उत्तराखंड पर भी मंडरा रहे है नक्सली संकट के बादल-डीजीपी

उत्तराखंड देश का नवसृजित किंतु अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं से लगा होने के चलते काफी महत्वपूर्ण राज्य है। देश में लगातार बढ रहे नक्सली प्रभाव का संकट अब यहां भी महसूस किया जा रहा है। यह बात न केवल प्रदेश के मुख्यमंत्री बल्कि पुलिस प्रशासन भी कहीं दबी जुबान तो कहीं खुल कर मानने लगा है। प्रदेश की नेपाल और चीन से लगती सीमाएं काफी संवेदनशील हो चली है। मुख्यमंत्री जहां इसके लिए केन्द्र से विशेष सुविधाओं की मांग कर रहे है वहीं पुलिस के मुखिया सीमाओं पर चौकसी की व्यवस्था को लेकर चिंतित नजर आ रहे है।

इन्ही सब मुद्दों पर हाल ही में प्रदेश के पांचवें पुलिस महानिदेशक के तौर पर कार्यभार संभालने वाले 1976 बैच के आईपीएस ज्योतिस्वरूप पांडे से धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के मुख्य अंश।

प्रदेश की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं को लेकर आपके विचार क्या हैं।

देखिए उत्तराखंड राज्य छोटा किन्तु अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं वाला दुर्गम राज्य है। इसकी सीमाएं चीन और नेपाल जैसे देशों से लगती है। जो अपने आप में ही सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण और संवेदनशील हैं। चीन से लगती जो सीमाएं है वे रिमोट सीमाएं है और कुछ ऐसे क्षेत्र भी है जो वर्ष भर बर्फ से ढके रहते हैं। वहां पुलिसिंग की कोई व्यवस्था अभी तक नहीं है। दूसरी सीमा भारत-नेपाल सीमा है। चूंकी ये सीमा खुली सीमा है और इसी वजह से यहां पर समस्याएं भी अधिक हैं। दोनों देशों को काली नदी सीमांकित करती है। लेकिन इस नदी के आर पार जाने के लिए कोई रोक टोक नहीं है। कोई भी जांच का प्रावधान नहीं है। जिससे लोग आसानी से एक देश की सीमा से दूसरे देश में जा सकते हैं। इन सीमाओं पर पिछले 10 साल से भारत सरकार ने सशस्त्र सीमा पुलिस को सुरक्षा का जिम्मा दे रखा है।

क्या प्रदेश पुलिस यह मानती है कि उत्तराखंड में सीमाओं को लेकर कोई समस्या नहीं है।

नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है। प्रदेश पुलिस ऐसा नहीं मानती है। लेकिन प्रदेश पुलिस का कहना है कि इन सीमाओं पर सामान्य चेकिंग हो सकती है। जिससे हथियार, विस्फोटक, मादक पदार्थों की तस्करी पर रोक लगाई जा सकती है। लेकिन कई स्थान ऐसे है जहां से असामाजिक तत्व अपनी समाजविरोधी गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। प्रदेश पुलिस का मानना है कि ऐसे स्थानों के लिए खास सुरक्षा इंतजाम किये जाने चाहिए। रही बात प्रदेश में इन सीमाओं को लेकर संकट की तो उत्तर प्रदेश और बिहार की तुलना में उत्तराखंड की सीमाएं ज्यादा सुरक्षित है। हां बनबसा और खटीमा से लगते क्षेत्रों में कुछ समस्याएं जरूर है। लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए पुलिस सदैव अलर्ट है। हालांकि नेपाल में बढते माओवाद के प्रभाव से देश में हो रही नक्सली घटनाओं को देखते हुए यहां भी नक्सली तत्वों के विकास की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन इन क्षेत्रों में अभी तक कोई ऐसा दृष्टांत नहीं मिला है जिससे साबित हो सके कि इन क्षेत्रों में नेपाली माओवादी गतिविधियां संचालित हो रही है।

क्या आप ये दावा कर रहे है कि प्रदेश में अभी तक नक्सली गतिविधि के कोई संकेत नहीं मिले हैं।

जी बिल्कुल नहीं। मैं तो कह रहा हूं कि विगत दिनों उत्तराखंड में भी कुछ ऐसी घटनाएं पकड़ में आई हैं जिसमें ऐसी घटनाओं की साजिश का भंडाफोड़ हुआ है और ऐसी साजिशों के संकेत मिले। लेकिन पुलिस की सक्रियता ने उन्हें निष्क्रिय कर दिया। इन घटनाओं को देखते हुए प्रदेश में नक्सली घटनाओं के घटित होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। इन घटनाओं को होने की आंशका इसलिए भी अधिक हो जाती है कि प्रदेश का एक बडा हिस्सा वनाच्छादित है और नियमित और सामान्य सुरक्षा से दूर है और नक्सली ऐसे क्षेत्रों की तलाश में रहते है। इसलिए ऐसी संभावनाएं बरकरार हैं।

उत्तराखंड के सीमावर्ती गांवों की सुरक्षा के लिए पुलिस की कोई विशेष योजना या विलेज विजिलेंसी की वर्तमान स्थिति के बारे में बताएं।

देखिए ये सवाल बहुत ही संवेदनशील है। लेकिन मैं आपको बताना चाहूंगा कि सीमावर्ती गांवों को लेकर पुलिस बिल्कुल संजीदा है और अलर्ट है। रही बात विलेज विजिलेंसी की तो पुलिस इन क्षेत्रों पर विशेष नजर रखती है और हिसंक घटनाओं या षडयंत्रों को समय रहते निष्क्रि्रय करने के लिए अपना नेटवर्क बना रखी है जिसके माध्यम से ऐसी गतिविधियों पर रोकथाम का प्रयास लगातार जारी रहता है।

पिछले दिनों हुई कुछ घटनाओं को लेकर पुलिस का मनोबल गिरने की बात भी की जा रही है। इसमें कितनी सत्यता है।

देखिए पुलिस का काम किसी भी समस्या को तत्काल प्रभाव से रोकना और उसका निदान करना है। इसके लिए पूरे देश में पुलिस ही एक मात्र वह एजेंसी है जिसको सरकार ने न्यूनतम् बल प्रयोग का अधिकार भी दे रखा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस उस बल प्रयोग के अधिकार का बेजा इस्तेमाल करे और जनता को परेशान करे। पुलिस को इस अधिकार का प्रयोग बहुत ही सजगता के साथ करना पडता है और सिर्फ कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ही किया जाता है। रही बात पुलिस के मनोबल गिरने की तो मैं बताना चाहूंगा कि प्रदेश पुलिस का मनोबल बिल्कुल उंचा है और वो अपना कार्य पूरी ईमानदारी से कर रही है। पुलिस की डयूटी ही संघर्ष,गाली और गोली से शुरू होती है। इसलिए उसका मनोबल इन तीनों तत्वों से कभी भी प्रभावित नहीं होता।

पुलिसिंग सिस्टम में बदलाव को लेकर आपके क्या विचार है।

देखिए कोई भी सिस्टम हो उसमें समय के साथ बुराईयां आती ही है और समय के अनुसार ही उसमें बदलाव भी किए जाते है। इसलिए आज के पुलिसिंग सिस्टम की बात की जाए तो समय के साथ पुलिस के कार्यो में विभिन्नता आई है नई चुनौतियां और अपराध के नए तौर तरीके भी आए हैं उसके हिसाब से तो सिस्टम में बदलाव की जरूरत महसूस की जा सकती है। लेकिन इसके इतर तात्कालिक तौर पर पुलिस सिस्टम के सामने सबसे बडी चुनौती अपराध एवं शांति व्यवस्था को बनाए रखते हुए मानवाधिकारों की संपूर्ण सुरक्षा है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जो सुधार आवश्यक हो वो किए जाने चाहिए। इसके साथ ही पुलिस में मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करना भी समय की सबसे बडी मांग है। पुलिस समस्याओं से निपटने के लिए मानवाधिकारों के हनन का रास्ता अपनाने की बजाय अपराधों का विस्तृत विश्लेषण करे और थर्ड डिग्री जैसी बुराईयों से बचते हुए निरोधात्मक कार्रवाई करे तो शायद यही सबसे बडा सुधार माना जाएगा। मैं मानता हूं कि कुछ केश ऐसे होते है जो पेचीदे हो जाते है जिसे सुलझाने के लिए ऐसे रास्ते अपनाने पड़ते है लेकिन अगर ऐसे मामले में जनता का विश्वास जीतते हुए उसका सहयोग लिया जाए और विक्टिम पर ज्यादा ध्यान दिया जाए तो शायद मामले का आसान हल भी मिल जाएगा और मानवाधिकारों की रक्षा भी हो सकेगी। इसके साथ ही मेरा मानना है कि पुलिस को किसी भी मामले को सुलह समझौते के आधार पर सुलझाने का प्रयास करना चाहिए इसमें समाज और सिस्टम दोनों का हित होगा।

उत्तराखंड में जेलों की दशा पर कोई टिप्पणी

देखिए जेलों की दशा पूरे देश में एक जैसी है। हर जगह जेलें क्षमता से अधिक कैदियों की समस्याओं से जूझ रही है। इसका तात्कालिक हल यहीं है कि पुलिस सिस्टम में कार्यो के मूल्यांकन का आधार गुणात्मक हो न कि संख्यात्मक। लेकिन ऐसा हैं नहीं पुलिस अपनी सीआर अच्छा बनाने के चक्कर में संख्यात्मक प्रदर्शन ज्यादा करती है। जिसके चलते जेलों में कैदियों की संख्या बढती है। इसलिए मेरा मानना है कि पुलिस को उसी के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो वाकई में अपराधी हो और ऐसा तभी हो पाएगा जब पुलिस के कार्यो के आकलन का आधार क्वांटिटेटिव नहीं बल्कि क्वालिटेटिव होगा।

उत्तराखंड पुलिस के लिए सबसे बडी चुनौती इस समय क्या है।

मेरी नज़र में तो पुलिस के सामने हर समय चुनौती ही रहती है। लेकिन फिर भी यदि प्रदेश पुलिस के सामने चुनौती की बात करे तो मेरे हिसाब से मानवाधिकारों के सम्मान के साथ उनका संरक्षण करते हुए समाज की समस्याओं को दूर करना ही सबसे बडी चुनौती है।

प्रदेश पुलिस को कोई संदेश देना चाहेंगे।

इस मंच के माध्यम से प्रदेश की पुलिस को मैं कहना चाहूंगा कि वे मानवाधिकारों का सम्मान करते हुए प्रदेश की सेवा करे और धैर्य रखकर मामलों का निस्तारण करे। वे इस बात का ध्यान रखे  कि वे समस्याओं को सुलझाने के लिए है उलझाने के लिए नहीं। सबका सहयोग लेते हुए कानून एवं व्यवस्था,यातायात,जन सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन कुशलतापूर्वक करे यही उनके लिए मेरा संदेश है।

इस मंच के माध्यम से प्रदेश की जनता को क्या संदेश देना चाहेंगे।

प्रदेश की प्रबुद्ध जनता को मैं यहीं संदेश देना चाहूंगा कि किसी भी वारदात या समस्या के समाधान को लेकर वह ज्यादा दबाव न बनाए। क्यों कि पुलिस के पास भी कोई ऐसा तंत्र नहीं है िकवह पलक झपकते ही किसी भी समस्या का समाधान कर दे। जनता पुलिस का सहयोग करे और किसी भी समस्या के जल्द समाधान के लिए पुलिस पर धरना प्रदर्शन व अन्य माध्यमों से दबाव बनाने पर पुलिस का ध्यान भंग होता है और वारदात को वर्कआउट करने में समय लगता है। इसलिए जनता पुलिस मित्र बन कर कानून एवं व्यवस्था स्थापित करने में पुलिस की मदद करे यही समाज के हित में होगा।

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