आज का समय तीव्र परिवर्तन का समय है। तकनीक, संचार और मनोरंजन के साधनों ने दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। लेकिन इस विकास के साथ एक ऐसी प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ी है, जो गंभीर चिंता का विषय है—समाज में बढ़ती हिंसा और उसका प्रतिबिंब फिल्मों में दिखाई देना। आज बड़े पर्दे पर अव्वल दर्जे की हिंसा को जिस प्रकार दिखाया जा रहा है, वह केवल कहानी का हिस्सा नहीं रह गया, बल्कि मनोरंजन का प्रमुख साधन बन चुका है। आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रकार की फिल्में न केवल सफल हो रही हैं, बल्कि रिकॉर्ड तोड़ कमाई भी कर रही हैं।
सामान्यतः कहा जाता है कि फिल्में समाज का आईना होती हैं। जो समाज में घटित होता है, वही किसी न किसी रूप में सिनेमा के माध्यम से सामने आता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सिनेमा केवल समाज को प्रतिबिंबित करता है, या फिर समाज को दिशा भी देता है? जब फिल्मों में हिंसा को शैली, शक्ति और प्रभाव का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, तो वह केवल दृश्य नहीं रह जाता, बल्कि विचार बन जाता है। दर्शक, विशेषकर युवा वर्ग, उसे आदर्श या प्रेरणा के रूप में ग्रहण करने लगता है।
आज के बच्चे पहले ही डिजिटल दुनिया में खोए हुए हैं। वीडियो गेम्स, वेब सीरीज और सोशल मीडिया के माध्यम से वे आभासी हिंसा के निरंतर संपर्क में हैं। जब इसी प्रवृत्ति को फिल्मों के माध्यम से भी बढ़ावा मिलता है, तो बालमन पर इसका प्रभाव और गहरा हो जाता है। बाल मन कोमल और ग्रहणशील होता है। वह जो देखता है, उसे सच मानने और अपनाने की प्रवृत्ति रखता है। यदि उसे बार-बार यह दिखाया जाए कि समस्याओं का समाधान केवल शक्ति प्रदर्शन, बदले की भावना और आक्रामकता से संभव है, तो उसके व्यक्तित्व में भी वही प्रवृत्ति विकसित होने लगती है।
परिवार और समाज की छवि भी फिल्मों के माध्यम से प्रभावित होती है। जब परिवारों को षड्यंत्र, लालच और संघर्ष के केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो सामाजिक मूल्यों की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। प्रेम, संवाद और सहिष्णुता के स्थान पर क्रोध, प्रतिशोध और हिंसा को महत्व मिलने लगता है। धीरे-धीरे यह धारणा बनती जाती है कि “जो शक्तिशाली है वही सही है।” यह मानसिकता किसी भी सभ्य समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
फिल्म निर्माताओं की सामाजिक जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मनोरंजन के साथ-साथ नैतिक संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है। सिनेमा एक शक्तिशाली माध्यम है, जो जनमानस को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इसलिए यह जरूरी है कि विषय चयन और प्रस्तुति में संवेदनशीलता बरती जाए।
समाज के रूप में हमें यह विचार करना होगा कि हम किस प्रकार का मनोरंजन स्वीकार कर रहे हैं। यदि हम हिंसा को ही सफलता का मापदंड बना देंगे, तो आने वाली पीढ़ी उसी को सामान्य मानने लगेगी। आवश्यकता इस बात की है कि सिनेमा मनोरंजन के साथ-साथ संवेदनशीलता, करुणा और मानवीय मूल्यों को भी बढ़ावा दे।