बाड़मेर जिले के गांवों में पानी का संकट, पानी व्यापार तेजी पर

दिलीप बीदावत

इन दिनों पैट्रोल डीजल की कीमतों में पिछले चार सालों से लगातार हो रही वृद्धि से मध्यम वर्ग की जेबों पर पड़ने वाले भार को लेकर हर स्तर पर हायतौबा मची हुई है, वहीं बाड़मेर जिले में पीने के पानी को लेकर हर साल आने वाले संकट की कानो-कान खबर व चर्चा नहीं है। ग्रामीण हल्कों में पीने के पानी के संकट को लेकर मीडिया भी मौन है। नेता एक चुनाव से सुलटते हैं, दूसरे की तैयारी में लग जाते हैं। सरकारी मशीनरी नेताओं और सत्तारूढ़ सरकार की उपलब्धियां गिनाने और सेवा चाकरी में लगी हुई है। ग्रामीण जन पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। बड़ी – बड़ी परियोजनाओं और कार्यक्रमों पर पानी की तरह पैसा बहाए जाने के बावजूद थार के रेगिस्तान में यह संकट दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है।
इसके अनेकों कारण रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का असंतुलन, पानी वितरण और प्रबंधन संसाधन का व्यपारीकरण और सरकार की पानी को लेकर चलने वाली छोटी-मोटी परियोजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार, पादर्षिता और समुदाय की भागीदारी नहीं होने जैसे कारण थार के ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती हुई जन संख्या के अनुसार पानी की आपूर्ति नहीं हो पाती है। मसलन गर्मी के आते-आते पाताल के पानी के स्रोत कुओं, बेरियों का पैंदा सूखने लगता है, नदियों , तालाबों के तल में सूखी पपड़ाई मिट्टी दिखने लगती है। व्यक्तिगत व सार्वजनिक स्रोतों का पानी सूखने लगता है। सरकार की पाइप लाइनें सूखने लगती है और होदियों में पानी की सप्लाई रूक जाती है। हर साल गर्मी के मौसम में पैदा होने वाली यह स्थिति इस बार भी बाड़मेर जिले के गांवों में उत्पन्न है। कुछ गांवों का दौरा करने पर जो स्थिति देखी गई, वह बहुत भयावह स्थिति बताती है।
बाड़मेर जिले के बालोतरा उपखंड की पाटोदी पंचायत समिति के ग्राम पंचायत साजियली पदमसिंह के गांव साजियली पदमसिंह, साजियाली मूलराजक्यार, कैरलीनाडी 2011 की जनगणना के अनुसार 600 आबाद घरों में 3000 के लगभग इन्सान रहते हैं। खेती और पशुपालन के अतिरिक्त लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन मजदूरी है। नमक उत्पादन वाले क्षेत्र के समीप और वर्तमान रिफाइनरी लगाने की योजना के पास बसे इस गांव का भूजल अत्यंत लवणीय व फ्लोराइड युक्त है। नाडियों का पानी भी कुछ समय बाद खारा हो जाता है। इन गांवों में पानी का कोई स्रोत नहीं है। पूर्व में पाइप लाइन द्वारा बालोतरा बिठूजा से पानी की सप्लाई होती थी। वर्तमान में लंबे समय से पानी की सप्लाई बंद है। यहां के लोगों ने अपनी ढाणियों में बरसात का जलसंग्रहण करने के लिए टांके (अंडर ग्राउंड टेंक) बना रखे हैं जिससे सात-आठ माह परिवार के इन्सानों कोे पानी की पूर्ति होती है, लेकिन गर्मी के आते-आते उनमें भी पानी रित गया है। मानव व पशुधन दोनों के लिए पानी का संकट है। यहां के लोग टेंकर से पानी मोल खरीदते हैं। 20-22 किलोमीटर दूर कोडुका, भाखसर से ट्रेक्टर टेंकर वाले 4000 लीटर पानी के 1300 से 1500 रू. लेते हैं। भाखरसर में कुछ प्राइवेट ट्यूववैल से टेंकर भरते हैं। गर्मी में जैसे-जैसे भूजल स्तर गिरता है, टेंकरों की दर बढ़जाती है। गांव में दो तीन नदिया हैं, जो पूरी तरह से सूख चुकी है। महिलाएं नदिया में थौड़ा गहरा गड्डा खोदती है जिनमें रिसाव होकर कुछ पानी इकट्ठा होता है, उससे मटका भर कर नाहने, कपड़े धोने और पशुओं को पिलाने के काम लेती है। इन्सानों के पीने के लिए टेंकर से पानी खरीदते हैं।
केरली नाडी गांव में एक पुरानी नदी है। पहले इस नदी में बरसात का पानी 6 से 7 माह तक रूकता था लेकिन महात्मा गांधी नरेगा में इस नदी की खुदाई अधिक गहरे तक कर दिए जाने के कारण अब पानी अधिक दिन नहीं ठहरता है। गांव के शकूरखा, आदम खां का कहना है कि पुराने समय में नदी की खुदाई कितनी करनी है, यह गांव के लोग तय करते थे तथा नदी व तालाब के पैंदे का पूरा ध्यान रखते थे। अब सरकार के इंजीनियर तय करते हैं जिनको यह ज्ञान नहीं है कि नदी की खुदाई कितनी करनी चाहिए। थार मरूस्थल के अधिकांश नदियों, तालाबों की यहीं कहानी है। जो तालाब समुदाय की देखरेख से दूर हो गए, वह केवल मिट्टी खोदने का जरिया बन गए हैं। यही स्थिति केरली नाडी की है जिससे कभी पूरे गांव की प्यास बुझती थी, आज नाडी स्वयं पानी को तरसती है। गांव में एक पुरानी बेरी है। नदी  का पानी रिस कर बेरी में जमा होता था। नदी  में पानी समाप्त हो जाने के बाद बेरी के पानी का उपयोग करते थे। नदी  की पानी को रोक कर रखने की क्षमता कम हो जाने के कारण बेरी में पानी कम आता है। फिर भी इस गर्मी में बेरी का उपयोग पशुओं को पानी पिलाने के लिए काम में लेते हैं। इस गांव में कुछ हैंड पंप है, जिनका पानी इन्सानों के उपयोग योग्य तो नहीं है, लेकिन पशुओं को पिलाने व घरेलू उपयोग में काम में लेते हैं। एक पुरानी जर्रजर होदी के अवशेष बचे हुए हैं जिसमें कभी पाइप लाइन से पानी सप्लाई होती थी। आज यह इतिहास बन चुकी है।
इस वर्ष बाड़मेर जिले के अधिकांश गांव अकाल प्रभावित हैं। गर्मी के मौसम में पेयजल संकट वाले गांवों में सरकार द्वारा टेंकर से पानी वितरण किया जाता है। लेकिन पारदर्शिता के अभाव में गांव केे लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं है कि सरकार ने किस गांव में कितने व कौन-कौन से सार्वजनिक स्रोत तय किए हैं जिनमें पानी वितरण किया जाएगा और कितनी अवधि में टेंकर आयेगा। सरकार का सहयाता विभाग व जलदाय विभाग प्रति वर्ष टेंडर निकाल कर टेंकर से पानी सप्लायरों को वितरण का ठेका देते हैं। लेकिन गांव के लोगों को जानकारी नहीं होने के कारण कुछ प्रभावशाली लोग अपने निजी स्रोतों में पानी डलवा लेते हैं। टेंकर वाले भी निर्धारित अवधि व मात्रा जितना पानी नहीं डालते। यहां तक कि इसकी सूचना भी सार्वजनिक नहीं होती है। इस साल भी टेंकर से पानी सप्लाई का टेंडर हुआ है, लेकिन बंदर बांट व्यवस्था में इसका का लाभ जरूरमंद लोगों तक कम और प्रभावशाली लोगों व टेंकर सप्लायरों को ही अधिक होता है। ग्राम पंचायत रिछोली के गांव करणीसर भीलों की बस्ती में पानी का भयंकर संकट है। रेत के धोरे में पर बसे इस गांव में टेंकर से पानी वितरण का प्वाइंट तय है, लेकिन यहां पर पिछले दा सालों से एक भी टेंकर पानी नहीं पहुंचा है। गत वर्ष भी लोगों ने प्रशासन को अवगत कराया था, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इस साल भी अभी तक एक भी टेंकर गांव में नहीं पहुंचा है। करणीसर में भी पानी की होदी है जिसमें पाइप लाइन से पानी वितरण की योजना थी। पिछले 10 सालों से इस होदी में पानी नहीं आया है। जलदाय विभाग का कहना है कि इंदिरा गाधी नहर का पानी पाइप लाइन से पहुंचाने की योजना पर काम चल रहा है, उसके पूरा होने पर ही संकट का समाधान होगा। तब तक लोगों को संकट झेलना ही पड़ेगा।
वैसे थार मरूस्थल के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग पीने के पानी के लिए पूरी तरह से सरकार के भरोसे नहीं हैं। सरकार के भरोसेे रहते तोे अब तक डेजर्ट विरान हो जाता। विरासत में मिले सदियों से जीवन (पानी) पानी को सहेजने और उपयोग करने के संस्कार के अवशेष भौतिक स्वरूप में तथा लोगों के दिलों दिमाग बचे हुए हैं। कुदरती व लोगों द्वारा बनाए गए संसाधनों को छोड़कर अन्य संसाधन सहायक तो हैं, लेकिन टिकाऊ नहीं है। बाड़मेर जैसलमेर तथा कुछ हद बीकानेर के सघन मरूस्थलीय क्षेत्रों में पारंपरिक जलस्रोतों को बनाए रखने पर सरकार व समाज को गंभीरता से सोचना चाहिए। यह पर्यावरण, जलवायु और जन-जीवन के लिए जरूरी है। वैकल्पिक व्यवस्थाएं उपचार तो है, ईलाज नहीं है।

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