कविता

नर्मदा जल को देते उतरनों की वसीयत

माँ  नर्मदा तू पतित पावनी है,

तेरा शीतल जल देता है पाप से छुटकारा

तेरे दर पर बिन बुलाये चले आते है,

स्नान करने नर-नारी ही नहीं भूत पिशाच भी

वे अपने सिर का पाप तुझे अर्पण करते है।

किसी के अन्दर होता है मलबा

किसी के अन्दर चाहे-अनचाहे कुकर्मबोध

तो कुछों के मन में सुलग रही होती है

जीवन भर किये पाप की भट्टियां

ताकि वे तेरे जल में अपने पापों-कुकर्मो को छोड़ सके।

वे घर से पहनकर आये कपड़े

और मन के सारे मवाद

तुझको अर्पण करते है

माँ तू प्रकृतिस्वरूपा जननी है

तेरे जल की पातालखोह खाईयों में समा जाते है

तेरे इन नासमझ बच्चे की छोड़ी उतरनों की वसीयत॥

स्नान के बाद नये-धुले वस्त्र पहनकर

ये बच्चे बन जाते है तेरे भोले भक्त, और

जिसे कोई स्वीकार नहीं कर सकता है

उन गीले-गंदे वस्त्रों की उतरनें

तेरे नाम वसीयत कर, तेरे जल में /तट पर छोड़ जाते है।

बदले में मांगते है धन-दौलत, आस-औलाद और स्वास्थ्य

तू सदियों से इन्हें माफ करने के बाद भी

“पीव” बन जाती है स्फटिक-जल की धारा

शिव की तरह इनके पापों का गरल तू पी जाती है

और एक चिन्मय गंध की धारा इनपर तू बहाती है

हे पतित पावनी नर्मदा, तू सभी के लिये पापमोचनी है।

स्नान करने आया गरीब, तुझे अर्पित करता है भूख

स्नान करने आया मजदूर, तुझे अर्पित करता है पसीना

स्नान करने आया सैनिक, तुझे अर्पित करता है शौर्य बल

स्नान करने आया चोर, तुझे अपिर्त करता है चोरी धन

स्नान करने आया बीमार, तुझे अपिर्त करता है बीमारी

स्नान करने आयी नारी, तुझे अपिर्त करती है अपना चरित्र

स्नान करने आया भूत-प्रेतबाधा पीड़ित, छोड़ जाता है इन्हे

पर माँ  तेरी दृष्टि में होते है, ये सभी माटी के बुत

तेरी गोद में माटी के बुत भी आते है, और उनकी मिट्टी भी

जैसे सबको पता है, जूते अन्दर लेकर आना मना है

पीव वैसे ही गोद में सभी, जूते बाहर उतार कर आते है

तैसे  ही उतरनों की वसीयत, माँ  के नाम करना मना है

पर माँ नर्मदा के बेटे, भूल जाते है यह तत्वज्ञान

उन्हें भोग-योग और मुक्ति का, नहीं रह पाता ध्यान

बस वे अपनी छोड़ी वसीयत के बदले माँ से मांगते है

अपने लिये धन,पदवी,कीर्ति और आजीवन सम्मान ।

आत्माराम यादव पीव