‘वंदे मातरम्’ : कहीं पर पूर्ण समर्थन के स्वर,कहीं कोर्ट में चुनौती का एलान
प्रदीप कुमार वर्मा
‘वंदे मातरम्’ जैसा कालजयी गीत कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशभक्ति और बलिदान की भावना जगाने का यह सबसे बड़ा माध्यम था। भारत माता को अंग्रेजी सरकार की गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए आजादी के मतवालों द्वारा इस गीत के जरिये भारत माता की वंदना की जाती थी लेकिन स्वाधीनता सेनानियों द्वारा गाया जाने वाला गीत ‘वंदे मातरम्’ आज एक बार फिर से चर्चा में है। केंद्र सरकार द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के गायन को अनिवार्य किए जाने के बाद देश में आज इसके अनिवार्य गायन औचित्य एवं उपयोगिता को लेकर एक और फिर से नई बहस छिढ़ गई है। एक तरह से यह भारत देश का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत की संकल्प की ओर बढ़ते भारत में आज भी “राष्ट्र गीत” के गायन को लेकर चर्चा चरम पर है। देश की संसद से लेकर सड़क तथा सरकार से लेकर सामाजिक मंचों पर यही विमर्श चल रहा है।
देश में एक पक्ष का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है। यह राष्ट्रभक्ति और एकता की भावना को जगाने वाला गीत है, जिसे हर नागरिक को सम्मानपूर्वक गाना चाहिए। ‘वंदे मातरम्’ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संजीवनी और देशप्रेम का जय घोष भी है जो नई पीढ़ी को देश की प्राचीन संस्कृति से आत्मसात कराएगा। वही,दूसरे पक्ष में शामिल कांग्रेस समेत देश विपक्षी दलों और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठनों का कहना है कि यह संवैधानिक रूप से दी गई धार्मिक स्वतंत्रता के अनुच्छेद 25 के खिलाफ है। इसलिए वंदे मातरम्’ गायन की अनिवार्यता और इसे जबरन थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला है। मुस्लिम संगठनों का मुख्य विरोध ‘वंदे मातरम्’ के गायन में भारत को देवी के रूप में प्रस्तुत करने में कथित तौर पर मूर्ती पूजा और आनंदमठ उपन्यास के अन्य संदर्भों से है,जिसे वे अपनी आस्था के खिलाफ मानते हैं।
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि वंदे मातरम में भारत भूमि की पूजा का भाव है जबकि इस्लाम में अल्लाह के सिवाय किसी अन्य की इबादत की अनुमति नहीं है। यही वजह है कि आज यह मुद्दा देशभक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच एक संवेदनशील बहस बना हुआ है। ‘वंदे मातरम्’ के गायन एवं उपयोग के इतिहास पर गौर करें तो पता चलता है कि पुराने जमाने में भी वंदे मातरम के कुछ छंदों को लेकर विवाद होता रहा है। यही वजह रही कि स्वाधीनता संग्राम में इस गीत की निर्णायक भागीदारी के बावजूद जब आज़ाद भारत मे राष्ट्रगान के चयन की बात आई, तो वन्दे मातरम् के स्थान पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे व गाये गये गीत “जन गण मन” को ही वरीयता दी गयी। तब भी इस चयन की वजह यही थी कि कुछ मुसलमानों को “वन्दे मातरम्” गाने पर आपत्ति थी क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है।
इसके अलावा उनका यह भी मानना था कि यह गीत जिस आनन्दमठ उपन्यास से लिया गया है, वह मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है। इन आपत्तियों के मद्देनजर सन 1937 में कांग्रेस ने इस विवाद पर गहरा चिन्तन किया। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद की मौजूदगी में गठित समिति ने पाया कि इस गीत के शुरूआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गये हैं लेकिन बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का जिक्र होने लगता है; इसलिये समिति ने यह निर्णय लिया गया कि इस गीत के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा। और इस तरह गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर के जन-गण-मन अधिनायक जय हे, को यथावत राष्ट्रगान ही रहने दिया गया और बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारम्भिक दो पदों का गीत वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृत हुआ।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी डा. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 में ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा जिसे स्वीकार कर लिया गया। करीब डेढ़ सौ साल पहले गाए जाने वाले बंकिम दा के गीत ‘वंदे मातरम्’ की आज के दौर में प्रासंगिकता पर गौर करें तो इस गीत के डेढ़ सौ साल पूरे होने पर केंद्र सरकार इसकी विशेष वर्षगांठ मना रही है। ऐसे में बीते साल 26 अक्टूबर को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘वंदे मातरम्’ गीत के इतिहास की देशवासियों को फिर से याद दिलाई। यही नहीं राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 7 नवंबर से भारत सरकार की ओर से अगले एक वर्ष तक अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन करने का निर्णय लिया। केंद्र सरकार ने अब 3 मिनट 10 सेकंड के पूर्ण संस्करण को अनिवार्य कर दिया है जिसे अब तक केवल पहले दो छंदों तक ही गाया जाता था। सरकार की मंशा के अनुसार ऐसे आयोजनों के माध्यम से देश भर में ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण गान होगा जिससे देश की युवा पीढ़ी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के विचार को आत्मसात कर पाएगी।
केंद्र सरकार द्वारा सरकार के आधिकारिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य करने के बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे मुस्लिम संगठनों ने इस निर्णय पर तीखा विरोध जताया है। मुस्लिम समाज द्वारा विरोध का मुख्य कारण इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 25 के खिलाफ बताते हुए “भारत माता” को देवी के रूप में पूजने को इस्लाम के एकेश्वरवाद के विपरीत माना जा रहा है। मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि ‘वंदे मातरम्’ के बाद के छंदों में मूर्तिपूजा जैसा चित्रण है जो इस्लाम में स्वीकार्य नहीं है। केंद्र सरकार के ‘वंदे मातरम्’ गायन की अनिवार्यता के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुस्लिम नेताओं ने इस आदेश को “मनमाना और एकतरफा” बताया है। मुस्लिम समाज के नुमाइंदों ने इस फैसले को वापस लेने तथा वापस नहीं लेने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है।
प्रदीप कुमार वर्मा