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कमजोर मानसून और भारतीय अर्थव्यवस्था: बारिश की कमी का बड़ा आर्थिक असर


राम शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

भारत की अर्थव्यवस्था के आधुनिक स्वरूप में भले ही सेवा क्षेत्र, उद्योग, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विनिर्माण की भूमिका लगातार बढ़ रही हो, लेकिन मानसून का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। वर्ष 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून इसका ताजा उदाहरण है। जून से सितंबर तक चलने वाला मानसून इस वर्ष सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रहा और उपलब्ध आधिकारिक एवं मौसम संबंधी आकलनों के अनुसार यह एक दशक से अधिक समय का सबसे कमजोर मानसून रहा। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने वर्ष शुरू होने से पहले ही सामान्य से कम वर्षा की आशंका जताई थी और बाद के महीनों में बारिश की कमी तथा उसके असमान वितरण ने कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया।
मानसून को अक्सर भारत की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा कहा जाता है। इसका कारण केवल यह नहीं है कि देश की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, बल्कि यह भी है कि बारिश का असर कृषि से निकलकर ग्रामीण आय, उपभोग, खाद्य कीमतों, उद्योग, बिजली, जल संसाधन और अंततः आर्थिक विकास तक पहुंचता है। इसलिए कमजोर मानसून को केवल मौसम की खबर मानना आर्थिक वास्तविकता को छोटा करके देखने जैसा होगा।
वर्ष 2026 में एक दिलचस्प विरोधाभास भी सामने आया है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही। स्थिर कीमतों पर वास्तविक जीडीपी 81.36 लाख करोड़ रुपये आंकी गई, जबकि एक वर्ष पहले इसी तिमाही में यह 75.46 लाख करोड़ रुपये थी।  यानी अर्थव्यवस्था की समग्र तस्वीर मजबूत दिखाई देती है। लेकिन कमजोर मानसून इस सवाल को सामने लाता है कि क्या तेज जीडीपी वृद्धि का लाभ ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक उसी गति से पहुंच रहा है?
भारत में मानसून का सबसे पहला और सीधा असर खेती पर पड़ता है। खरीफ की फसलें मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर रहती हैं। धान, सोयाबीन, कपास, मक्का, मूंगफली और कई दालों जैसी फसलों के लिए वर्षा का समय और उसका वितरण दोनों महत्वपूर्ण हैं। केवल पूरे मौसम में हुई कुल बारिश पर्याप्त नहीं होती। यदि किसी फसल को जिस समय पानी चाहिए, उस समय बारिश न हो और बाद में अचानक बहुत अधिक बारिश हो जाए तो कुल वर्षा सामान्य के करीब होने के बावजूद उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
2026 में यही असमानता महत्वपूर्ण रही। सितंबर की शुरुआत में ही बारिश सामान्य से कम रहने को लेकर फसलों पर चिंता जताई जा रही थी। कमजोर वर्षा से कपास, सोयाबीन, मक्का और धान जैसी फसलों के उत्पादन पर जोखिम बढ़ा था। सितंबर की बारिश रबी फसलों के लिए मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होती है। गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलों की बुवाई के लिए पर्याप्त मिट्टी की नमी जरूरी है।
कम बारिश का दूसरा बड़ा प्रभाव किसान की आय पर पड़ता है। यदि उत्पादन घटता है तो किसान की बाजार में बिक्री कम होती है। इसके साथ ही वह अगली फसल के लिए बीज, खाद, कीटनाशक और कृषि उपकरणों पर खर्च भी कम कर सकता है। सितंबर में कृषि-इनपुट कंपनियों ने भी कमजोर मानसून के कारण किसानों की ओर से कीटनाशकों, उर्वरकों और बीजों की मांग में कमी की बात कही। इसका अर्थ यह है कि मानसून की कमी का प्रभाव खेत से निकलकर कृषि से जुड़े उद्योगों तक पहुंच चुका है।
ग्रामीण मांग भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। किसान की आमदनी बढ़ती है तो वह मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर, मोबाइल, कपड़े, निर्माण सामग्री, कृषि उपकरण और रोजमर्रा की वस्तुओं पर खर्च करता है। इस तरह कृषि आय का असर कई दूसरे क्षेत्रों में दिखाई देता है। इसके विपरीत जब फसल और आय को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है तो ग्रामीण परिवार गैर-जरूरी खर्च टालने लगते हैं।
सितंबर 2026 के वाहन बिक्री आंकड़ों ने ग्रामीण मांग पर इस दबाव का संकेत दिया। रिपोर्टों के अनुसार सितंबर में ट्रैक्टर बिक्री में महिंद्रा एंड महिंद्रा की बिक्री 21 प्रतिशत और एस्कॉर्ट्स कुबोटा की 16.7 प्रतिशत घटी। बजाज ऑटो की दोपहिया बिक्री भी 12 प्रतिशत कम रही। इसके विपरीत शहरी बाजार में यात्री वाहनों की मांग अपेक्षाकृत मजबूत रही।
यहीं से भारतीय अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है—शहरी अर्थव्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति हमेशा एक जैसी नहीं होती। यदि शहरों में सेवा क्षेत्र, वेतन, निवेश और उपभोक्ता मांग अर्थव्यवस्था को सहारा देते रहें तो जीडीपी की वृद्धि मजबूत रह सकती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में आय का दबाव अलग समस्या पैदा कर सकता है।
कमजोर मानसून का एक और बड़ा असर खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है। उत्पादन कम हुआ तो दाल, तिलहन, सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। दालों के मामले में भारत पहले से ही घरेलू उत्पादन और आयात दोनों पर निर्भर करता है। कमजोर मानसून के बाद सरकार को दालों की उपलब्धता और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए आयात नीति में बदलाव पर विचार करना पड़ा है।
यह स्थिति भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी चुनौती पैदा कर सकती है। यदि आर्थिक वृद्धि मजबूत हो लेकिन खाद्य महंगाई बढ़ने लगे तो मौद्रिक नीति के सामने संतुलन कठिन हो जाता है। ब्याज दरों में कटौती से आर्थिक गतिविधि को समर्थन मिल सकता है, लेकिन यदि महंगाई का दबाव बढ़ रहा हो तो केंद्रीय बैंक के लिए अधिक सावधानी आवश्यक हो सकती है। सितंबर के अंत में उपलब्ध आर्थिक विश्लेषणों में भी मजबूत वृद्धि के साथ व्यापक होते महंगाई दबाव को मौद्रिक नीति के लिए चुनौती बताया गया।
कमजोर मानसून का असर केवल खेती और महंगाई तक सीमित नहीं है। पानी की उपलब्धता, सिंचाई, जलाशयों का स्तर और बिजली उत्पादन भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का एक नया विरोधाभास सामने आ रहा है। पूरे मौसम में वर्षा कम हो सकती है, लेकिन कुछ दिनों में अत्यधिक बारिश से बाढ़ और जलभराव की स्थिति बन सकती है। सितंबर के अंतिम सप्ताह में उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ ने इस विरोधाभास को सामने रखा।
इसलिए भारत के लिए समस्या केवल ‘कम बारिश’ नहीं है, बल्कि ‘अनिश्चित और असमान बारिश’ भी है। कृषि नीति को अब इसी बदलती वास्तविकता के अनुरूप तैयार करना होगा। सिंचाई के विस्तार के साथ जल संरक्षण, माइक्रो-इरिगेशन, वर्षा जल संचयन, सूखा-रोधी फसलें, बेहतर मौसम पूर्वानुमान और किसानों तक स्थानीय स्तर पर मौसम संबंधी सलाह पहुंचाना आवश्यक होगा।
इस दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी होना चाहिए कि कृषि को केवल उत्पादन के नजरिए से न देखा जाए। किसान की आय, जोखिम और बाजार को भी कृषि नीति का केंद्र बनाया जाए। फसल बीमा को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने, किसानों को समय पर भुगतान दिलाने तथा मौसम आधारित कृषि सलाह को गांव के स्तर तक पहुंचाने की जरूरत है।
सरकार के सामने तत्काल चुनौती खाद्य कीमतों को नियंत्रित रखने और किसानों की आय को सहारा देने के बीच संतुलन बनाने की है। यदि किसी फसल का उत्पादन घटता है तो केवल आयात करके कीमतें नियंत्रित करना अल्पकाल में उपभोक्ता के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन इससे किसान को बेहतर कीमत मिलने की संभावना प्रभावित हो सकती है। इसलिए नीति का लक्ष्य किसान और उपभोक्ता दोनों के हितों में संतुलन होना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 7.8 प्रतिशत जैसी मजबूत जीडीपी वृद्धि भारत की अर्थव्यवस्था की क्षमता को दिखाती है, लेकिन मानसून हमें यह याद दिलाता है कि भारत की विकास यात्रा अभी भी प्राकृतिक संसाधनों और ग्रामीण मांग से गहराई से जुड़ी हुई है।
आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अनिश्चितता बढ़ती है या बारिश का वितरण अधिक असमान होता है तो भारत को विकास की ऐसी रणनीति बनानी होगी जो केवल अच्छी बारिश वाले वर्षों में नहीं, बल्कि कमजोर मानसून वाले वर्षों में भी अर्थव्यवस्था को स्थिर रख सके। इसके लिए कृषि में उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार, खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, सिंचाई और ग्रामीण बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना होगा।
वर्ष 2026 का कमजोर मानसून इसलिए केवल एक मौसम संबंधी घटना नहीं है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है—क्या हमारी विकास दर इतनी मजबूत हो चुकी है कि वह कमजोर मानसून के झटके को सह सके, या फिर ग्रामीण भारत अभी भी बारिश के भरोसे ही अपनी आर्थिक गति तय करता है? इस प्रश्न का उत्तर आने वाले महीनों के कृषि उत्पादन, ग्रामीण आय, खाद्य कीमतों और उपभोग के आंकड़ों में दिखाई देगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि भविष्य की भारतीय अर्थव्यवस्था में मानसून की भूमिका कम नहीं बल्कि बदलते जलवायु जोखिमों के कारण और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।