देश के रहनुमाओं , कब समझेंगे आप ?

इस देश में खेती को फ़ायदे का व्यवसाय बनाने का नारा लगाते हुए सरकारों को साढ़े छः दशक हो गए लेकिन देश के किसानों के हालात ना पिछले सड़सठ सालों में बदल सके और ना ही हाल फ़िलहाल इसकी कोई संभावना दिखाई देती है । विकास के दावों के बावजूद बाढ़, सूखे और मौसम की मार से जूझते किसान अभी भी बिजली के संकट से बेजार हुए जा रहे हैं । कहीं खाद – बीज की किल्लत है , तो कभी नहरों में सिंचाई के लिए पानी और पंप चलाने के लिए बिजली की समस्या । खेती – किसानी को लाभकारी बनाने की लम्बी – चौडी बातें तो की जाती रही हैं और आज भी की जा रही हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत एकदम अलग है । देश का अन्नदाता दाने – दाने को मोहताज है । फ़सल की वाजिब कीमत पाने के लिए किसानों को सडक पर आना पड़ रहा है । सरकारी महकमों में फ़ैले भ्रष्टाचार और कर्ज़ के बोझ तले दबे किसान अपनी जमीन छोडकर पलायन के लिए मजबूर हैं ,  बावजूद इसके कि देश की अधिसंख्य आबादी किसानों की है । सरकार की किसान विरोधी नीतियाँ खेती की बदहाली के जिम्मेदार लिए हैं । फ़सल के वक्त बडी कंपनियां और व्यापारी कीमतें गिरा देते हैं । न्यूनतम मूल्य पर कोई ठोस नीति नहीं होने से किसानों को उनकी मेहनत का औना – पौना दाम ही मिल पाता  है । चुनावों के वक्त बढ़ – चढ़ कर घोषणाएं करने वाले नेतागण अपनी बारी आने पर कुछ करने की बजाए पिछली सरकारों पर दोष मढ़ने लग जाते  हैं l किसानों के लिए मास्टर-प्लान , कृषि-रोड मैप बनाने जैसी बातें तो की जाती हैं लेकिन उनको अमली-जामा पहनाने में कोई सफल होता नहीं दिखता है l मास्टर- प्लान , रोड-मैप बनाने से किसानों की ज़िंदगी तो सुधरती नहीं नेता , ठेकेदारों और अफ़सरों के दिन ज़रुर सुधर जाते हैं । खेती को लेकर ना तो कोई गंभीर सोच और ना ही गंभीर प्रयास दिखाई देते हैं । जब तक समग्र – नीति के साथ जमीनी –स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन  नहीं किया  जाएगा   , तब तक देश में अन्न का संकट दिनों-दिन विकराल ही होता जाएगा , किसान खेती-बाड़ी के अपने उद्यम से दूर ही होता जाएगा l

‘बेवजह’ सड़कें नापने के अपने शौक के कारण मैं अक्सर ग्रामीण इलाकों का रुख कर लेता हूँ , लेकिन ज़्यादातर मौकों पर चारों तरफ एक ही फसल देखकर अफसोस ही होता है  । कभी प्याज़ का भाव तेज़ हुआ , तो अगले साल खेतों में प्याज़ ही प्याज़ , कभी फ़ूलगोभी ,कभी टमाटर तो कभी लहसुन । किसान देखा-देखी में दाम मिलने की उम्मीद में बुआई कर देते हैं और यही उनके जी का जंजाल बन जाता है l ऐसे में किसान अपनी लागत तो क्या उपज की कुड़ाई का खर्च भी निकाल पाने में सफल नहीं हो पाते हैं l इसकी साफ वजह है ‘भरपूर उत्पादन , कम कीमत’ l क्या सरकार ऐसी कोई सालाना – योजना नहीं बना सकती है जिसमें इलाके की परिस्थितियों के अनुरूप फसलें तय कर ली जाएँ और उस के संदर्भ में ही किसानों को बेहतर तकनीक की जानकारी दे जाए ?

‘बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताए’ का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है कि कभी देश की मंडियों में टमाटर दो रूपए किलो बिकता है तो कभी आलू और कभी प्याज को खेतों में ही सड़ने को छोड़ दिया जाता है l ऐसी परिस्थितियाँ भद्दा मज़ाक हैं श्रम-शक्ति के साथ , खेतों में दिन – रात पसीना बहाने वाले किसान को मुनाफे के तौर पे चंद पैसे ही नसीब होते हैं l जबकि रंग-बिरंगे पैकेट और आकर्षक विज्ञापनों की बदौलत टोमैटो – सॉस और आलू- चिप्स के भाव आसमान छू रहे हैं। बिहार के ही कई ज़िलों में विगत कई वर्षों में टमाटर की बम्पर पैदावार जी का जंजाल बन गई किसानों के लिए । लागत की कौन कहे खेतों से तुड़ाई-कुड़ाई का खर्च निकाल पाना मुश्किल हो गया। किसान को ऐसे हालात से निरंतर जूझते देख ये साबित होता है कि सरकार की नीयत कभी साफ़ नहीं रही है । मौजूदा नीतियाँ व्यापारियों और जमाखोरों के फ़ायदे और किसानों के शोषण का ही पर्याय बन गई हैं ।

किसानों के प्रति ऐसी बेरुखी क्यों ? हीरे – मोती उगलने वाली धरती के सीने पर कंक्रीट का जंगल कुछ लोगों का जीवन चमक दमक और चकाचौंध से भर सकता है लेकिन किस कीमत पर? भूखे- पेट रात भर करवटें बदलने वाले लाखों मेहनतकश किसानों के आँसूओं से लिखी किसी भी विकास की इबारत बेमानी है । देश की खुशहाली का रास्ता खेतों –खलिहानों की पगडंडी से होकर ही गुज़रता है । इसके रास्ते के कांटे और कंकड – पत्थर चुनना ज़रुरी है । किसान के चेहरे की चमक में ही छिपा है देश और प्रदेश की तरक्की का राज़ । देश के रहनुमाओं , कब समझेंगे आप ?

 

आलोक कुमार ,

2 thoughts on “देश के रहनुमाओं , कब समझेंगे आप ?

  1. प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादन बढाने पर ध्यान केन्द्रित करना होगा. किसानो की लागत की तुलना में आमदानी बढाने पर ध्यान केन्द्रित करना होगा. किसानो की कुशलता और दक्षता कैसे बढे इस पर ध्यान लगाना होगा. इन बिन्दुओ पर काम करना आवश्यक है.

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