उजली चादर का मौन

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

संसद का यह सत्र जितना निष्फल रहा, पहले कोई सत्र नहीं रहा। संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को लेकर पहले भी हंगामे हुए, लेकिन सरकारों ने आखिरकार विपक्ष की बात मान ली। इस बार सरकार अड़ी रही, क्योंकि उसे पता है कि संसद में चाहे उसके गठबंधन का बहुमत है, लेकिन जेपीसी में वह अल्पमत में ही रहती। उसे अपने गठबंधन के सभी दलों पर विश्वास नहीं है। जेपीसी शायद ढाई-तीन साल तक चलती और ऐन चुनाव के पहले सरकार के मुंह पर कालिख पोत देती। यह खतरा अभी टला नहीं है। इसका एक तोड़ यह भी सुझाया जा रहा है कि अभी ही मध्यावधि चुनाव क्यों नहीं करवा लिया जाए? अगर साढ़े तीन साल इंतजार किया जाएगा तो उस अवधि में भारतीय जनता पार्टी गठबंधन पहले की तरह सबल हो सकता है। मध्यावधि चुनाव की पतंग रंगीन तो बहुत है, लेकिन यह उड़ने वाली नहीं है, क्योंकि कांग्रेस के पास नेहरू या इंदिरा की तरह न तो कोई कद्दावर नेता है और न ही गठबंधन के साथियों पर उसका कोई भरोसा है। इसके अलावा यदि जेपीसी के मुद्दे पर संसद भंग की गई तो कांग्रेस को लेने के देने पड़ सकते हैं।

यह ठीक है कि पिछली बार जब भी कांग्रेस चुनाव हारी तो उसके शीर्ष नेताओं – इंदिरा, नरसिंहराव, राजीव गांधी – का नाम भ्रष्टाचार के साथ सीधा जुड़ा हुआ था, लेकिन इस बार न तो कांग्रेस अध्यक्ष, न उनके पुत्र और न ही प्रधानमंत्री का नाम किसी भी घोटाले से सीधा जुड़ा है। इसके बावजूद सारा देश स्तब्ध है कि एक के बाद एक घोटाले पर घोटाला उछलता चला आ रहा है। स्वतंत्र भारत में पिछले जितने भी घोटाले हुए हैं, वे सब मिलकर भी उन घोटालों के बराबर नहीं हैं, जो पिछले छह माह में हुए हैं। यह भी ठीक है कि इन घोटालों के लिए जिम्मेदार मंत्री शशि थरूर, मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, महासचिव सुरेश कलमाडी और मंत्री ए राजा के इस्तीफे भी हो गए हैं, लेकिन सारा देश पूछ रहा है कि क्या यह काफी है? इन इस्तीफों का देश क्या करे? क्या इन्हें चाटे? इन इस्तीफों के कारण क्या कारगिल के शहीदों के साथ जो धोखा हुआ है, उसकी भरपाई होगी? आदर्श सोसायटी के समस्त गैर-सैनिक फ्लैट-मालिकों को अभी तक बेदखल क्यों नहीं किया गया? क्या कलमाडी के इस्तीफे के फलस्वरूप भारत की जनता को उसके खून-पसीने की कमाई के 70 हजार करोड़ रुपए वापस मिल रहे हैं? राष्ट्रकुल खेलों के चोरों और लुटेरों को अभी तक पकड़ा क्यों नहीं गया है? उनकी संपत्तियां जब्त क्यों नहीं की गई हैं? ए राजा के इस्तीफे से क्या पौने दो लाख करोड़ रुपए सरकारी खजाने में वापस आ रहे हैं? यदि नहीं, तो इन सारे इस्तीफों को भारत की जनता नौटंकी के अलावा क्या समझेगी? अभी उत्तर प्रदेश के अनाज घोटाले की परतें खुलते-खुलते खुल रही हैं। पता नहीं, वह कितने लाख करोड़ का होगा?

इन घोटालों से आम लोग जितने हतप्रभ हैं, उससे ज्यादा चकित हैं हमारी केंद्र सरकार के रवैये से! केंद्र सरकार की चिंता सिर्फ यह दिखाई पड़ रही थी कि किसी भी तरह संसद चल पड़े। घोटालेबाज पकड़े जाएं या नहीं, यह कोई खास मुद्दा नहीं है। घोटालेबाजों के सरगना अपने आप इस्तीफे दे रहे हैं। उन्हें बर्खास्त क्यों नहीं किया गया? सरकार कुछ भी करती हुई क्यों नहीं दिखाई पड़ती है? उसका यह पिटा-पिटा-सा तेवर लोगों के दिमाग में शक पैदा करता है। लोग सोचते हैं इस्तीफे देने वालों के तार कहीं ऊपर से तो नहीं जुड़े हुए हैं? कांग्रेस अध्यक्ष अपने संसदीय दल को कहती हैं कि वे भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगी? ऐसा वे क्यों कहती हैं? इसीलिए न कि भ्रष्टाचार को खत्म करना उनकी जिम्मेदारी है। उस जिम्मेदारी को निभाने की बजाय वे हुंकार लगाती हैं कि प्रधानमंत्री की टांग-खिंचाई मत कीजिए। आखिर संसदीय लोकतंत्र में सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसकी होती है? क्या प्रधानमंत्री की नहीं होती? क्या इतिहास में यह नहीं लिखा जाएगा कि डॉ मनमोहन सिंह देश की सबसे भ्रष्ट सरकार के सबसे स्वच्छ प्रधानमंत्री थे? धन्य है यह स्वच्छता! यह कैसी स्वच्छता है, जिसकी ओट में भ्रष्टाचार दनदना रहा है? यह स्वच्छता तो भ्रष्टाचार को ढकने की चादर बन गई है। क्या इस चादर को ओढ़कर कांग्रेस मध्यावधि चुनाव में कूद सकती है?

पिछले चुनाव में इस उजली चादर ने अपना चमत्कार जरूर दिखाया, लेकिन अब घोटालों की धुंध के बीच वह दिव्य उजलापन तो दूर, लोगों को वह चादर ही दिखाई नहीं पड़ रही है। कांग्रेस के लिए अब भी आशा की एक तेज किरण थी या यों कहिए कि अब भी है। वह है राहुल गांधी! राहुल चाहते तो घोटालों पर यमराज की तरह टूट पड़ते। विपक्ष का विरोध फीका पड़ जाता युवा नेता के आक्रोश के आगे! वे देश को द्वंद्वात्मक (डायलेक्टिकल) नेतृत्व प्रदान करते। अपना विरोध खुद करते! भ्रष्टाचार का एंटी-थीसिस बनते! देश में एक नए नेतृत्व का सूत्रपात होता। लेकिन लगता है नीतीश के धोबीपाट का असर अभी तक बना हुआ है।

राहुल की चुप्पी कांग्रेस को लगी दहशत की दहाड़ है। यदि भ्रष्टाचार से लड़ने के सवाल पर कांग्रेस गठबंधन बिखर जाता और सरकार गिर जाती तो भारत की जनता उसे स्पष्ट बहुमत से लौटाती। यह अवसर कांग्रेस ने अगर अपने हाथ से निकल जाने दिया तो साढ़े तीन साल बाद उसकी गति उससे भी बुरी होगी, जो पिछली तीन कांग्रेस सरकारों की हुई थी।

यह ठीक है कि अभी भाजपा गठबंधन और तीसरे मोर्चे में इतना दम दिखाई नहीं पड़ता कि वे कांग्रेस गठबंधन को सीधी टक्कर दे सकें, लेकिन चुनाव की वेला में पार्टी समीकरण को बदलते कितनी देर लगती है। हवा का रुख भांपने में नेतागण देर क्यों करेंगे? अगर लोकमत का प्रभंजनकारी झंझावात आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं बह रहा होता तो क्या संसद के बहिष्कार में आज हमारे दक्षिण और वाम पंथ साथ-साथ होते? आज देश के मानस को मथनेवाले इस भ्रष्टाचार का समाधान न तो जेपीसी से होने वाला है, न मध्यावधि या आम चुनाव से! पिछले भ्रष्टाचारों के विरुद्ध बनीं चार-चार संयुक्त संसदीय समितियों ने कौन-सा पहाड़ उखाड़ लिया? यह पांचवीं प्रस्तावित समिति अपना कार्यकाल पूरा करेगी, तब तक सारे पंछी या तो उड़ लेंगे या उनके पंख ही झर जाएंगे।

आज जरूरी यह है कि भ्रष्टाचार के दैत्य की गर्दन तत्काल मरोड़ी जाए। क्या यह काम हमारे नेता करेंगे? कैसे करेंगे? वे आज जहां हैं, क्या भ्रष्टाचार किए बिना वहां हो सकते थे? किसकी चादर उजली है? इसीलिए सबका ध्यान संसदीय समितियों, बयानबाजियों और चुनावों में लगा रहता है। जिसकी चादर उजली है, वह मौन है। चुपचाप चादर में लिपटे रहने से क्या दैत्य का दलन हो जाएगा? मौका तो ऐसा है कि चादर गले और तलवार बन जाए। यह तलवार ऐसी चले कि हर भावी भ्रष्टाचारी की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाए और 21वीं सदी में एक नए भारत का उदय हो।

2 thoughts on “उजली चादर का मौन

  1. भ्रस्ताचार की एंटी थीसिस से आपका आशय यह है ही राहुल बाबा इमानदारी की प्रतिमूर्ति बन कर आयेंगे. इस उम्र मैं भी आप गजब की सकारात्मक सोच रखते है. आपको प्रनाम.

  2. बहुत कड़वा सच .सब दूसरों का भ्रष्टाचार बता रहे हैं और अपना छुपा रहे हैं .पर हैं ये सब भ्रष्ट .

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