शख्सियत समाज

आज के आंदोलन और  महात्मा गांधी 

विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

 आज सड़क पर लोगों के जमावड़े के हाथों में जब कोई माँग लिखी तख्ती दिखती है, तो वह आंदोलन केवल नारा नहीं होता। 

उसके पीछे किसी किसान की चिंता, किसी नौजवान की बेरोज़गारी, किसी स्त्री की असुरक्षा या किसी समुदाय की अनसुनी पीड़ा दिखती है। भारत जैसे लोकतंत्र में आंदोलन इसी पीड़ा को सार्वजनिक आंदोलन बना देते हैं लेकिन शोर और सुनवाई के बीच की दूरी कैसे घटे? 

यहाँ गांधी आज भी उपयोगी हैं, किसी तस्वीर के रूप में नहीं बल्कि संघर्ष करने की एक कठिन सैद्धांतिक पद्धति के रूप में उन्हें समझना ही चाहिए।

गांधी का सत्याग्रह अन्याय को चुपचाप सहना नहीं था। वह स्पष्ट प्रतिरोध था, लेकिन ऐसा प्रतिरोध जिसमें सच को बढ़ा-चढ़ाकर कहने, विरोधी को अपमानित करने या अपने साथियों को हिंसा के लिए उकसाने की छूट नहीं थी। गांधी जी ने चौरी चौरा कांड के कारण समूचा आंदोलन वापस लेने का साहस दिखाया था ।

आज आंदोलन का एक हिस्सा सड़क पर होता है और दूसरा मोबाइल की स्क्रीन पर चलता है। एक अधूरी वीडियो क्लिप, अपुष्ट चर्चा या उत्तेजक संदेश मिनटों में फैल जाता है। ऐसे समय में सत्याग्रह की पहली शर्त शायद यह हो कि अपनी बात रखने से पहले तथ्यों की जाँच की जाए। 

अपनी ही ओर से फैली गलत सूचना को भी स्वीकार कर सुधारने का साहस रखा जाए।

अहिंसा को अक्सर कमजोरी समझ लिया जाता है पर भीड़ के असंयमित उबाल में किसी को चोट न पहुँचने देना, उकसावे के बावजूद सामूहिक संयम बनाए रखना और असहमति रखने वाले को बोलने देना आसान काम नहीं है। 

इससे आंदोलन की वैध माँग अधिक लोगों तक पहुँच पाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि पीड़ित व्यक्ति से हमेशा विनम्र स्वर की अपेक्षा की जाए, जबकि सत्ता अपनी जिम्मेदारी से  बचती रहे।

 शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार तभी सार्थक है जब प्रशासन भी संवाद करे, सुरक्षा सुनिश्चित करे और शिकायत का समयबद्ध उत्तर दे। गांधी की कसौटी केवल प्रदर्शनकारी के लिए नहीं, शासन के लिए भी है।

गांधी के आंदोलनों में एक और बात दृष्टव्य थी, माँग के साथ ही सरकार के साथ ही रचनात्मक काम। चंपारण में किसानों की व्यथा सुनना राजनीतिक कार्रवाई थी, लेकिन गाँव की दशा और शिक्षा की चिंता भी उससे अलग नहीं थी। दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजी सेना से सहयोग का निर्णय उन्होंने लिया था।

आज कोई आंदोलन पर्यावरण के लिए है तो अपने आयोजन में संसाधनों की बचत कर सकता है।  समानता के लिए संघर्ष है तो अपने मंच पर महिलाओं और हाशिये के लोगों को सचमुच जगह दे। मंच पर जिस भविष्य का दावा किया जाए, उसका थोड़ा-सा अभ्यास आंदोलन के भीतर भी दिखना चाहिए। नेता अपने समर्थकों की असहमति सुन सकें और निर्णयों का हिसाब दें, तभी आंदोलन भीतर से लोकतांत्रिक रहेगा।

 केवल सत्ता से पारदर्शिता माँगना पर्याप्त नहीं, अपनी आंदोलन पद्धति में भी उस पारदर्शिता को जगह देनी गांधी वादी सोच  होगी।

यह भी स्वीकार करना होगा कि गांधी के समय और आज की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं हैं। आज की सामाजिक विषमताओं और डिजिटल माध्यमों की गति के लिए नए उपाय चाहिए। 

गांधी की हर बात को अंतिम उत्तर मानना उनके प्रयोगशील स्वभाव के साथ भी न्याय नहीं होगा। 

किसी आंदोलन को उनकी पद्धति से सीखने का अर्थ अपनी विशिष्ट पीड़ा या राजनीतिक मतभेद को दबाना नहीं। इसका वास्तविक अर्थ है कि लक्ष्य जितना न्यायपूर्ण हो, रास्ते की जवाबदेही भी उतनी ही गंभीर हो।

 प्रदर्शनस्थल पर कोई वृद्ध व्यक्ति पानी बाँट रहा है, पास खड़ा युवक माँगों का तथ्य समझा रहा है, और दोनों उस व्यक्ति को भी सुन रहे हैं जो उनसे सहमत नहीं। यह दृश्य भव्य नहीं है, पर लोकतंत्र इसी अभ्यास से मजबूत होता है। शायद स्कूलों में बच्चों को बाद विवाद प्रतियोगिता हेतु बौद्धिक तथा स्वभावगत रूप से तैयार करना चाहिए।

 आंदोलन की सफलता केवल भीड़ की संख्या या किसी घोषणा से नहीं मापी जा सकती। वह इस बात से भी पहचानी जाती है कि संघर्ष के बाद संवाद और साथ बने रहने की कितनी जगह बची।

 गांधी की प्रासंगिकता शायद इसी कठिन प्रश्न में है, क्या हम अन्याय का विरोध करते हुए मनुष्यता को बचाए रख सकते हैं?

विवेक रंजन श्रीवास्तव