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उन्नाव रेप केसः न्याय, सत्ता और कानून की कसौटी पर सुप्रीम कोर्ट की दखल

बाबूलाल नागा

   देश के सबसे चर्चित और संवेदनशील आपराधिक मामलों में शामिल उन्नाव रेप केस एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाए जाने के बाद, जिसमें दोषी करार दिए जा चुके पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित कर जमानत दी गई थी, यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई या कैद तक सीमित नहीं रह गया है। यह फैसला दरअसल न्याय प्रणाली, सामाजिक विश्वास और कानून की आत्मा की परीक्षा बन गया है।

   उन्नाव की पीड़िता की कहानी केवल एक अपराध की दास्तान नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां सत्ता, भय और दबाव के बीच न्याय की राह अत्यंत कठिन हो जाती है। एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार, उसके परिवार पर लगातार हमले, पीड़िता के पिता की हिरासत में संदिग्ध मौत और गवाहों को डराने की घटनाओं ने इस केस को सामाजिक-न्याय का प्रतीक बना दिया। ऐसे में जब किसी अदालत द्वारा दोषी को राहत दी जाती है तो सवाल केवल कानूनी नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक भी हो जाते हैं।

   इस मामले में दोषसिद्धि भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और पॉक्सो अधिनियम के तहत हुई थी। पॉक्सो कानून विशेष रूप से बच्चों के यौन शोषण से सुरक्षा के लिए बनाया गया है और इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि यदि अपराध किसी प्रभावशाली व्यक्ति या लोक सेवक द्वारा किया जाए, तो उसे गंभीरतम श्रेणी में माना जाएगा।

   यहीं से विवाद की जड़ शुरू होती है। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह टिप्पणी की कि विधायक को पॉक्सो के संदर्भ में ‘लोक सेवक’ की परिभाषा में नहीं रखा जा सकता, और इसी आधार पर गंभीर आरोपों की धार कमजोर मानी गई। इस तकनीकी व्याख्या ने पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी।

   सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाते हुए साफ किया कि यह कोई साधारण मामला नहीं है। अदालत ने कहा कि विधायक जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को ‘लोक सेवक’ मानने या न मानने का प्रश्न केवल शब्दों की व्याख्या नहीं बल्कि कानून की मंशा और समाज पर उसके प्रभाव से जुड़ा है। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई बल्कि दोषी को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया।

   कुलदीप सिंह सेंगर की संभावित रिहाई का विरोध केवल कानूनी दलीलों तक सीमित नहीं है। यह विरोध उस डर और अविश्वास से उपजा है, जो वर्षों से यौन हिंसा की शिकार महिलाओं और बच्चों के मन में घर कर चुका है। जब एक प्रभावशाली आरोपी को राहत मिलती है तो संदेश केवल पीड़िता तक नहीं जाता बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति तक पहुंचता है, जो न्याय की उम्मीद लेकर थाने और अदालत का दरवाजा खटखटाता है।

   महिला अधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसे फैसले पीड़ितों का मनोबल तोड़ते हैं और भविष्य की पीड़िताओं को चुप रहने के लिए मजबूर करते हैं। उन्नाव केस में तो पीड़िता और उसके परिवार ने न्याय पाने के लिए असाधारण साहस दिखाया। ऐसे में दोषी को राहत देना उस संघर्ष को कमजोर करने जैसा प्रतीत होता है।

   यह मामला इस सवाल को भी जन्म देता है कि क्या कानून की व्याख्या सत्ता-संपन्न व्यक्तियों के लिए अलग हो सकती है? लोकतंत्र में विधायक जनता का प्रतिनिधि होता है और संविधान उसे विशेष जिम्मेदारियां सौंपता है। यदि वही प्रतिनिधि कानून तोड़ता है, तो क्या उसे आम नागरिक से कम जवाबदेह माना जा सकता है?

   सुप्रीम कोर्ट की रोक को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। यह संदेश स्पष्ट है कि न्याय केवल तकनीकी खामियों से नहीं बल्कि कानून की भावना से संचालित होना चाहिए। पॉक्सो जैसे कानून का उद्देश्य बच्चों को भयमुक्त वातावरण देना है, न कि अपराधियों को व्याख्याओं के जाल से बाहर निकलने का रास्ता।

   उन्नाव केस ने यह भी उजागर किया है कि न्यायिक प्रक्रिया में जनता का भरोसा कितना नाजुक होता है। वर्षों की सुनवाई, संघर्ष और बलिदान के बाद यदि फैसले तकनीकी आधार पर पलटते दिखें तो आम नागरिक का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है।

   सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस विश्वास को पुनः स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह केवल एक दोषी की जमानत रोकने का आदेश नहीं बल्कि उस धारणा को चुनौती है कि ताकतवर लोग अंततः कानून से बच निकलते हैं।

   उन्नाव रेप केस आज एक व्यक्ति के अपराध से आगे बढ़कर भारतीय न्याय व्यवस्था की आत्मा से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की रोक यह संकेत देती है कि कानून की अंतिम व्याख्या केवल शब्दों से नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों से तय होगी।

   यह मामला आने वाले समय में यह तय करेगा कि क्या भारत की न्याय प्रणाली कमजोर की आवाज के साथ खड़ी रह सकती है या फिर तकनीकी दलीलें न्याय के रास्ते में दीवार बनेंगी। देश की निगाहें अब सर्वोच्च अदालत पर टिकी हैं क्योंकि यहां फैसला केवल एक केस का नहीं बल्कि न्याय पर समाज के विश्वास का होगा।

बाबूलाल नागा