे के गाली देने से कोई धर्म या देश ख़तम होने लगे तो उसका ख़तम हो जाना ही बेहतर है.

    मेरा ये मानना है की हमें अपनी ऊर्जा सकारात्मक जगह लगनी चाहिए.

    एक बात आखिर में और कहना चाहूँगा.. आप लोगों (के विरोध) की वजह से ही इनका थोडा बहुत वजन बना है, वर्ना इनके लेखों को मैं कूड़ा समझता हूँ. आपसे व्यक्तिगत विनती है की २-४ कौड़ी की बातों या व्यक्तियों के लिए आप अपना बहुमूल्य समय नष्ट न करें.

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  23. vimlesh

    राजेश जी बहुत बहुत धन्यवाद

    टूटपुन्जिये लेखको के मुह पर जो जूता आपने मारा है निहायत करार है लेकिन ये जुतहे लेखक इतने करारे करारे खाने के बाद भी सुधरने वाले नहीं .

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  24. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    ”हिन्दुओं के लिए सबसे बड़ा ख़तरा” शीर्षक से लेख प्रकाशित हुआ देखने बाद लगा की यह पाठकों की दृष्टे में नहीं आ पाया है. अछा होता यदि इस पर पाठकों की सम्मति, टिप्पणियाँ भी आ जातीं.

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  25. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय डॉ. कपूर साहब, बहुत बहुत धन्यवाद…
    आपने जिन मीणा जी को समझाने के लिए यह लेख लिखा है, उन्हें इससे कुछ समझ नहीं आने वाला…पूर्वाग्रहों से ग्रसित उनका मन मस्तिष्क मैकॉले मानसिकता का गुलाम हो चूका है| ऐसे लोगों को देखकर लगता है की आज मैकॉले अपने कुटील षड्यंत्रों में सफल रहा|

    आदरणीय डॉ कपूर साहब, आर्यों के विषय में जिस लेख का आपने ज़िक्र किया है, उसकी प्रतीक्षा रहेगी| हम यह लेख पढना चाहेंगे|

    कृपया हमे इससे लाभान्वित करें| धन्यवाद…

    Reply
  26. nikhil singh

    कपूर साहब ने बिलकुल सही कहा है डॉ. मीणा के विषैले लेख समाज मैं वैमनस्यता फ़ैलाने का एक असफल प्रयास हैं

    Reply

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