‘‘वेलेनटाइन-डे’’ : पश्चिम का बयार

संजय चाणक्य

‘‘बहुत धोखा देते हैं मोहब्बत में हुस्न वाले !
इन हसीनो पर भूल कर भी ऐतबार न कर !!’
यह कैसा र्दुभाग्य है,हम हिन्दवासियों के लिए! अपनों की जयन्ती और दिवस मनाने की न तो फुर्सत है न ही ललक! लेकिन पश्चिमी सभ्यता की कोख से उत्पन्न ‘‘वेलेनटाइन-डे’’मनाने के लिए हिन्द के बाशिन्दे काफी उत्साहित दिखे । हिन्द के युवाओं को तो शर्म से डूब मरने की बात है। हिन्दुस्तान के भविष्य कहे जाने वाले आज के नवयुवक कहां जा रहे है….! क्या यही देश के भविष्य है…? अगर सचमुच यही देश के भविष्य है तो यह हमारे पूर्वजों के लिए र्दुभाग्य और राष्ट्र के लिए अपशगुन है! भाड़ में जाए ऐसे देश के भविष्य जिन्हे आजादी तो खौरात में मिल गई किन्तु मानसिक रूप से आज भी गुलाम बने हुए है। आजादी खैरात में मिलने का मेरा मतलब यह है कि मां भारती को आजाद कराने एवं फिरंगियों को सात समुन्दर पार खदेरने के लिए इस देश के नेताओं की तरह हमने भी अपनों की वलि नही दी, हमने अपनों को नही खोया है। इस लिए हमे इस बात का तनिक भी एहसास नही है कि हमे आजादी कितनी मुश्किल से मिली है। इसका एहसास सुभाष चन्द बोस,चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह,खुद्दीराम बोस, अशफाक उल्लाह खान, तात्या टोपे आदि सरीखे अमर शहीद क्रान्तिकारियों के परिजनों को है। जिनकी डबडबाई आंखों मे आज भी अपने को खोने का गम छलक रहा है जिनके चेहरे पर आज भी अपनों के बलिदान का इतिहास चस्पा है खैर….!
‘‘ हर शाम उन शहीदो के नाम, जो नौछावर कर दिए अपने प्रान!
करता हू शीश झूकाकर उन्हे प्रणाम, दिलाया है जिसने हमे स्वतंत्र भारत में जीने का सम्मान’’
बात करते है 14 फरवरी के दिन का ! जिसे आज के युवा पीढी़ बडी उत्साह और उल्लास के साथ वेलेनटाइन डे के रूप में मनाते है। यह वेलेनटाइन डे पश्चिमी सभ्यता की कोख से उत्पन्न होकर भारतीय संस्कृति को तहस-नहस करके रख दिया है। कहते जीवन-जगत की समग्र गतिविधियों का आधार है प्यार ! परवरदिगार का दूसरा नाम है प्यार। जिन्दगी का सार है प्यार। इस लिए मै प्रेम पर कोई टिप्पणी नही कर सकता। लेकिन अफसोस ! क्या प्यार का सही मतलब, सही परिभाषा वेलेनटाइन ही समझते थे ! हीर-राझां,लैला-मजनू से सच्चा प्यार का मिसाल और क्या हो सकता है? आज तक हिन्द के प्रेम पुजारियों ने इन प्रेम दिवानों को कभी याद नही किया होगा। लेकिन एक विदेशी की प्रेम कहानी को हम न सिर्फ उल्लास के साथ मनाते है बल्कि उसे एक दिवस का मान भी दे डाला है। सुभाष चन्द बोस, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के जन्मदिवस और पूणतिथि को आज तक हिन्दुस्तानियों ने पूरे देश में इतना उल्लास के साथ नही मनाया होगा जितना 14 फरवरी को वेलेनटाइन को याद किया जाता है। मजे की बात यह है कि मीडिया भी खूब चटकारे लेकर इस दिन का गुणगान करती है। विडम्बना यह है कि वेलेनटाइन को याद करने वाला कोई और नही बल्कि इस देश के भविष्य कहे जाने वाले युवा है। जो कभी इन अमर शहीदों को अपना प्रेरणा और आस्था मानते थे। मै धन्यबाद देता हू! श्रीराम सेना, बजरंग दल और शिवसेना को। जिन्होनें वषो पूर्व इस पश्चिमी सभ्यता का विरोध किया था। यह विरोध तो पूरे हिन्द के बाशिन्दों को करना चाहिए था। लेकिन इन संगठनों का विरोध करने का तरीका बहुत गलत था। इस दिवस का तो हिन्दवासियों को बहिष्कार करना चाहिए, लेकिन दुःख इस बात का है कि इस देश के युवक-युवतियों ने ऐसा नही किया। जो काम इस राष्ट्र के युवाओं को करना चाहिए था वह काम श्रीराम सेना, बजरंग दल और शिवसेना ने किया। लेकिन इन संगठनो का विरोध करने का तरीका इतना गलत था कि न सिर्फ इनके विरोध का विरोध शुरू हो गया बल्कि इन संगठनो की जगहसाई भी खूब हुई। मै वेलेनटाइन डे का विरोध करने वाले संगठनों का पक्षधर हू। किन्तु इनके विरोध के तरीके से मै बिल्कुल इत्तेफाक नही रखता। बीते वर्ष 14 फरवरी को इन संगठनों ने न सिर्फ ‘‘डे’’ का विरोध किया बल्कि जाने-अनजाने पवित्र रिश्तों का भी खून कर दिया। भाई-बहनों के रिश्तों को भी इन संगठनों ने सूली पर टांग दिया। एक बात और भी है वेलेनटान डे का विरोध करने वाले अगर यह संगठन दोषी है तो उससे कम दोषी वो युगल जोडी भी नही है जो भारतीय संस्कृति का खुलेआम मजाक उडा रहे है, वह प्रेम-दिवाने भी कम दोषी नही थे जिन्होनें वेलेनटाइन डे सेलिव्रेट कर हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया। इन्हे कोई अधिकार नही है भारतीय संस्कृति की धज्जिया उडाने का । इन्हे भी अपने किए पर शर्मसार होने की जरूरत था! कहा जाता है कि जब भी किसी कार्य का विरोध होता है तो यह माना जाता है कि नई क्रान्ति की शुरूआत होने वाली है। आजादी के बाद पहली दफा पचिमी सभ्यता के खिलाफ आवाज बुलन्द हुआ था। विरोध की शुरूआत कुछ अच्छी तो कुछ बुरी हुई लेकिन शुरू तो हुई, लेकिन अफसोस पश्चिमी सभ्यता की कोख से उत्पन्न इस संस्कृति ने वेलेनटाइन डे का विरोध करने वालों को भी जादू का झपकी मारकर सुला दिया। जरूरत है हम सबको आगें बढ़कर पश्चिमी बयार को रोकने की। लेकिन गांधीगिरी तरीके से। याद रखिये….! हमे अपनों की याद कों ताजा करना है न कि विदेशियों को याद कर जीने का सहारा बनना है।
‘‘ तुलसी-सूरा-जायसी,कबिरा और रसखान ! 
अपने देश में ढूंढ़ रहे है अपनी ही पहचान !!’’ 
!! जय मां भारती – जय भारत माता !!

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