लेखक परिचय

रामस्‍वरूप रावतसरे

रामस्‍वरूप रावतसरे

एक जागरूक पत्रकार और कर्मठ समाजसेवी रामस्वरूप रावतसरे गत 20 वर्षों से लगातार लेखन के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान के संगठन मंत्री रामस्वरूप जी ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं मे अपनी लेखन कला की छटा बिखेरी है। संप्रति- सहायक सम्पादक (भारतीय पक्ष मासिक पत्रिका)

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रामस्वरूप रावतसरे

प्रश्न खडा करने वालों पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देने की हमारी पुरानी आदत है । यही कुछ सरकार में बैठे लोग कर रहे है। सरकार में बैठे लोगों का मानना है कि वे जो कुछ कर रहे है वही सही है उसके काम के बारे में या उनके बारे में कुछ कहना उन्हें अच्छा नही लगता है । उन्हें लगता है कि यदि यह कुछ कहेगा तो जनता इसकी ओर ध्यान देगी ओर उनका जनता में जो कुछ विश्वास उनके प्रति है वह जाता रहेगा। इसलिये प्रश्न खडा करने वाले को ही प्रश्न चिन्ह का रूप दे दो ।

अन्ना हजारे ने जो कुछ करने की कोशिश की थी वह पूरे भारत की जनता के सामने है यदि जन लोक पाल बिल लागेू हो जाता तो भारत की जनता का ही भला होने वाला था । लेकिन हमारे यहां के नेताओं का अपना गणीत होता है । वे उससे आगे नही देखते, देखते है तो उसके पीछे ही देखते है । जन लोक पाल जनता के लिये था उसमें नेता मालिक नही , सेवक बनता था जिसे हमारे देश के नेता कभी नही चाहते । हमारे यहां कहने को लोक तन्त्र है लेकिन सब कुछ राज तन्त्र की तरह ही होता है। लोकतन्त्र एक दिन के लिये होता है जिस दिन वोट पडते है उसके बाद सब कुछ राजतन्त्र की तरह ही होता है ।

सरकार चले लेकिन उसमें किसी भी प्रकार से जनता की भागीदारी हो यह नेता नही चाहते है । वे चाहते है सरकार हो पर उनके सरकाने से ही सरकार सरके (आगे बढे)। यही कारण रहा कि अन्ना का जब आन्दोलन हुआ उसमें जनता थी पर उसमें निर्वाचित प्रतिनिधि या सरकार नही थी । होते भी कैसे, लोकपाल का आना उसके ही पैरों को उखाडने का उपक्रम था । इसलिये माननीय नेताओं ने कभी अन्दर से तो कभी बाहर से अपने आपके सर्वोच्च होने का ब्यान देकर लोकपाल को लोगों तक ही सीमित रहने दिया । संसद के दरवाजे में प्रवेश कराया तो ऐसा लोकपाल था ,जो इन नेताओं की ही चापलुसी करता नजर आ रहा था । टीम अन्ना जिस उत्साह से मंचों पर आसीन हुर्इ थी उसी उत्साह से चूनावी दंगल में देख लेने की हुकार भरते हुए मंच से नीचे उतर आर्इ ।

बाबा रामदेव का काला धन मंगाने का उपक्रम उन्हें ही काला करने में लगा है । सरकार ने उनकी मांग पर काम तो किया है । काले धन की वापसी से पहले बाबा रामदेव को ही कालिख पोतने का काम किया है कि वे भी उसी प्रकार काले है जिनके लिये वे दहाडे मार कर जनता को इक्कठा करते है । बाबा ने जब योग के माध्यम से जनता को इक्कठा किया था तो नेता भी उसमें सरीक हो रहे थे ,लेकिन जब बाबा ने काले धन की बात उठार्इ तो नेताओं को लगा कि यह तो उनके काले कारनामें उजाले में लाने को कोशिश कर रहा है ं तो क्यों नही इनको ही कालिख पोत दी जावे ओर सरकार ने किया भी । बाबा के सहयोगाी बालाकृष्ण को कर्इ प्रकार के मामलों में फसाया जाकर जेल में डाल दिया गया । यह तब हुआ जब बाबा ने सरकार के नाक के बालों में पडी गंदगी की ओर इशारा किया । यदि वह नही करते तो बाबा कें यहां भी जो कुछ भी काला सफेद होता रहता ना सरकार आंख खोलती और नाही उसके नुमार्इन्दें ।

हमारी यह खासियत रही है कि जब भी कोर्इ हमारी कमजोरी की ओर या जो हमारी आगे बढने की गति है उसे और कैसे बढाया जावे बताता है तो हम उसे सुधारते नही है । और नाही उसकी जनहित की बातो पर ध्यान देते है । एक काम करते है उसके ही चारों ओर प्रश्न चिन्हों का कंटिला बाडा खडा कर देते है ताकि वह आगे कोर्इ किसी प्रकार का प्रश्न ही नही करें ं । यही कुछ बाबा रामदेव व अन्ना हजारे के साथ हुआ। हमारे नेता जानते है कि जनता जो कि एक भीड का रूप होती है । उसे कभी भी अपने पक्ष में मोडा जा सकता है । फिर चुनावों में अभी काफी समय है । तब तक किसे आन्दोलनों की बात याद रहती है । वोट तो जातिवाद के आधार पर ही पडेगें जिसका जहर इन्होने नीचे तक फैला रखा है ।

अन्ना टीम ने जब राजनैतिक दल बना कर आगे आने की बात कही तो सभी दलों ने उसका स्वागत किया । यही कुछ बाबा रामदेव की घोषणा के बाद नेताओं की प्रतिकि्रया थी । राजनेता जानते है कि राजनैतिक दल बना कर या चुनावी मैदान में उतरकर सामना करना, यह तभी सफल होता है जब उनकी तरह सर्वगुण सम्पन्न हो । अन्ना टीम और बाबा रामदेव ऐसा करेगें तो उन लाखों समर्थकों का क्या होगा जो बिना किसी लागलपेट के इनकी एक ही हुकार के साथ सडकों पर उतर आये थे। खैर भविष्य में क्या होगा कहा नही जा सकता लेकिन आज जनता अपने आपको दो राहे पर खडा हुआ पा रही है । कि कैसे भ्रष्ट आचरण वालों को सत्ता व शासन से दूर रखें । क्या अन्ना का कुनबा देश के काम आ पायेगा । या बाबा रामदेव अपने ही कार्मो के कारण उलझे जनता को रह दिखा पायेगें ।

3 Responses to “प्रश्न खडा करने वालों पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देना”

  1. Ramsawroop Rawatsare

    आपकी प्रभुधता ही है जो वैचारिक धरातल को बनाय हुआ है अछी प्रतिकिरिया के लिया धन्यवाद
    रामस्वरूप रावत्सरे

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  2. santanu arya

    क्या ये सवालों के बदले सवाल नहीं है दूध का धुला कोई नहीं है

    अपने तीखे सवालों से राजनीति के दिग्गजों को चारों खाने चित करने वाले वाले केजरीवाल पर दिग्गविजय सिंह के सवाल भारी पर रहे हैं। अपनी पादर्शिता की ढिंढोरा पीटने वाली टीम केजरीवाल दिग्विजय के सवालों पर लीपापोती करती नजर आ रही है। टीम केजरीवाल को लग रहा है कि अगर उन्होंने दिग्विजय के सवालों के जवाब दिए तो फंसने का डर है। उन्हें लग रहा है कि दिग्विजय ने पहले सबूतों को इक्ट्ठा किया है फिर सवाल दागे हैं।

    दिग्विजय सिंह के सवालों पर अरविंद केजरीवाल ने पलटवार किया है। केजरीवाल ने कहा कि वह दिग्विजय के सवालों का तभी जबाव देंगे जब पहले उनके सवालों का जवाब मिले। केजरीवाल ने कहा है कि उन्होंने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा से भी सवाल पूछे थे, पहले उन सवालों के जवाब मिलने चाहिए। केजरीवाल ने दिग्विजय को जनता के सामने तमाम सवालों पर बहस की चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। उन्हें प्रधानमंत्री, सोनिया और राहुल को सार्वजनिक बहस के लिए जनता सामने लाना चाहिए। अगर दिग्विजय ऐसा नहीं पाएं तो कांग्रेस में रहने का उनका कोई मतलब नहीं।

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  3. आर. सिंह

    आर.सिंह

    अभी तो विकल्प की कुछ सम्भावना दिख रही हैऔर उसको जनता का सहयोग भी मिलता नजर आ रहा है,पर यह विकल्प कारगर हो पायेगा या नहीं,यह इस बात पर निर्भर करता है कि जनता का कितना बड़ा भाग उनको वोटों द्वारा समर्थन देता है.सभी राजनैतिक दल एक एक करके नंगे अवश्य हो रहे हैं,पर उनका वह पलटवार भी जारी है कि हम तो भ्रष्ट हैं ही,पर तुम भी कुछ कम नहीं हो..अब तो यह जनता पर निर्भर करता हैकि वह अपना वोट बेचती है या सुध बुध के साथ उसका इस्तेमाल करती है.ऐसे यह अवसर बहुत अरसे के बाद जनता के पास आया है.इस बार अगर वह चूकती है तो पता नहीं यह अवसर फिर कब आये?

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