विश्ववार्ता

ईरान में औंधे मुँह गिरने पर ट्रंप के बोल – मदद करो !!!


डॉ0 रामा तक्षक, नीदरलैण्ड


28 फरवरी को शुरू हुआ ईरान का युद्ध, अब वैश्विक स्तर पर, एक समस्या बनकर खड़ा हो गया है। ईरान पर इजरायल और अमेरिका द्वारा थोपे गये युद्ध में हजारों आदमी युद्ध की बली चढ़ गए हैं। पूरा मध्य पूर्व युद्ध की चपेट में है। लगभग पूरा विश्व, अमेरिका और इजराइल को छोड़कर यह आस लगाए हैं कि युद्ध कब खत्म हो, अब खत्म हो ताकि होर्मुज की खाड़ी से तेल की सप्लाई व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे।
ईरान युद्ध ट्रंप के गले की फाँस बन गया है। ट्रंप ने सोचा था कि आसमान से बम गिराकर, ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव हो जाएगा। ईरान पर कुछ बम गिरने के बाद, ईरान की जनता के सत्ता के खिलाफ खड़ी हो जाएगी जबकि ऐसा नहीं हुआ क्योंकि ईरान की जनता यह भलीभाँति जानती है कि ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड के सामने जनता का जमावड़ा, गोलियों से भून दिया जाएगा। इस जमावड़े में जिनको बंदी बना लिया जाएगा, उनके पदचिन्ह धरती से उठ जाऐंगे।  मेरे अपने एक ईरानी परिचित ने व्हाट्सएप के माध्यम से बिना अपना नाम उजागर किये जाने की शर्त पर व्हाट्सएप पर यह लिख भेजा है कि हम इस सत्ता से स्वतंत्र होने का इंतजार कर रहे हैं।


युद्ध की शुरुआत में, कुछ सत्ता परिवर्तन समर्थक लोग ईरान की सड़कों पर निकले थे लेकिन क्रांति का रूप न लेकर, सड़कों पर जल्द ही शांति छा गई। दो सप्ताह से अधिक समय की बमबारी और ईरान का अमेरिकी अड्डों पर मिसाइलों से उलट जवाब, होर्मुज की अग्निबाणों से नाकेबंदी से अब रजा पहलवी के बेटे को ईरान की सत्ताधारी बनने बनाने का सपना भी धराशायी हो गया है। अमेरिकी सैनिकों की ईरान की धरती पर उपस्थिति के बिना सत्ता परिवर्तन सम्भव नहीं है। सत्ता परिवर्तन की भूखी निहत्थी जनता को सैनिकों का साथ चाहिए।


ईरान पर युद्ध झोंकने के बाद, ट्रंप नाटो देशों को सीधे-सीधे यह कह रहा है कि यदि इस समय तुमने मेरी मदद नहीं की तो हम इस बात को याद रखेंगे। मूलतः नाटो में यूरोप के देश हैं। रूस द्वारा यूक्रेन पर थोंपा गया युद्ध अपने चार बरस पूरे कर चुका है। यह युद्ध यूरोप के आँगन से जुड़ा है। यूक्रेन ही नहीं यूरोप भी चार साल से इस युद्ध से उपजी विस्थापन की लहर और आर्थिक कारणों से जूझ रहा है। यूरोपीय देश किसी भी कीमत पर नहीं चाहते कि यूक्रेन पर रूस का आधिपत्य हो जाए। ईरान युद्ध पर अमेरिका का साथ देने में यूरोप की स्थिति साँप के मुँह में छछूँदर की सी है।
याद रहे कि विश्व का 20 प्रतिशत कच्चा तेल होर्मुज की खाड़ी से होकर दुनियाँ भर में सप्लाई किया जाता है। ट्रम्प  होर्मुज की खाड़ी में तेल टैंकरों के यातायात को ईरान के अग्निबाणों से बचाने के लिए चीन को भी ढ़ाल बनने के लिए कह रहा है। चीन ऐसा कदापि नहीं करेगा। ईरान के युद्ध से चीन मजबूत हो रहा है।


ट्रम्प ने ईरान पर, युद्ध झोंकने के समय, नाटो देशों के साथ सम्पर्क नहीं किया था। नाटो देशों को इस युद्ध की कानोंकान खबर नहीं थी। इसी कारण यूरोपीय देश कह रहे हैं कि यह हमारा युद्ध नहीं है। हालाँकि ईरान युद्ध की शुरुआती के दिनों में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्ट्रामर ने अमेरिका की मदद की पहल पर ट्रम्प ने कहा हम युद्ध जीत रहे हैं। मदद की क्या जरूरत है.


अमेरिका के दादा ने दुनियाँ के देशों पर, ताबड़तोड़ व्यापार कर लगाकर निचोड़ना शुरू कर दिया था। आज वही अमेरिकी दादागिरी होर्मुज की खाड़ी में सहयोग के लिए भिखारीपन पर उतरी हुई है। ट्म चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी से सहयोग चाहता है। अमेरिकी उपभोक्ता पेट्रोल पंप पर, कारों में पेट्रोल भराते समय, महंगे दामों में पेट्रोल खरीद पर कह रहे हैं कि ईरान युद्ध में खर्च हमारी जेब से हो रहा है। यह सब हमारा पैसा है, ट्रंप का पैसा नहीं है। युद्ध विशेषज्ञों द्वारा इस युद्ध के शुरुआत के दो दिनों में हुए युद्ध खर्च का आकलन पांच बिलियन से अधिक का खर्च आँका जा रहा है। इन 18 दिनों में कितना खर्च हुआ होगा सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।


ट्रंप अपने ही किये के जाल में फंस गया है। ’’अमेरिका ग्रेट अगेन’’ कहकर उसने राष्ट्रपति का चुनाव जीता था और उसने यह बहुत ही शब्द स्पष्ट शब्दों में कहा था कि अब आगे से हम युद्ध नहीं लड़ेंगे। हम अमेरिका की अर्थव्यवस्था को सुधारेंगे। अमेरिका की अर्थव्यवस्था में सुधार, हमारी पहली प्राथमिकता होगी लेकिन साल भर होते ही ट्रंप ने ईरान पर दोबारा हमला कर दिया है। युद्ध जारी है। देखो ऊँट किस करवट बैठता है।
यूक्रेन का राष्ट्रपति जब अमेरिका के राष्ट्रपति से मिलने व्हाइट हाउस गया था तो ट्रम्प ने उसकी बहुत बेईज्जती की थी। इतिहास में शायद ही ऐसा कोई उदाहरण मिलता हो जब एक राष्ट्रपति द्वारा दूसरे राष्ट्रपति को कैमरे के सामने बेइज्जत किया गया। उस समय ट्रंप ने बहुत कड़े शब्दों में यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से कहा था कि ’’यू डोंट हैव कार्ड्स।’’ अब समय आ गया है ये शब्द ’’यू डोंट हैव कार्ड्स’’ शीशे पर लिखकर, ट्रम्प को दिन में आठ दस बार शीशा दिखाया जाना चाहिए।

  
जानकारों के अनुसार ट्रम्प की नाटो देशों से मदद की पुकार न होकर भविष्य की फुँफकार भी है। दादागिरी करने वाला यही कहता है कि मैं देख लूंगा। इस समय यूरोप को एक स्वर में कहना चाहिए। यह हमारा युद्ध नहीं है। यूरोपीय देशों को यूक्रेन और ईरान के मामले में ट्रम्प को कटघरे में खड़ा करके डील करनी चाहिए। ज्यादा अच्छा तो यह होगा कि ’’यू डोंट हैव कार्ड्स’’ लिखा दर्पण दिखा कर, डील करनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसे उन्मादी युद्धों से मानवता को बचाया जा सके।( युवराज फीचर्स )   

डॉ0 रामा तक्षक, नीदरलैण्ड