वीरेन्द्र सिंह परिहार
देश में वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना ही मूलतः एक संगठित और समरस हिन्दू समाज बनाने के लिये की गई थी। साथ ही राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण भी उसके साथ एक बड़ा लक्ष्य था क्योंकि संघ के प्रथम सरसंघचालक डा0 हेडगवार को यह पूरी तरह एहसास हो गया था कि जातियों में बंटा और आत्ममुग्धता का शिकार होना सिर्फ हिन्दू समाज की ही नहीं वरन देश की सबसे बड़ी समस्या है। सदियों से यह मान्यता रही है कि चार हिन्दू तभी इकट्ठा होते है, जब किसी शव को ले जाना होता हैं। वस्तुतः हिन्दू समाज में व्याप्त भयावह जातिवाद की समस्या के चलते ही देश की स्वतंत्रता के बाद ही कमोबेश देश में अपने को धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले दलों ने देश में मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरूआत की।
पहले तो यह प्रवृत्ति कांग्रेस पार्टी में ही देखी जाती थी, पर धीरे-धीरे जो प्रदेश में क्षेत्रीय दल बने, उन्होंने इस दिशा में बढ़-चढ़कर मुस्लिम तृष्टिकरण का और वोट बैंक की राजनीति करने का उद्यम शुरू किया। इसका कारण यह था कि मुस्लिमों के थोक वोट और जातियों में बंटे हिन्दू समाज के कुछ जातियों के वोट उन्हें सत्ता की सीढ़़ी तक पहुँचाने में एकमात्र साधन बन गये थे जिसका परिणाम यह हुआ कि देश में जहाँ हिन्दुओं की आबादी कम अनुपात में बढ़ी, वही मुसलमानों की आबादी ज्यादा संख्या में बढ़ी। इसका एक बड़ा कारण जहाँ परिवार नियोजन जैसे साधनों का मुसलमानों में न के बराबर प्रयोग होना, उनमें बहुविवाह का प्रचलन होना रहा, इसके साथ घुसपैठ भी एक बड़ा कारण था। इसका नतीजा यह था कि 1947 में जहाँ हिन्दुओं की जनसंख्या देश में 84 प्रतिशत थी, वहीं मुसलमानों की आबादी 9 प्रतिशत थी। अब वर्तमान में हिन्दुओं की आबादी जहाँ 80 प्रतिशत है, वहीं मुसलमानों की आबादी बढ़कर 14 प्रतिशत पहुँच गई है। देश में सीमावर्ती प्रान्तों जैसे असम और बंगाल में बाग्लादेशी घुसपैठियों के चलते वहाँ पर मुस्लिम आबादी क्रमशः 35 एवं 30 प्रतिशत हो गई है।
इतना ही नहीं, असम और बंगाल के कई सीमावर्ती क्षेत्र मुस्लिम बहुल हो जाने से वह क्षेत्र एक तरफ से हिन्दू विहीन हो गये हैं। गौर करने की बात है कि देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में हिन्दुओं की आबादी न होना जिसे देश का राष्ट्र समाज कहा जाता है, जो देश की सभी समस्याओं का, देश की सुरक्षा की एकता-अखण्डता की चिंता करता है, कितनी गम्भीर बात है। इसकी परिणिति इस रूप में हुई कि वहाँ पर मुस्लिमों की निर्बाध घुसपैठ और फिर उनका पूरे देश में अतिक्रमण! इसका सबसे बड़ा कारण यह कि वहाँ पर लम्बे समय तक वोट बैंक की राजनीति करने वाली पार्टियाँ ही शासन करती रहीं।
लेकिन उस दिशा में युगांतरकारी मोड़ तब आया जब वर्ष 2016 में असम में भाजपा की सरकार आयी और वहाँ पर धीरे-धीरे घुसपैठियों का प्रवेश असंभव हो गया। कुछ ऐसी ही स्थिति बाग्लादेश सीमा पर स्थिति त्रिपुरा में भी आयी, जब वहाँ पर भाजपा की सरकार आ गई। यहाँ तक कि इन राज्यों में बाड़ लगाकर सीमा को पूरी तरह सुरक्षित कर दिया गया परन्तु पश्चिम बंगाल में क्रमशः वाम मोर्चा और तृणमूल की वोट बैंक की राजनीति के चलते बाग्लादेशी सीमा से लगी अधिकांश सीमा खुली रही और वहाँ घुसपैठ सिर्फ जारी ही नहीं रही। उन्हें आधार कार्ड, राशन कार्ड देकर वोट का अधिकार तो दिया ही गया, इतना ही नहीं वहाँ उन्हें आवास सुविधायें भी दिलाई गईं। लोगो की स्मृति में यह बात अभी तक होगी कि पिछले विधानसभा चुनाव और पंचायती चुनाव में इन घुसपैठियों ने भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर कैसे-कैसे अत्याचार किये। हजारो हिन्दुओं पर हमले हुये, कई की हत्याएं की गई, कई लोगो के घर जला दिये गये और महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किये गये पर ममता सरकार उनके विरूद्ध कोई ठोस कार्यवाही करने के बजाय प्रकारान्तर से उन्हीं के पक्ष में खड़ी रही। इस चुनाव में भी ममता ने हिन्दुओं को धमकाया था कि आप मेरे कारण सुरक्षित हैं वरना एक समुदाय आपको तत्काल सबक सिखा देगा।
पर ममता बनर्जी और दूसरे वोट बैंक की राजनीति करने वाले सत्ता के भूखे राजनीतिज्ञों को यह पता नहीं था कि उनकी हद दर्जे की ये हिन्दू विरोधी नीतियाँ और कृत्य एकदिन हिन्दू समाज को एकजुट और संगठित कर देंगे । जिस तरह से बंगाल में सिंडीकेट का राज्य, मनीकट का दौर, हिन्दुओं पर अत्याचार जारी रहा। फलतः हिन्दू समाज को असम और देश के दूसरे हिस्सों की तरह एकजुट होना पड़ा जिसका परिणाम यह हुआ है कि बंगाल की सीमाओं से घुपैठ तो करीब-करीब रूक ही गई है। वहाँ पर सीमा पर बाड़ लगाने के लिये बीएसएफ को जमीन उपलब्ध कराने की दिशा में भी तेजी से काम चल रहा है। जो घुसपैठिये पहले हिन्दुओं के साथ गुण्डागर्दी और अत्याचार करते रहते थे, वह अपने आप बंग्लादेश की ओर पलायन करते दिखाई दे रहे हैं। जहाँगीर खान जैसे लोग जो अपने को पुष्पा बताते थे और मनमानी हिन्दुओं के वोट डलवा लेते थे, अब उनके बुरे दिन शुरू हो गये हैं। दूसरे के मकानों और दुकानों पर कब्जा करके अवैध कृत्य करने वाले टीएमसी के लोगो की शामत आ गई है, कई जगह तो आमजन ही उनकी औकात बता रहे हैं, जबकि यही आमजन पहले भीगी बिल्ली बने रहते थे।
सबसे बड़ी बात यह कि बंगाल में भाजपा के सत्ता में आने से डेमोग्राफी बदलने का खतरा टल गया है, देश की सीमाएं सुरक्षित हो गई हैं। असम जैसे 35 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या वाले राज्य में यूसीसी लागू किसी चमत्कार से कम नहीं। हिन्दुओं के संगठित वोट का ही परिणाम है कि जिस बंगाल में ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी की तूती बोलती थी, जो ईडी, सीबीआई और यहाँ तक कि देश में गृहमंत्री को भी आखें दिखाने में गुरेज नहीं करते थे, उन्हें आमजन थपड़िया रहे हैं। टीएमसी के नेता कटमनी लौटाने का एनाउंस करते घूम रहे हैं। टीएमसी के लुटेरे और और गुंडे आम आदमी के सामने डरे और सहमे हुये हैं। हिन्दुओं के संगठित वोट का नतीजा ही है कि ममता का राज तो गया ही, उनके हाथ से पार्टी भी निकलती दिख रही है। टीएमसी का विरोधी गुट मान्यता प्राप्त विपक्षी दल हो गया है। बीस से ज्यादा सांसद भी टूटने वाले हैं।
इसका एक और भी बड़ा कारण ममता का अंध परिवारवाद है, जिसमें एक तरफ से पूरे 15 साल अभिषेक ही सत्ता और पार्टी चला रहे थे और अब भी ममता चाहती हैं कि अभिषेक के तुगलकी फरमान के समक्ष कोई चू-चपड़ न करे, परन्तु सत्ता का सीमेंट टूट जाने से अब तृणमूल में भारी विद्रोह हो गया है पर आत्म केन्द्रित ममता को कुछ समझ में नहीं आ रहा। जहाँ पहले मुसलमानों के वोट आरक्षित माने जाते थे और फिर लड़ाई हिन्दू वोटो को लेकर होती थी, वहीं हिन्दू एकजुटता के चलते 30-35 प्रतिशत तक मुस्लिम वोट निरर्थक साबित हो रहे हैं। निश्चित रूप से यह हिन्दुओं का एकजुटता और संगठन-शक्ति का प्रमाण है और इसी से देश की समस्त समस्याओं का समाधान निकलेगा।
वीरेन्द्र सिंह परिहार