लेखक परिचय

राजीव रंजन

राजीव रंजन

पत्रकारिता की शुरुआत सुदर्शन नेशनल न्यूज़ के साथ हुई जहां बतौर शिफ्ट इंचार्ज और असिस्टेंट प्रोड्यूसर कार्यरत रहे। उसके बाद चौथी दुनिया में उप संपादक, युवा टीवी में बतौर संपादक और खबरें 24 (राजस्थान) में एंकर के पद पर काम किया। इसके अलावा कई न्यूज़ वेबसाइट्स जैसे की आफ्टरनून डीसी और लीड इंडिया ग्रुप के लिए लिखते रहे हैं।

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राजीव रंजन   aap

किस्से बनेंगे अब तो, बरस भी कमाल के / पिछला बरस गया है, कलेजा निकाल के…

जगजीत सिंह की आवाज में यह गजल आज की राजनीतिक गतिविधियों को परिलक्षित करने के लिए काफी है। पिछला बरस तो सचमुच यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचार और महंगाई से आम जनता का कलेजा निकाल बाहर रख दिया, तो वहीं केजरीवाल के किस्से धूम मचा रहे हैं। लेकिन एक दूरदर्शी इशारा इंगित करता है कि केजरीवाल अभी राजनीति में नवोदित हैं और राजनीति का विज्ञान नहीं सीख पाए हैं। हल्कापन है। भाषाओं और कदमों पर नियंत्रण नहीं है। भगवान दास रोड पर डुप्लैक्स मिलने पर वह इतने खुश हुए कि उनके शिफ्ट करने से पहले सगे-संबंधी व मीडिया उसकी फिनिशिंग दिखाने में मशगूल हो गई। दूसरी तरफ मीडिया वाले ये दिखाने लगे कि बदल रहे हैं केजरीवाल… 9 हजार स्क्वायर फीट के बंगले में रहेंगे केजरीवाल.. वगैरह, वगैरह… केजरीवाल ने पलटी मारी और मना कर दिया। तो क्या ये मनाही केजरीवाल ने दिल से किया या यह पॉलिटिकल स्टंट है ? असल में आआपा के संजय सिंह और प्रशांत भूषण चार जनवरी को ही लोकसभा चुनाव पर अहम नीतियां बना रहे थे। ऐसे में जब केजरीवाल ने पूरी जानकारी ली तो उनके विश्वस्तों ने उन्हें कहा कि हम लोकसभा चुनाव पर मीडिया कॉन्फ्रेंस तो करने जा रहे हैं, लेकिन मीडिया में आपके मुख्यमंत्री द्वारा आवास लेने की खबर को जो तोड़-मरोड़ दिखाया जा रहा है, उसका क्या करेंगे, तो केजरीवाल ने झट से मारी यू-टर्न और कहा- मकान नहीं चाहिए। असल में ऐसा नहीं है कि केजरीवाल इसे लेने से इनकार कर रहे हैं, केजरीवाल सब कुछ स्वीकार करेंगे, लेकिन लोकसभा चुनाव में जनता को मूर्ख बनाकर।

आपको याद दिला दें कि इसी दिल्ली के सीएम ने अपने बच्चों की कसम तक खा डाली थी। बार-बार पूछे जाने पर केजरीवाल ने बस यही कहा था कि “नहीं भैया जोड़-तोड़ न करने और सरकार का विरोध करने के कारण ही जनता ने हमें चुना। हम न समर्थन लेंगे और न देंगे। बाद में केजरीवाल पलटे और उसी कांग्रेस की गोद में जा बैठे जिसपर वो लांछन लगाते आए थे। ये रहा केजरीवाल का झूठ नंबर वन! हालांकि बढ़ते विरोध को देखते हुए एक विडियो मैसेज जनता के सामने कई भाषाओं में लाया गया जिसमें केजरीवाल जनता को सफाई दे रहे थे कि वो सरकार क्यूं बना रहे हैं। केजरीवाल बस यही नहीं समझा पाये की वो पलटू हैं और हर सवाल का उनके पास पहले से ही जवाब तैयार होता है। हो भी क्यूं न, आईआईटी के स्टूडेंट रहे हैं तो तैयारी के साथ ही मैदान में उतरेंगे। लेकिन कोई भी तर्क देकर वो जनता को ज्यादा दिन बेवकूफ नहीं बना सकते।

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में सरकार बनाने में कामयाबी तो हासिल कर ली है लेकिन कई मौकों पर उसके विधायकों और मंत्रियों की अनुभवहीनता भी देखने को मिल रही है। सरकार बनने के बाद केजरीवाल एंड पार्टी ने ऐलान किया कि 3 महीने तक 700 लीटर पानी पर कोई बिल नहीं लगेगा, लेकिन अगर एक लीटर भी ज्यादा खर्च हो गया तो लोगों को पूरा चार्ज देना होगा। इस पर मुझे बचपन का गली क्रिकेट मतलब की गलियों में खेले जाने वाले क्रिकेट की याद आती है। इस खेल का नियम ये होता था कि दीवार पर उड़ते-उड़ते गेंद लगी तो छक्का और पार गयी तो आउट। यही खेल केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के साथ खेला। सोचने वाली बात ये भी है कि राजधानी में कितने लोग हैं जिनके घरों में मीटर लगा है? जवाब है बहुत ही कम। तो फिर केजरीवाल जी की यह सोच, बहादुरी और ईमानदारी के लिए क्या उन्हें इनाम दिया जाए ये भी सोचनीय है। केजरीवाल ने हमेशा की तरह बंद कमरे में ये फैसला ले लिया लेकिन उन्होंने जनता को ये नहीं बताया कि उनके इस फैसले से राज्य के खजाने पर हर महीने कितने करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा? केजरीवाल ने बहुत चतुराई से जहां मुफ्त पानी दिये जाने का नाटक कर जनता को बहुत ही सफाई से बेवकूफ बनाने का काम किया, वहीं जनता को इस बात से भी भ्रमित कर दिया कि अंततः नुकसान आम आदमी का ही होना है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ‘झूठे वादे’ कर जनता को गुमराह करने का काम किया है। घोषणापत्र में किए गए वादे पूरे नहीं हुए हैं जिसमें बिजली, पानी को लेकर अधूरी घोषणाओं और जन लोकपाल शामिल है। केजरीवाल के खिलाफ एक जनहित याचिका भी दाखिल की जा चुकी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सत्ता में आकर फायदा उठाने के मकसद से आम आदमी पार्टी ने अपने मेनिफेस्टो में झूठे वादे किए और जनता को गुमराह किया। आम आदमी का संबंध सत्ता से है और सत्ता में बैठने वाले तथाकथित आम आदमी भी अब आम नहीं प्रतीत होते। ये राजनीति है और यहां सब के कपड़े सफ़ेद हो जाते हैं, बाकी दाग अच्छे हैं। वो लगते रहेंगे और छूटते भी रहेंगे। तो क्या हम ‘आप’ को माफ कर दें!

आम आदमी का बोझ कब हल्का हुआ? क्या राहत मिली? राहत रातों-रात नहीं मिलती। खैर बोझ कम तो नहीं हो रहा लेकिन मूल्यों में बढ़ोतरी ज़रूर की जा रही है। डीज़ल-पेट्रोल का दाम बढ़ चुके है, दूध का भी दाम बढ़ा दिया गया है। सवाल है कि आम आदमी को राहत किस स्तर पर दी जा रही है। कुछ दाम घटे तो आम आदमी भी खुश हो जाए, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं …

मेट्रो का किराया वही, ऑटो का किराया वही, बस का किराया वही, पानी आने का टाइम वही, पानी जाने का टाइम वही, गैस सिलिंडर का भाव वही, ऑफिस जाने का टाइम वही, स्कूल से आने का टाइम वही, मकान मालिक वही किरायदार वही, आईटीओ पर रेलम रेल वही, आम आदमी से पुलिस का बर्ताव वही, नेताओं का मान वही, नारियों को सम्मान वही! ये गलियां, चौक-चौबारे और मुर्दों का श्मशान वही… दिल्ली वही दिलवाले वही.. जो आज बदल गया वो केजरीवाल वही।“

8 Responses to “ये ‘आप’ की समझी हुई ना-समझी है”

  1. इंसान

    भारतीय समाचार पत्रों को मैं पत्रकारिता नहीं बल्कि विज्ञापन अथवा घोषणापत्रों के रूप में देखता हूँ| कल तक जो मीडिया अरविन्द केजरीवाल द्वारा सामाजिक व राजनीतिक अभियान की गतिविधि तो दूर उनके नाम तक को प्रकाशित नहीं करता था, आज वह उन्हें इंदौर की मकर सक्रांति की पतंगों की भांति आकाश में उड़ाए हुए है| और हाँ, दूर बैठा पाठक तो प्राय: आकाश में पतंग देख कर संतुष्ट होने का अभ्यस्त हो चूका है लेकिन मुझ पंजाबी को जैसे मंदिर के प्रसाद से नहीं गुरूद्वारे का लंगर खा कर भूख मिटानी होती है उसी प्रकार “पतंग कहाँ से उड़ी और कौन उड़ा रहा है, इत्यादि” की जिज्ञासा बनी रहती है| जिज्ञासा वश नवभारत टाइम्स पर जोश-ए-जवानी और फोटो धमाल देखने/पढ़ने पहुंचे लोगों की विषय पर लिखी टिप्पणियों में लगाईं अटकल में अटक जाता हूँ| यहाँ प्रवक्ता.कॉम पर वापिस लौट लेखक से मेरा अनुरोध है कि गप्प नहीं वास्तविकता पर ध्यान दें और खोजी पत्रकारिता के दायरे में रहते पत्रकारिता की मर्यादा का सम्मान करें| यदि आज तेरह दिन में वही बदलते अरविंद केजरीवाल पर पुलंदा लिख दिया है तो भ्रष्टाचार की जड़, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मृत्युलेख भी लिख डालो|

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    (१) चोरों की टोली पकडने “आप” स्वयं प्रतिज्ञा कर सिपाही बन कर गये, वो उसी टोली के साथ मिल गए?
    और इतना साधारण तर्क, क्या, आप सुधी मित्रों को समझ में नहीं आता ? महदाश्चर्य?
    (२) और आम जनता का बहाना ?
    वाह! वाह!!
    (३)मुख्य मंत्री जी आपकी निर्णय शक्ति कहाँ है?

    (४)अब, दिखावे के लिए, छोटे चिल्लर भ्रष्टाचारी पकडे जाएंगे। और वाह वाही लूटी जाएगी।
    जय हो आशुतोष, भोले भण्डारी, जनता की।
    (५) किसकी चाल में फँस गए? और मानते/जानते भी नहीं।

    ===>यदि २०१४ में सूर्योदय नहीं हुआ तो उसका कारण आ. आ. पा. होगी।
    (६) “निर्णय क्या, = ’लग जाए तो तीर था, नहीं तो तुक्का’ ==ऐसे लिया जाता है?

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      डाक्टर साहब ,आपकी तड़प मेरे समझमें आती है.एक बात मैं अवश्य कहूंगा कि ऐसी भी अंध भक्ति क्या,जिसके चलते केवल अपने आराध्य के रास्ते के रूकावट दिख पड़े.
      १ और 2.पहले दो बिंदुओं के उत्तर में मैं केवल यहकहना चाहूंगा कि न आदमी पार्टी ने चोरों को साथ लिया है और न आम जनता का बहाना किया है. आम आदमी पार्टी ने न केवल आम आदमी की इच्छाओं का सम्मान किया बल्कि हर्षवर्द्धन जैसे लोगों को जवाब दिया है कि न हम जिम्मेदारी से भाग रहे हैं और न भ्रष्टों को बख्शेंगे,वह भ्रष्ट चाहे कांग्रेस का हो या बीजेपी या आम आदमी पार्टी का ही क्यों न हो.
      ३ और ४. निर्णय शक्ति तो दिखने लगी हैऔर पकडे जायेंगे धीरे धीरे नीचे से ऊपर तक सभी.अभी तो शुरुआत है.आगे आगे देखते जाइये.
      ५.कौन सा जाल और कौन सा सूर्योदय? नमो भी उसी व्यवस्था के एक अंग हैं,जिसके परिवर्तन के लिए आम आदमी पार्टी का उदय हुआ है. जिस नमो ने गुजरात में लोकायुक्त को नपुंसक बना दिया और दागियों को अपने मंत्री मंडल में शामिल कर लिया,उससे व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद रखना रेत से तेल निकालने जैसा है.
      ६. निर्णय लेने की शुरुआत तो हो चुकी है और उसका असर दो चार दिनों में दिखने लगेगा.
      एक अन्य बात.मैं मानता हूँ कि अभी तक नमो के लिए टिना फैकटर काम कररहा था.अब उनके लिए चुनौती देने वाला मैदान में आ चुका है.

      Reply
    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      डाक्टर साहब ,आपकी तड़प मेरे समझमें आती है.एक बात मैं अवश्य कहूंगा कि ऐसी भी अंध भक्ति क्या,जिसके चलते केवल अपने आराध्य के रास्ते के रूकावट दिख पड़े.
      १ और 2.पहले दो बिंदुओं के उत्तर में मैं केवल यहकहना चाहूंगा कि न आदमी पार्टी ने चोरोंको साथ लिया है और न आम जनता का बहाना किया है. आम आदमी पार्टी ने न केवल आम आदमी की इच्छाओं का सम्मान किया बल्कि हर्षवर्द्धन जैसे लोगों को जवाब दिया है कि न हम जिम्मेदारी से भाग रहे हैं और न भ्रष्टों को बख्शेंगे,वह भ्रष्ट चाहे कांग्रेस का हो या बीजेपी या आम आदमी पार्टी का ही क्यों न हो.
      ३ और ४. निर्णय शक्ति तो दिखने लगी हैऔर पकडे जायेंगे धीरे धीरे नीचे से ऊपर तक सभी.अभी तो शुरुआत है.आगे आगे देखते जाइये.
      ५.कौन सा जाल और कौन सा सूर्योदय? नमो भी उसी व्यवस्था के एक अंग हैं,जिसके परिवर्तन के लिए आम आदमी पार्टी का उदय हुआ है. जिस नमो ने गुजरात में लोकायुक्त को नपुंसक बना दिया और दागियों को अपने मंत्री मंडल में शामिल कर लिया,उससे व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद रखना रेत से तेल निकालने जैसा है.
      ६. निर्णय लेने की शुरुआत तो हो चुकी है और उसका असर दो चार दिनों में दिखने लगेगा.
      एक अन्य बात.मैं मानता हूँ कि अभी तक नमो के लिए टिना फैकटर काम कररहा था.अब उनके लिए चुनौती देने वाला मैदान में आ चुका है.

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  3. arun pandeya

    राजीव रंजन जी का परिचय मै ढूँढता रहा मगर मिला नहीं, फिर भी इतना तो कह सकता हूँ कि ‘आप’ की चुनाव में जीत से उन्हें बहुत क्षोभ हुआ है. तभी तो जो काम रंजन जी की चहेती सरकारें पिछले ६५ वर्षों में नहीं कर पाईं, उनके लिए वह ‘आप’ को ६५ दिन भी नहीं देना चाहते.

    केजरीवाल जी को राजनीती में वह महारत हासिल नहीं है जो शीलाजी, मनमोहनसिंहजी, डा. हर्षवर्धन, या स्वयं राजीव जी को हासिल है. तभी वह जनता से अपने दिल की बात कह देते हैं. मै समझता हूँ की यही हाल शिवेंद्र मोहन सिंह जी का भी है.

    पानी के बारे में आपने कहा की काफी लोगों के पास पानी का मीटर भी नहीं है, इसके लिए भी दोष ‘आप’ को दिया जा रहा है, उन लोगों के लिए आपने कुछ नहीं कहा जो ६५ साल में जनता को पानी का मीटर भी नहीं लगवा सके, शायद उन मीटरों का पैसा कहीं और चला गया!

    आपने केजरीवाल के खिलाफ एक जनहित याचिका का जिक्र तो किया मगर यह बताना भूल गए की यह याचिका किसने दाखिल की है.

    सच तो यह है की हारे हुए लोग जनता की इच्छा नहीं समझना चाहते, सिर्फ यह चाहते है की किसी भी तरह से ‘आप’ को बुरा बताया जाय. क्योंकि इन लोगों का जनता का काम करने का कभी भी कोई इरादा नहीं था, इरादा सिर्फ था की चुनाव जीत कर कैसे जनता का पैसा लूटते रहें. अब चुनाव हारने से आमदनी का जरिया ख़त्म हो गया है. इन लोगों ने कभी राजनीति के अलावा और कोई काम नहीं किया है तो अब और कोई काम करने में असमर्थ है.

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    • शिवेंद्र मोहन सिंह

      अरुण जी,
      क्षोभ सिर्फ उन लोगों को हुआ है जिसमे दिमाग है और जिसने इस पार्टी के धूर्तता पूर्ण बयानो ढंग से पढ़ा होगा, अंधभक्तों को सिर्फ सावन कि घास ही नजर आएगी. आम आदमी का लेबल लगा के धूर्त जब मैदान में आएँगे तो हम जैसों को तकलीफ तो होगी ही. बिना राजनीति जाने ही मक्खन सरीखे बयान क्यूँ दिए जा रहे हैं?

      =>क्या “आप” को पता नहीं था कि दिल्ली में वैध और अवैध कितने कनेक्शन हैं?
      =>चुनाव पूर्व क्यों नहीं घोषणा कि गई कि हम खाली वैध कनेक्शन वालों को ही सब्सिडाईज दर या मुफ्त में बिजली पानी देंगें?
      =>क्या “आप” को केवल वैध कनेक्शन वालों ने ही वोट दिया है?

      आँखें खोलिए और कुछ सन्दर्भ और पढ़िये :

      २०११- स्व घोषित हरिश्चंद्र ने उत्तराखंड में भाजपा शासित सरकार द्वारा पेश किये गए लोकायुक्त बिल को देख कर कहा था -”उत्तराखंड का लोकायुक्त बिल १०० फीसदी जन लोकपाल बिल से मिलता है, लेकिन उसे पास करने के लिए केंद्र की मंजूरी जरूरी है”

      इसी विषय पर चुनाव से पहले –
      २०१३ – अगर हमारी सरकार बनती है तो हम १५ दिनों में जनलोकपाल बनाएँगे.
      इसी विषय पर चुनाव के बाद –
      २०१३ – मुझे मालूम नहीं था की इसके लिए केंद्र की मंजूरी लेनी पड़ती है.

      => दूसरा उदहारण चुनाव नतीजे आने का बाद –
      हम ना समर्थन लेंगे ना ही देंगे (उसी शाम का स्टेटमेंट)

      कुछ और समय बाद…..नया नाटक…..

      हम जनता की राय लेंगे…..

      ७०% जनता ने हाँ कहा है (ये ७० प्रतिशत जनता कहाँ की है ?)

      जिसके खिलाफ चुनाव लड़ा उसी की गोद में….

      => एक और ….चुनाव से पहले
      शीला दीक्षित चोर है….बिजली कम्पनियों की दलाल है… मेरे पास उसके खिलाफ ३७० पेज का सुबूत है.

      और अब सरकार बनने के बाद …..

      मेरा हर्षवर्धन जी से निवेदन है शीला जी के खिलाफ सबूत भेजें तभी कार्यवाही करूंगा. हम अभी सबूत इकठ्ठा कर रहे हैं. तो पहले आप के पास क्या था ? तो वो ३७० पेज वाली किताब क्या थी?

      आप पार्टी के श्री आर सिंह जो कि प्रवक्ता डॉट कॉम पर लगातार लेख, टिप्पणी और “आप” को डिफेंड करते है उन्ही का कमेंट दे रहा हूँ :-

      “रह गइल उनकरा शीला के विरुद्ध कारर्वाई के त उत साफ़ कहलन कि ३७० पेज के दस्तावेज अखबार में छपल समाचार के आधार पर बनावल गइल बा.अब ओह सब खातिर सबूत जुटावल जा ता. अगर एकरा में हर्षवर्धन जी भी आपन जोगदान दे दीहें ,त कौनो हर्ज हो जाई का?.”

      (भोजपूरी में कमेंट है, सन्दर्भ “एक पाती केजरी बाबू के नाम” विपिन किशोर सिन्हा जी के लेख पर आई है)

      पेपर की कतरनों के आधार पर मुख्यमंत्री के ऊपर आरोप वो भी पूर्ण विश्वास ( फुल कांफिडेंस) के साथ? वाह जी वाह क्या कहने “आप” के. तो कम से कम कतरनों को ही आधार बना कर कार्यवाही कर लेते. लेकिन पता है कि नहीं वो कर नहीं सकते, फिर लोगों को क्यों बरगलाया जा रहा था? कि हम ये करेंगे हम वो करेंगे?

      (लालू यादव जी अगर ये बात कहते तो मान भी लिया जाता लेकिन हरिश्चंद्र जी ये बात कहें समझ में कम ही आती है)

      दूसरी बात

      अगर सब्सिडी देकर ही भार कम करना था तो पहले क्यों नहीं बताया? क्या होने वाले मुख्यमंत्री को नहीं पता था आखिर सब्सिडी कहाँ से आती है? (लोगों को तो नहीं पता कि उनकी ही जेब काट के सब्सिडी दी जाती है)

      आज की खबर के मुताबिक दो दिन में भष्टाचार से निपटने वाली फोन लाइन पर २३००० कॉल्स आई :- जरा इसका विश्लेषण करेंगे “आप”?
      २ दिन = ४८ घंटे
      ४८ घंटे = ४८ x ६० = २८८० मिनट्स
      २८८० मिनट्स = २८८० x ६० = १७२८०० सेकेंड्स
      १७२८०० सेकेंड्स यानि एक काल को कितने सेकंड मिले? जरा गुणा भाग कीजिये? लगभग ७ सेकेण्ड आते हैं. ७ सेकेण्ड में तो राम राम भी नही हो पाती है, अरुण जी.

      क्या कहेंगे “आप”? जागरूक नागरिक बनिए.

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  4. आर. सिंह

    आर.सिंह

    डर रहे हैं दूसरी पार्टी वाले.रूह कांपने लगी है उन लोगों की आम आदमीं पार्टी के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर. सभी समीकरण बिगड़ते हुए नजर आ रहे है. अतः तरह तरह के इल्जाम लगाये जा रहे हैं. जुम्मा जुम्मा आठ दिन हुए हैं आम आदमी पार्टी द्वारा सत्ता सम्भाले हुए.क्या चाहते हैं आपलोग उससे ? यह कसम तोड़ दी ,वह कसम तोड़ दी.कहाँ बनी है गठ बंधन सरकार ,जिसके लिए अरविन्द केजरीवाल ने कसम खाया था?कहाँ है सरकार में साझा ? कहाँ है न्यूनतम साझा कार्यक्रम? क्या आपलोग सचमुच इतने मूढ़ है कि गठ बंधन सरकार और अल्पमत सरकार का अंतर नहीं समझते या जानबूझ कर यह माया जाल फैला रहे हैं?अरे भाई एक दिन कहते हो कि जब बिना शर्त समर्थन मिल रहा है तो जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हो,दूसरे दिन कहते हो कि भ्रष्टों की गोद में सर छुपा लिया. आखिर आपलोग चाहते क्या हैं?आम आदमी पार्टी जनता को धोखा दे दे? आपलोगों के कहने पर पार्टी तोड़ दे? या आपलोगों के नेता को अपना नेता मान ले? अब आम आदमी पार्टी की चुनौती देश के स्थापित और भ्रष्ट पार्टियों पर भारी पड़ रही है. पर आम आदमी के सामने आशा की एक किरण तो है

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  5. शिवेंद्र मोहन सिंह

    अभी तो ये नाटक कि शुरुआत है….. देखते जाइये और क्या क्या है हरिश्चंद्र जी के पिटारे में…… जनता पहले भी मूर्ख थी आज भी मूर्ख ही है, क्षणिक फायदे के लिए देश को ही दांव पर लगा रही है. पहले कांग्रेस के चंगुल में थी अब पलटू के चम्बे में आ गई है.

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