लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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देश की सियासत इन दिनों दिग्भ्रमित है और उससे भी ज्यादा भ्रमित है जनता जो एक ओर तो केंद्र में मंत्रियों के भ्रष्टाचार को लेकर आंदोलन करती है वहीं कर्नाटक में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत देकर ७ साल बाद सत्ता का हस्तानांतरण करती है। कर्नाटक के चुनाव परिणाम इस मायने में भी चौंकाते हैं कि जिस भ्रष्टाचार के मुद्दे की वजह से येदुरप्पा को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने पर मजबूर किया गया था और भारतीय जनता पार्टी ने राज्य की जनता को यह सन्देश देने की कोशिश की थी कि भ्रष्टाचार एवं भ्रष्ट को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता, उसे तो जनता ने नकार दिया किन्तु विधानसभा चुनाव से पूर्व उजागर हुए केन्द्रीय रेल मंत्री के भांजे सिंगला के कांड को उन्होंने कोई तवज्जो नहीं दी। यहां तक कि सीबीआई द्वारा उच्चतम न्यायालय को दिए अपने हलफनामे में कानून मंत्री अश्विनी कुमार और प्रधानमंत्री कार्यालय के उच्च अधिकारीयों द्वारा कोयला घोटाले की क्लोजर रिपोर्ट बदलवाने की स्वीकरोक्ति ने भी कर्नाटक में कांग्रेस विरोधी माहौल निर्मित नहीं किया। खैर इससे एक बात तो साबित होती है कि राज्य के स्थानीय मुद्दे विधानसभा चुनाव में कहीं बड़े पैमाने पर हावी होते हैं वरना तो केंद्र का भ्रष्टाचार को आश्रय देना ही खुद में स्वयंभू मुद्दा है किसी भी चुनाव में उसकी अगुवाई वाली पार्टी की करारी हार का। अब जबकि कर्नाटक विधानसभा चुनाव का परिणाम घोषित हो चुका है और भ्रष्टाचार भी कोई बड़ा चुनावी मुद्दा नहीं बन सका है तो यह मान लेना चाहिए कि जनता को भ्रष्टाचार से कोई फर्क नहीं पड़ता। हां, भ्रष्टों की जमात से वह कम भ्रष्ट को ज़रूर चुनती है। कांग्रेस को यक़ीनन कर्नाटक के चुनाव परिणाम ने राहत प्रदान की होगी। भाजपा सहित पूरा विपक्ष परिणाम से पूर्व जिस तरह से कानून मंत्री और रेल मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा था, अब उसका रवैया कुछ सौम्य हुआ है। किन्तु केंद्र की ओर से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि वह कर्नाटक के चुनाव परिणाम से उत्साहित होकर और खुद को जनता-जनार्दन के समक्ष भ्रष्टाचार के प्रति कड़ाई से निपटने की अगुआ साबित करने की रणनीति के तहत दोनों मंत्रियों की बलि ले सकती है। इससे अव्वल तो जनता के समक्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी नीयत साफ़ होगी दूसरे विपक्ष के पास सरकार को कटघरे में खड़ा करने का सबसे बड़ा मुद्दा दम तोड़ देगा। फिर अपने केंद्रीय मंत्रियों की बलि लेकर भी कांग्रेस को कोई बड़ा नुकसान नहीं होने वाला है। यह भी हो सकता है कि वह दोनों मंत्रियों के मंत्रालय में फेरबदल कर दे या एक से इस्तीफ़ा ले और दूसरे को बतौर सजा स्थानांतरण का हुक्म दे डाले। सरकार की रणनीति आखिर जो भी हो, चुनावी वर्ष में वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी जो उसकी वर्तमान स्थिति को और गंभीर अवस्था में पहुंचा दे।

 

इस वर्ष ५ और राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और अगले वर्ष लोकसभा चुनाव हैं लिहाजा सरकार अपनी ९ वर्षों की कारगुजारियों से उपजी असहज स्थिति को काफी हद तक डैमेज कंट्रोल के करीब ले जायेगी। एक बात और, कांग्रेस को मीडिया और विपक्षी दलों द्वारा जिस तरह दयनीय साबित करने की होड़ लगी है, वास्तविकता में वह खुद को लगातार मजबूत कर रही है। संगठनात्मक स्तर पर भी नींव दुरुस्त करने के प्रयास ज़ारी हैं। वर्तमान विवादों और घोटालों को परे रखा जाए तो ऐसा एक भी कारण नहीं दिखता जो कांग्रेस को कथित तौर पर कमजोर साबित करता हो। चूंकि भाजपा इस समय नरेंद्र मोदी के भावी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर घर में ही घिरी हुयी है और साम्प्रदायिकता के ठप्पे के कारण भी उसे नुकसान होता रहा है लिहाजा कांग्रेस उसके मुकाबले कहीं अधिक बेहतर स्थिति में है। पहले सूरजकुंड और फिर जयपुर में चिंतन शिविर के निहितार्थों को देखें तो कर्नाटक में कांग्रेस की जीत काफी कुछ बयां करती है। जहां तक दागी और भ्रष्ट मंत्रियों का सवाल है तो उनके साथ होने वाले व्यवहार का पता ज़ल्द ही चल जाएगा। वैसे भी जबसे संगठन ने सरकार की पर नकेल कसी है, सरकार का आत्मविश्वास बड़ा ही है। यानी कांग्रेस का सरकार की मुश्कें कसना शुभ संकेत ही कहा जाएगा। संगठन किसी भी दल, समूह या सरकार की सबसे बड़ी ताकत होता है। राजनीति में तो कहा भी जाता है कि संगठन को सरकार पर मजबूत पकड़ रखनी चाहिए, वरना सत्ता का मद निरंकुशता की ओर अग्रसर करता है। बात यदि भाजपा, लेफ्ट या अन्य कैडर आधारित क्षेत्रीय दलों की करें, तो इनके सत्ता में रहते हमेशा संगठन ने इनकी कमान अपने हाथों में ही रखी है और शायद यही मुख्य वजह है कि इनका संगठनात्मक ढांचा अपेक्षाकृत कुछ अधिक ही मजबूत है। यदि कांग्रेस संगठन सरकार की कमान अपने हाथों में रखता है, तो अव्वल तो मंत्रियों की मनमानी पर लगाम लगाई जा सकेगी, दूसरे सरकार के कामकाज का निष्पक्ष आकलन किया जा सकेगा। इससे मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर लगाम भी लगाईं जा सकेगी। सोनिया गांधी ने शायद इसी सोच को यथार्थ के धरातल पर उतारा है। चूंकि इस बार स्वयं सोनिया पार्टी की गिरती साख को लेकर चिंतित हैं, लिहाजा पार्टी के किसी क्षत्रप के पास इतना साहस नहीं कि उनकी सुधार विरोधी मुहिम को पलीता लगा सके। कांग्रेस बदल रही है तो निश्चित है कि बदलाव तो होगा ही चाहे वह किसी भी स्तर पर हो।

सिद्धार्थ शंकर गौतम 

One Response to “बदलती कांग्रेस में क्या होगा बदलाव?”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    कर्नाटक में भाजपा की हार तो पहले से सुनिश्चित थी. रहा कांग्रेस की जीत का प्रश्न, तो जनता के पास अन्य विकल्प क्या था? भ्रष्टाचार के मामले में जिस तरह भाजपा की सरकार घिरी थी और जिस तरह एद्दुरूपा को हटाने में विलंब हुआ ,उससे जनता को को संदेश गया,उसका परिणाम तो भुगतना ही था .गनीमत यही रही कि जनता के एक बहुत छोटे तबके ने एडुरूपा को पीड़ित समझा,नहीं तो भाजपा की और भद्द होती.
    आज देश की स्थिति यह है कि जनता यह नहीं समझ पा रही है कि दोनो राष्ट्रीय दलों में कौन ज़्यादा भ्रष्ट है.इस समय आवश्यकता है एक ऐसे विकल्प की जो अपनी साफ़ सुथरी छवि से आम जनता को प्रभावित कर सके.
    पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानववाद’ में 1965 में लिखा था,” ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है,जिसके आचरण हीनता के विषय में कुछ कहा जाए तो जनता विश्वास न करे.” क्या आज स्थिति उससे ज़्यादा भयावह नहीं है? इस हालात में अगर इस स्थिति को बदलने का दावा करने वाला कोई व्यक्ति या दल आ जाए और जनता उस पर विश्वास कर ले तो क्या यह कोई आश्चर्य का विषय होगा?

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