वेदालोचन (वेदों के अध्ययन) से रहित संस्कृत शिक्षा पूर्ण लाभ न देने वाली व हानिकारक

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स्वामी दयानन्द जी मार्च, 1873 में कलकत्ता में पधार कर वेदों का प्रचार कर रहे थे। वहां पं. हेमचन्द्र चक्रवर्ती जी उनके सम्पर्क में रहे। उनके अनुसार स्वामी जी ने उन दिनों व्याख्यानों में यह भी कहा था कि वेदालोचन-रहित संस्कृत शिक्षा से कुछ लाभ नहीं है क्योंकि इससे लोग पुराणों के कुकर्म-उपदेश से व्यभिचारी हो जाते हैं अथवा जो विचारशील हैं वह धर्म से पतित होकर हानिकारक हो जाते हैं। इससे लोगों की कुछ आंखे खुलीं। बगाल के लैफ्टीनैंट गवर्नर कैम्बल साहब ने भी उन दिनों यह प्रस्ताव किया था कि संस्कृत कालिज उठा दिया जावे। स्वामी जी ने इस बात को सुनकर कहा कि ऐसे संस्कृत कालिज के रहने के कुछ लाभ नहीं कि जिसमें वेद नहीं पढ़ाये जाते। इसलिए ‘मूलाजोड़’ में श्री प्रसन्नकुमार ठाकुर ने जिस संस्कृत कालिज की स्थापना की थी, वहां जाकर स्वामी जी ने यह प्रस्ताव किया कि इसमें वेदों की शिक्षा दी जाये और इसी सम्बन्ध में उन्होंने ‘नैशनल’ पत्रिका के सम्पादक मिस्टर नवगोपाल मित्र को एक लेख भी भेजा।

 

स्वामी जी ने ऐसा क्यों कहा? संस्कृत सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर प्रदत्त आदि भाषा है। ईश्वरीय भाषा होने से यह संसार की सर्वोत्कृष्ट भाषा भी है। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने इसी अपनी निज भाषा में चार ऋषियों को वेदों का ज्ञान दिया था। ईश्वर प्रदत्त इस ज्ञान व भाषा के प्रति ईश्वर द्वारा उत्पन्न मनुष्यों का प्रमुख कर्तव्य क्या बनता है? यह कि वह संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर वेदालोचन करें व करायें। वेदालोचन कर ही मनुष्य ठीक ठीक ईश्वर, जीव व प्रकृति को जान सकता है और वेदों में उपदिष्ट मनुष्य के कर्तव्यों को जानकर व उनका पालन कर ईश्वर का प्रिय बनने के साथ मनुष्य जीवन के मुख्य उद्देश्य यथा सभी प्रकार के दुःखों से मुक्ति जिसे मोक्ष कहा जाता है, प्राप्त हो सकता है। बिना वेदों के ज्ञान से ईश्वर, जीव व सृष्टि का ठीक ठीक ज्ञान नहीं होता। आज हम संसार में देख रहे हैं कि सामान्य जन ही नहीं हमारे विद्वान व वैज्ञानिक भी ईश्वर, जीव व सृष्टि का वैसा सुस्पष्ट व यथार्थ ज्ञान नहीं रखते जैसा कि वेदों व वैदिक साहित्य दर्शन व उपनिषद आदि ग्रन्थों में प्राप्त होता है। स्वामी दयानन्द ने कठोर पुरुषार्थ कर वेद के यथार्थ ज्ञान को प्राप्त किया और तर्क व युक्ति संगत उस आद्य ईश्वरीय ज्ञान का समस्त मनुष्य जाति के कल्यार्थ जन-जन में प्रचार व प्रसार किया। संसार में आज वैदिक मत ही एकमात्र मत है जिसकी सभी मान्यतायें परम प्रमाण वेद पर आधारित हैं और तर्क व युक्ति पर भी पूर्णतया कसी हुईं हैं। वेद की कोई मान्यता व सिद्धान्त आधुनिक विज्ञान के किसी सिद्धान्त के विपरीत व उनकी विरोधी नहीं है। अतः वेद ही सत्य मत व मनुष्यों का सत्य धर्म सिद्ध होता है। इसी को सबको अपना कर आचरण में लाना चाहिये। जब संसार में केवल एक ही मत होगा तभी विश्व में सुख व शान्ति की स्थापना की आशा की जा सकती है। मत-मतान्तर व उनकी परस्पर कुछ भिन्न भिन्न मान्यतायें, जो मानवता की पोषक नहीं है, एवं इनमें येन केन प्रकारेण अपनी संख्या वृद्धि की इच्छा ही संसार में दुःख व अशान्ति का प्रमुख कारण सिद्ध होती है।

मनुष्य उसे कहते हैं कि जो मननशील हो अर्थात् सत्य व असत्य सहित अपने कर्तव्य व अकर्तव्य को जानता हो तथा उसी क अनुरूप आचरण भी करता हो। ईश्वर ने यह सृष्टि जीवात्माओं के कर्म-फल भोग के लिए बनाई है। मनुष्य के शरीर व जीवात्मा में जीवात्मा ही मुख्य है। शरीर जीवात्मा के लिए है शरीर के लिए शरीर नहीं है। अतः आत्मा ही मुख्य है। आत्मा ईश्वर का ऋणी है जिसने उसके लिए सृष्टि बनाकर उसे मानव शरीर दिया और कर्म करने की स्वतन्त्रता देकर उसे वेद ज्ञान की प्राप्ति करने का अवसर भी दिया। वेद ज्ञान की प्राप्ति में ऋषि दयानन्द ने जो कठोर तप किया वह भी हमारे सम्मुख है। आज हमें वेद की सरलता से प्राप्ति हो रही है। हमारे पास एक नहीं वेद संहिताओं सहित अनेक वैदिक विद्वानों के हिन्दी व अंग्रेजी भाषा के भाष्य है। अन्य वेद विषयक बहुत सा साहित्य भी है। इतना होने पर भी यदि हम अविद्या को ही चुनते हैं, वेदों के अध्ययन में प्रयत्न नहीं करते तो हमें मूर्ख व अज्ञानी वा अनाड़ी ही कहा जायेगा। हमारे द्वारा भौतिक विद्याओं का कुछ ज्ञान कर लेने पर हम पूर्ण बुद्धिमान नहीं कहे जा सकते। बिना वेदालोचन के मनुष्य ईश्वर, जीवात्मा और इस संसार को इसके यथार्थ स्वरूप में जानकर अपने यथार्थ कर्तव्यों को जानकर उनका निर्वाह नहीं कर सकता। अतः वेदालोचन मनुष्य का कर्तव्य व परम धर्म है। ऋषि दयानन्द के बनाये नियम में भी कहा गया है कि ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना (सब श्रेष्ठ मनुष्यों अर्थात्) आर्यो का परम धर्म है।’ यह विवेकपूर्ण कथन है। इसको शुद्ध बुद्धि व पवित्र विचारों वाला व्यक्ति ही जान व समझ सकता है। अतः मनुष्य योनि में जन्म लेकर वेदालोचन करना सब मनुष्यों का सत्य धर्म सिद्ध होता है।

 

विचारणीय है कि माता-पिता हमें जन्म देते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम उनका आदर व सत्कार करें। उनके प्रति सदैव कृतज्ञ बने रहे ओर उनकी जीवन भर मन-वचन-कर्म से सेवा करें। राम का उदाहरण हमारे सामने है। वह वैदिक मर्यादाओं के पालक व पोषक थे। यदि कोई माता-पिता सं संबंधित वेदाज्ञा के विपरीत कोई कार्य करता है तो वह अज्ञ, मूर्ख व कृतघ्न कहलाता है। यह भी जानने योग्य है कि ईश्वर इस सृष्टि सहित हमारे माता-पिता व उनके भी पूर्व उनके भी माता-पिता, गुरुजनों व परिवार जनों का जन्मदाता व पालन कत्र्ता रहा है। वह वेद ज्ञान व उसकी भाषा संस्कृत का दाता है। अतः उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना हमारा मानव मात्र का कर्तव्य है। ईश्वर का शरीर न होने के कारण उसे माता-पिता व गुरुजनों आदि की हमारी सेवा के समान सेवा की आवश्यकता नहीं है। उसके स्थान पर हम वृद्धों व दीन-दुखियों की सेवा कर शुभ कर्म अर्जित कर अभ्युदय व निःश्रेयस प्राप्ति में अपनी कर्म-पूंजी को बढ़ा सकते है। अतः ईश्वर, उसका ज्ञान व भाषा संस्कृत के प्रति सभी को कृतज्ञ भाव से उसका सेवन व अध्ययन करना चाहिये और वेदाज्ञा का पालन करना ही उनके वर्तमान एवं भविष्य के कल्याण व सुख का कारण हो सकता है।

 

संस्कृत भाषा का अध्ययन, उसके द्वारा वेदालोचन और वेद विहित योगाभ्यास को करके ही बालक मूलशंकर ऋषि दयानन्द बने। आज भी ऋषि दयानन्द का यशोगान चहुं दिशाओं में हो रहा है। यदि वह ऐसा न करते तो अपने टंकारा गांव के अन्य लोगों की भांति आज उन्हें कोई जानता भी नहीं। अतः अपना परम कर्तव्य मानकर संस्कृत भाषा का अध्ययन करते हुए वेदों का स्वाध्याय वा वेदालोचन मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है। महर्षि दयानन्द के बाद उनके संस्कृताध्ययन व वेदालोचन के उद्देश्य से ही उनके अनुयायी स्वामी श्रद्धानन्द ने गुरुकुल कागड़ी खोला था। उनसे भी पूर्व पं. गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने लाहौर में अष्टाध्यायी का अध्ययम कराने के लिए पाठशाला खोली थी जहां अधिक आयु के लोग पढ़ते थे। इनके बाद से अनेक संन्यासी व महात्माओं ने देश में अनेक गुरुकुल खोले हैं जो संस्कृत का अध्ययन कराते हैं। अधिकांश गुरुकुल सरकारी पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाते हैं जिससे गुरुकुल के ब्रह्मचारी स्नातक बनकर, जो वेदालोचन से अपूर्ण रहते हैं, गुरुकुल छोड़कर सरकार व अन्य प्रकार धनोपार्जन के कार्यों में चले जाते हैं। इससे हमारे गुरुकुलों का प्रयास व आर्यों द्वारा उन्हें उपलब्ध कराये गये साधन निरर्थक सिद्ध होते हैं। गुरुकुल के ऐसे ब्रह्मचारियों में बहुत कम ही भविष्य में आर्यसमाज व वैदिक धर्म का प्रचार का कार्य कर पाते हैं। ऐसे भी गुरुकुल आर्यसमाज में हैं जहां सरकारी परीक्षायें नहीं दिलाई जाती। अध्ययन पूर्ण करके उन ब्रह्मचारियों व विद्वानों के सामने प्रायः वैदिक धर्म व आर्यसमाज की सेवा ही एकमात्र विकल्प रहता है। ऐसे ही विद्वानों से आज का आर्यसमाज चल रहा है। हम इन विद्वानों को प्रणाम करते हैं। ऐसे अनेक गुरुकुल हैं जो यत्र तत्र चल रहे हैं। हम इस अवसर पर स्वामी सत्यपति जी द्वारा स्थापित दर्शन-योग महाविद्यालय का उल्लेख भी करना चाहते हैं। स्वामी जी ने इस विद्यालय में अनेक ब्रह्मचारियों को व्याकरण व दर्शन पढ़ाये और उन्हें किसी प्रकार की सरकारी परीक्षा नहीं दिलाई। इसका परिणाम है कि आज उनके अनेक शिष्य आर्यसमाज में छाये हुए हैं। आचार्य ज्ञानेश्वर आर्य, स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, आचार्य सत्यजित् आर्य जी, स्वामी ब्रह्मविदानन्द जी, आचार्य आशीष दर्शनाचार्य, स्वामी आशुतोष जी आदि स्वामी सत्यपति जी के प्रति निष्ठा व कृतज्ञता रखते हुए आर्यसमाज को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रत्येक आर्यसमाजी को इन महात्माओं पर गर्व है। हमने पता किया तो ज्ञात हुआ कि लगभग 55 लोगों ने दर्शन-योग महाविद्यालय से पांच दर्शनों का अध्ययन किया है और इस समय पूर्ण सामाजिक जीवन व्यतीत करते हुए वेद प्रचार में जुटे हुए हैं। ऐसे भी लोग हैं जिन्होंनें एक व अधिक दर्शन पढ़कर अन्यत्र जाकर भी अध्ययन किया है और प्रचार कार्य कर रहे हैं। इनकी संख्या भी एक सौ से अधिक है। पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी ने रामलाल कपूर ट्रस्ट, रेवली (अमृतसर में स्थापित) के अन्तर्गत संचालित गुरुकुल से पं. युधिष्ठिर मीमांसक, आचार्य भद्र्रसेन, अजमेर, आचार्या प्रज्ञादेवी, आचार्य सुमेधा देवी, आचार्य विजयपाल जी, पं. सुद्युम्नाचार्य आदि अनेक विद्वान दिये हैं। प्रख्यात विदुषी आचार्या सूर्यादेवी जी आचार्या प्रज्ञादेवी जी की शिष्या हैं। यदि ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी डा. प्रज्ञादेवी जी का निर्माण न करते तो आर्यसमाज को विदुषी आचार्या डा. सूर्यादेवी जी न मिलती और न उनका व उनकी भगिनी आचार्या धारणा जी का शिवगंज राजस्थान में गुरुकुल ही होता। स्वामी ओमानन्द सरस्वती, गुरुकुल झज्जर का भी आर्यसमाज की उन्नति में विशेष योगदान है। ऐतिहासिक गुरुकुलों में गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर और गुरुकुल वृन्दावन का भी विशेष महत्व है परन्तु यह दोनों आजकल वह तेजस्विता बनाये नहीं रख पाये जो इसे अपने आरम्भिक दिनों में प्राप्त थी।

 

ऋषि दयानन्द के विचार, कथन व मान्यता कि बिना वेदालोचन के संस्कृत विद्या का अध्ययन अपूर्ण व अनुपयोगी है, हमें पूर्णतः उचित लगता है। उन्होने वेदालोचन से रहित संस्कृत के विद्वानों का पुराणों का अध्ययन करना और उससे पतन की जो बात कही है वह भी उनके समय में उचित थी, आज भी न्यूनाधिक उचित हो सकती हैं। जब तक पुराणों में वेद विरोधी मान्यतायें व सिद्धान्त विद्यमान रहेंगे उससे हानि होना सम्भव है। लेख की समाप्ति पर हम यह निविेदन करेंगे कि सभी गुरुकुलों के संचालकों को स्वामी दयानन्द जी के उपर्युक्त वचनों पर ध्यान देना चाहिये और उसके अनुरूप ही अध्ययन कराना चाहिये। ओ३म् शम्।

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