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व्हाट्सएप निमंत्रण : सुविधा के साथ संवेदना भी जरूरी

बाबूलाल नागा

    समय के साथ समाज बदला है और उसके साथ बदल गया है हमारे आपसी संवाद का तरीका भी। एक दौर था जब शादी-ब्याह, गृहप्रवेश या किसी अन्य पारिवारिक कार्यक्रम का निमंत्रण स्वयं घर आकर दिया जाता था। वह कार्ड केवल सूचना नहीं होता था बल्कि रिश्तों की औपचारिक अभिव्यक्ति होता था। दो शब्दों का आग्रह— “जरूर आना”—सामने वाले को यह एहसास दिलाने के लिए काफी होता था कि उसकी उपस्थिति महत्वपूर्ण है।

     आज वही निमंत्रण व्हाट्सएप के माध्यम से भेजा जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह तरीका सुविधाजनक है, समय और संसाधनों की बचत करता है। बदलते दौर में तकनीक को नकारा भी नहीं जा सकता लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सुविधा के साथ वह संवेदना भी बनी रह पा रही है जो रिश्तों की आत्मा होती है?

     अक्सर देखा जाता है कि व्हाट्सएप पर कार्ड भेजने के बाद कोई फोन या व्यक्तिगत संवाद नहीं होता। ऐसे में आम व्यक्ति के मन में असमंजस पैदा होता है— क्या यह वास्तविक निमंत्रण है या केवल औपचारिक सूचना? क्या हमारी उपस्थिति वास्तव में अपेक्षित है या नहीं?

     यह स्थिति किसी को असहज कर देती है। पहले मेहमानों से संपर्क कर यह पूछा जाता था कि वे कब और कैसे पहुंचेंगे। आज कई बार केवल यह देखा जाता है कि संदेश ‘देखा गया’ या नहीं। संवाद की यह कमी रिश्तों में एक अनकहा फासला पैदा कर रही है।

     व्हाट्सएप निमंत्रण कई बार ब्रॉडकास्ट सूची में भेजे जाते हैं। एक ही संदेश अनेक लोगों तक पहुंच जाता है लेकिन व्यक्तिगत आग्रह का भाव कहीं खो जाता है। जब ऐसे निमंत्रण पर कोई व्यक्ति कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाता तो बाद में यह कह दिया जाता है— “कार्ड तो भेजा था।” यह वाक्य सुनने में सामान्य लगता है लेकिन यहीं से संवाद की कमी उजागर हो जाती है।

    सच यह है कि कार्ड भेजना और दिल से बुलाना—दोनों अलग बातें हैं। कार्ड सूचना देता है जबकि आग्रह अपनापन जताता है। तकनीक सूचना दे सकती है लेकिन अपनापन अब भी इंसानी आवाज में ही झलकता है।

    यह कहना भी उचित नहीं होगा कि हर व्हाट्सएप निमंत्रण औपचारिक ही होता है। कई लोग पूरी संवेदनशीलता के साथ फोन भी करते हैं, हालचाल भी पूछते हैं और डिजिटल माध्यम को केवल एक सहायक साधन की तरह उपयोग करते हैं। दरअसल, आवश्यकता इस संतुलन की है।

   आज जब जीवन की गति तेज है तो यह स्वाभाविक है कि सभी के पास समय की कमी हो। लेकिन रिश्तों में समय न देना ही अगर सामान्य व्यवहार बन जाए तो यह चिंता का विषय है। एक छोटा-सा फोन कॉल, दो मिनट की बातचीत, सामने वाले को यह विश्वास दिला सकती है कि उसकी मौजूदगी मायने रखती है।

   यह लेख किसी व्यवस्था या तकनीक के विरोध में नहीं है। यह केवल यह स्मरण कराने का प्रयास है कि सुविधाओं के बीच संवेदनाओं को न खोया जाए। व्हाट्सएप निमंत्रण भेजना गलत नहीं लेकिन उसके साथ संवाद जोड़ देना रिश्तों को जीवित रखता है।

    क्योंकि अंततः समारोह से ज्यादा महत्वपूर्ण वे रिश्ते होते हैं, जिनके कारण समारोह सार्थक बनते हैं। यदि बुलाना है तो आग्रह भी होना चाहिए और यदि आग्रह नहीं है तो यह स्पष्टता भी होनी चाहिए। शायद यही छोटा-सा संतुलन हमारे सामाजिक संबंधों को तकनीक के दौर में भी मानवीय बनाए रख सकता है। अतः भले ही व्हाट्सएप पर निमंत्रण भेज दिया जाए, फिर भी फोन करके व्यक्तिगत रूप से उन्हें आमंत्रित करें व आने  का आग्रह अवश्य करें।

बाबूलाल नागा