डॉ. रजनी चौबे
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। प्रत्येक चुनाव के साथ करोड़ों नागरिक मतदान के माध्यम से अपनी राजनीतिक इच्छा व्यक्त करते हैं और लोकतांत्रिक शासन को वैधता प्रदान करते हैं। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है किंतु क्या लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया और संख्यात्मक बहुमत तक सीमित है? क्या बहुमत प्राप्त कर लेने के बाद किसी भी सरकार को असीमित अधिकार मिल जाते हैं, अथवा उसकी शक्ति भी संविधान की मर्यादाओं से नियंत्रित होती है? आज जब लोकतांत्रिक विमर्श में बहुमत को ही जनादेश का अंतिम पर्याय मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब इन प्रश्नों पर पुनर्विचार करना आवश्यक हो जाता है।
भारतीय संविधान इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत स्पष्ट रूप से देता है। लोकतंत्र में सरकार का गठन बहुमत के आधार पर अवश्य होता है परंतु शासन का संचालन संविधान के अधीन होता है। यही कारण है कि भारत केवल लोकतांत्रिक राज्य नहीं, बल्किसंवैधानिक लोकतंत्रहै। यहाँ चुनाव सत्ता परिवर्तन का माध्यम है जबकि संविधान उस सत्ता के प्रयोग की सीमाएँ, उद्देश्य और उत्तरदायित्व निर्धारित करता है। दूसरे शब्दों में, बहुमत शासन को वैधता देता है, किंतु संवैधानिक नैतिकता उसे न्यायोचित बनाती है।
संवैधानिक नैतिकता का आशय केवल संविधान के शब्दों का पालन करना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ उन मूलभूत संवैधानिक मूल्यों के प्रति निष्ठा है, जिन पर भारतीय गणराज्य की नींव रखी गई है, विधि का शासन, मौलिक अधिकारों का संरक्षण, संस्थागत संतुलन, नागरिक गरिमा, समानता, स्वतंत्रता, न्याय तथा लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व। यह केवल न्यायपालिका या सरकार के लिए निर्धारित कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रत्येक अंग और प्रत्येक नागरिक के सार्वजनिक आचरण का नैतिक मानदंड है।यहीं परबहुमत(Majority)औरबहुसंख्यकवाद (Majoritarianism)के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुमत सरकार बनाने का संवैधानिक माध्यम है किंतु बहुसंख्यकवाद वह राजनीतिक प्रवृत्ति है जिसमें चुनावी जनादेश को संविधान, मौलिक अधिकारों और स्वतंत्र संस्थाओं से ऊपर मान लिया जाता है। भारतीय संविधान बहुमत को शासन का अधिकार देता है परंतु उसे संविधान से ऊपर होने का अधिकार कभी नहीं देता।
यदि बहुमत स्वयं को संवैधानिक सीमाओं से मुक्त समझने लगे तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल संख्यात्मक प्रभुत्व में बदल सकता है।संविधान निर्माताओं ने इस संभावित संकट को बहुत पहले पहचान लिया था। संविधान सभा की बहसों में बार-बार यह विचार सामने आया कि किसी भी संविधान की सफलता उसके लिखित प्रावधानों से अधिक उन व्यक्तियों और संस्थाओं पर निर्भर करेगी जो उसे व्यवहार में लागू करेंगे। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी स्पष्ट किया था कि उत्कृष्ट संविधान भी तब असफल हो सकता है, जब उसे संचालित करने वाले लोग संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध न हों। इसीलिए भारतीय लोकतंत्र में चुनावी बहुमत से अधिक महत्वपूर्ण संवैधानिक अनुशासन है। जनादेश शासन की वैधता का स्रोत है किंतु संविधान उसकी वैधानिक और नैतिक सीमा निर्धारित करता है।
समकालीन लोकतांत्रिक राजनीति में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या प्रत्येक लोकप्रिय निर्णय स्वतः संवैधानिक भी होता है? लोकतंत्र में लोकप्रियता और संवैधानिकता हमेशा समानार्थी नहीं होतीं। कोई निर्णय व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर सकता है, परंतु यदि वह मौलिक अधिकारों, विधि के शासन या संस्थागत संतुलन के विपरीत है, तो उसे केवल बहुमत के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। भारतीय संविधान का उद्देश्य केवल बहुमत की इच्छा को लागू करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि लोकतंत्र प्रत्येक नागरिक की गरिमा और अधिकारों की रक्षा करे।यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र में संविधान केवल शासन का दस्तावेज़ नहीं बल्कि सत्ता पर नैतिक नियंत्रण का माध्यम भी है।
चुनावी विजय किसी सरकार को शासन करने का अधिकार देती है किंतु वह अधिकार निरंकुश नहीं होता। संवैधानिक लोकतंत्र का सार इसी संतुलन में निहित है कि बहुमत शासन करे परंतु संविधान सर्वोच्च बना रहे।यदि संविधान सत्ता के प्रयोग की मर्यादाएँ निर्धारित करता है तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि इन मर्यादाओं का संरक्षण कौन करेगा। भारतीय लोकतंत्र का उत्तर स्पष्ट है. यह दायित्व केवल किसी एक संस्था का नहीं, बल्कि विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाओं और स्वयं नागरिक समाज का साझा दायित्व है। संवैधानिक नैतिकता का वास्तविक अर्थ भी यही है कि प्रत्येक संस्था अपनी शक्ति का प्रयोग संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर करे और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का निर्वहन संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप करे।
इसी संदर्भ में न्यायपालिका की भूमिका विशेष महत्व रखती है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि संविधान केवल शासन की संरचना निर्धारित करने वाला दस्तावेज़ नहीं बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और विधि के शासन का नैतिक आधार भी है। संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा को न्यायिक व्याख्याओं ने केवल एक सैद्धांतिक विचार नहीं रहने दिया बल्कि उसे संवैधानिक निर्णयों की कसौटी के रूप में विकसित किया। न्यायालय का यह दृष्टिकोण किसी संस्था की सर्वोच्चता स्थापित करने का प्रयास नहीं है बल्कि संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखने का दायित्व है। हालाँकि संवैधानिक नैतिकता का अर्थ न्यायिक वर्चस्व भी नहीं है।
लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है जब विधायिका जन-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करे, कार्यपालिका उत्तरदायी शासन सुनिश्चित करे और न्यायपालिका संवैधानिक सीमाओं की रक्षा करे। इन तीनों के बीच संतुलन ही भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता है। यदि कोई एक संस्था अपने अधिकार-क्षेत्र का अतिक्रमण करती है तो लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित होता है। इसलिए संवैधानिक नैतिकता केवल सत्ता पर नियंत्रण का सिद्धांत नहीं, बल्कि संस्थागत संयम (Institutional Restraint) का भी सिद्धांत है।
समकालीन भारत में इस अवधारणा की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। तीव्र राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, सामाजिक ध्रुवीकरण, त्वरित जनमत, डिजिटल माध्यमों पर निर्मित राजनीतिक विमर्श और चुनावी वैधता की बढ़ती केंद्रीयता ने बहुमत की अवधारणा को अधिक प्रभावशाली बना दिया है। ऐसे समय में यह स्मरण रखना आवश्यक है कि लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल चुनावों की नियमितता से निर्धारित नहीं होती। लोकतंत्र का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि वह असहमति को कितना स्थान देता है, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की कितनी रक्षा करता है, स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता को कितना सम्मान देता है और सत्ता के प्रयोग को किस सीमा तक संवैधानिक उत्तरदायित्व से बाँधकर रखता है।
यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र में बहुमत स्वयं लक्ष्य नहीं बल्कि संवैधानिक शासन का माध्यम है। लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि सरकार कितने बड़े बहुमत से बनी है बल्कि इस पर निर्भर करती है कि वह बहुमत संविधान की मूल भावना के प्रति कितना उत्तरदायी है। चुनावी जनादेश शासन की वैधता का स्रोत हो सकता है, किंतु संवैधानिक नैतिकता ही उस जनादेश को लोकतांत्रिक वैधता प्रदान करती है। बहुमत यदि संवैधानिक मर्यादाओं, मौलिक अधिकारों और संस्थागत संतुलन का सम्मान करता है, तो वही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बन जाता है; किंतु यदि वह स्वयं को संविधान से ऊपर मानने लगे तो लोकतंत्र का चरित्र धीरे-धीरे बहुसंख्यकवाद में परिवर्तित होने लगता है।
आज आवश्यकता किसी नए संवैधानिक सिद्धांत की नहीं बल्कि संविधान की मूल भावना को सार्वजनिक जीवन में पुनर्स्थापित करने की है। इसके लिए संवैधानिक साक्षरता का विस्तार, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का संरक्षण, नागरिकों में संवैधानिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास तथा राजनीतिक विमर्श में संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देना आवश्यक है। लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं, बल्कि संवैधानिक सीमाओं के भीतर उत्तरदायी शासन की सतत प्रक्रिया है। जब नागरिक, राजनीतिक दल, सरकार और संवैधानिक संस्थाएँ समान रूप से संविधान को अपने आचरण का आधार बनाएँगी, तभी संवैधानिक नैतिकता व्यवहार में साकार होगी।भारतीय संविधान ने लोकतंत्र को केवल बहुमत की संख्यात्मक शक्ति पर आधारित व्यवस्था के रूप में स्वीकार नहीं किया। उसने लोकतंत्र को न्याय, स्वतंत्रता, समानता, विधि के शासन, मौलिक अधिकारों और संवैधानिक उत्तरदायित्व जैसे नैतिक मूल्यों से संपन्न किया। यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र में अंतिम प्रश्न यह नहीं है किबहुमत किसकेपास है,बल्कि यह है किक्या वह बहुमत संविधान की मर्यादाओं के भीतर शासन कर रहा है।
भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता और परिपक्वता इसी संतुलन पर निर्भर करती है। जब बहुमत संविधान का सम्मान करता है, तब लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं रह जाता, बल्कि न्यायपूर्ण, समावेशी और उत्तरदायी सार्वजनिक व्यवस्था में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए संविधान का वास्तविक संदेश बहुमत को सीमित करना नहीं, बल्कि उसे संवैधानिक नैतिकता से अनुप्राणित करना है।भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति चुनावी बहुमत नहीं, बल्कि वह संवैधानिक संस्कृति है जो बहुमत को भी संविधान के अधीन रहने की प्रेरणा देती है।
डॉ. रजनी चौबे
लेखिका परिचय
डॉ. रजनी चौबे राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक आचार्य हैं। उनके शोध के प्रमुख क्षेत्र संवैधानिक कानून, संवैधानिक नैतिकता, न्यायिक सक्रियता, लोकतांत्रिक शासन, राजनीतिक सिद्धांत, मानवाधिकार तथा अंतरराष्ट्रीय संबंध हैं। वे समसामयिक संवैधानिक एवं राजनीतिक विषयों पर नियमित लेखन करती हैं।