राजनीति

भारत-पाक में शांति वार्ता के लिए पत्र क्यों

राजेश कुमार पासी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उड़ी हमले के बाद स्पष्ट रूप से घोषणा कर दी थी कि आतंकवाद और वार्ता एक साथ नहीं चल सकते. जब तक पाकिस्तान आतंकवादियों पर लगाम नहीं लगाता, तब तक कोई बातचीत नहीं होगी। पाकिस्तान पर इसका कोई असर नहीं हुआ, इसलिए मोदी सरकार ने पाकिस्तान के साथ बातचीत का रास्ता बंद कर दिया।  2025 में पहलगाम में हुए बड़े आतंकवादी हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा कर दी कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। इस घोषणा के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया। मोदी ने कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद बंद नहीं करता तब तक ये संधि लागू नहीं होगी। भारत ने पाकिस्तान के साथ व्यापारिक संबंध खत्म कर दिए और कूटनीतिक संबंधों को भी कमतर कर दिया।

 भारत के साथ व्यापारिक संबंधों के खत्म होने से पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन पाकिस्तान कुछ समझने को तैयार नहीं है। सिंधु जल समझौते को लागू करवाने के लिए पाकिस्तान पूरी दुनिया में भटक रहा है लेकिन भारत किसी की सुनने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान समझ गया है कि भारत जैसी शक्ति को अंतरराष्ट्रीय दबाव डालकर झुकाया नहीं जा सकता और पाकिस्तान की इतनी हैसियत भी नहीं है कि वो बड़ा दबाव डाल सके। भारत ने इस समझौते को निलंबित करने के बाद ऐसे इंतज़ाम कर लिए हैं कि पाकिस्तान जाने वाले पानी को नियंत्रित किया जा सके। पाकिस्तान को इसका असर महसूस होने लगा है, इसलिए वो भारत से बातचीत के लिए गिड़गिड़ा रहा है। एक तरफ पाकिस्तान चाहता है कि भारत बातचीत करे तो दूसरी तरफ उसके नेता भारत को युद्ध की धमकी दे रहे हैं। जितनी अजीब बात है कि ऑपरेशन सिंदूर में जबरदस्त मार खाने के बाद भी पाकिस्तान युद्ध की धमकी से भारत को झुकाना चाहता है। इससे भी आगे बढ़कर भारत पर परमाणु हमला करने की धमकी दी जा रही है। पाकिस्तान भारत के साथ रिश्ते ठीक करने के लिए सब कुछ करने को तैयार है, लेकिन आतंकवाद छोड़ने को तैयार नहीं है। इसका मतलब है कि पाकिस्तान चाहता है कि उसके आतंकवादी भारत को जख्म देते रहे और भारत पाकिस्तान को दोस्त बना रहे। 2014 से पहले ये चलता रहा लेकिन मोदी राज में ये होने वाला नहीं है। ऐसा नहीं है कि मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान से दुश्मनी शुरू कर दी थी, बल्कि उन्होंने पाकिस्तान को रिश्ते सुधारने का पूरा मौका दिया। 

              वास्तव में भारत के हर नेता ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की है लेकिन उसे भारी निराशा का सामना करना पड़ा है। 1971 में इंदिरा गांधी ने 90000 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बनाने के बाद शिमला समझौता कर लिया और युद्ध में जीता हुआ सब कुछ वापस दे दिया। युद्ध में बुरी तरह से पराजित करने के बाद भी  पाकिस्तान से शांति स्थापना के लिए ही समझौता किया गया था। इसके बदले हमें पंजाब और कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकवाद का बड़ा बुरा दौर देखना पड़ा है। तब से पाकिस्तानी आतंकवाद का ऐसा दौर शुरू हुआ है जो अभी भी जारी है। भारत पर पाकिस्तानी हमले कम नहीं हुए हैं बल्कि हमारी सुरक्षा एजेंसियां ज्यादा सतर्क हो गई हैं जिसके कारण पाकिस्तान कामयाब नहीं हो पा रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी जब सत्ता में आये तो पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के लिए वो लाहौर गए। उनकी इस कोशिश का प्रत्युत्तर  पाकिस्तान ने कारगिल पर हमला करके दिया। इस हमले के बाद वाजपेयी पाकिस्तान से पूरी तरह निराश हो गए।

2015 में मोदी काबुल की यात्रा से लौटते हुए अचानक पाकिस्तान के दौरे पर चले गए और तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ बातचीत की। पाकिस्तान ने भारत की इस कोशिश का प्रत्युत्तर  पठानकोट पर हमला करके दिया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय नेतृत्व हमेशा पाकिस्तान से बातचीत करता रहा है लेकिन इसका कभी अच्छा परिणाम हासिल नहीं हुआ।  पाकिस्तान भारत का जन्मजात शत्रु है और वो किसी भी कीमत पर अपनी शत्रुता नहीं छोड़ सकता क्योंकि ये शत्रुता उसकी जीवनदायिनी शक्ति है। पाकिस्तानी सेना भारत का डर दिखाकर ही पाकिस्तानी जनता को मूर्ख बना रही है और उसकी पूरी व्यवस्था को कब्जे में लिया हुआ है। पाकिस्तानी सेना के बारे में कहा जाता है कि दुनिया में सब देशों के पास सेना है लेकिन पाकिस्तानी सेना ऐसी है, जिसके पास एक देश है। पाकिस्तान में पता ही नहीं चलता कि किसके साथ बातचीत की जाए । राजनीतिक नेतृत्व के साथ जो बातचीत होती है उसे सैन्य नेतृत्व नहीं मानता और सेना के साथ सीधी बातचीत नहीं हो सकती। 

                भारत और पाकिस्तान के 116 महत्वपूर्ण व्यक्तियों के एक समूह ने दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों को एक पत्र लिखा है जिसकी चर्चा आजकल मीडिया में हो रही है। दोनों देशों की सरकार की तरफ से इस पत्र पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है लेकिन कुछ नेता इस पर बयान दे रहे हैं। पत्र लिखने वालों ने दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने के लिए बातचीत करने का अनुरोध किया है। दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध स्थापित होने का कौन विरोध कर सकता है. कम से कम भारत में कोई इसका विरोध नहीं करेगा। भारत शुरू से पाकिस्तान से अच्छे संबंध बनाने की कोशिश करता रहा है, इसके बावजूद दोनों देशों के बीच चार-चार युद्ध हो चुके हैं। भारत ने पाकिस्तान पर कभी हमला नहीं किया जबकि पाकिस्तान न केवल भारत पर सैन्य हमले करता रहा है बल्कि 1971 के बाद लगातार आतंकवादी हमले कर रहा है। भारत को पाकिस्तानी सैन्य आक्रमण से ज्यादा नुकसान आतंकवादी हमलों ने पहुंचाया है।

 सवाल यह है कि भारत और पाकिस्तान के खराब संबंधों के लिए क्या भारत भी दोषी है। अगर निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो भारत के हर नेतृत्व ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की है लेकिन उसे इस काम में कोई सफलता नहीं मिली है। पाकिस्तान ने कभी भी भारत के साथ अपने संबंधों को महत्व नहीं दिया है, बल्कि वो हमेशा भारत विरोधी शक्तियों के हाथ में कठपुतली बना रहा। पहले वो अमेरिका की गोद में बैठकर भारत को धमकाया करता था और अब वो चीन की गोद में बैठकर भारत को हड़काने की कोशिश करता है। अब भारत एक ग्लोबल पावर बन चुका है, जिस पर किसी की धमकी का कोई असर नहीं होता, इसलिए अब पाकिस्तान भारत के साथ बातचीत चाहता है।

पत्र लिखने वालों की मंशा पर सवाल नहीं उठाया जाए तो भी इसके पीछे पाकिस्तानी रणनीतिक चाल दिखाई देती है। इस पत्र में कहीं भी यह नहीं लिखा गया है कि पाकिस्तान को अपनी आतंकवाद की नीति को छोड़ देना चाहिए। क्या पत्र लिखने वाले नहीं जानते कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते आतंकवाद के कारण ही बिगड़ गए हैं। क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत आतंकवाद को नजरअंदाज करके पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू कर दे । देखा जाए तो रिश्ते सुधरने के लिए बातचीत जरूरी है लेकिन बातचीत शुरू करने के लिए भारत ने आतंकवाद रोकने की शर्त रखी हुई है। क्या भारत की सोच गलत है, इसका जवाब पत्र नहीं देता। 

                पत्र लिखने वाले चाहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के संबंध पूरी तरह से सामान्य हो जाएं । पाकिस्तान की तरफ से पत्र लिखने वालों को छोड़ दिया जाए तो भारत से पत्र लिखने वाले  आतंकवाद के मुद्दे पर चुप क्यों हैं। उन्हें अपने देश के हितों को देखना चाहिए था, इसके बाद इस पत्र पर हस्ताक्षर करने चाहिए थे। भारत के पक्ष को समझे बिना प्रधानमंत्री को पत्र लिखना क्या उचित है। दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य हो जाते हैं तो दोनों देशों को फायदा होगा लेकिन ज्यादा फायदा पाकिस्तान को होने वाला है। कितनी अजीब बात है कि जिसे बातचीत की ज्यादा जरूरत है, वही अपनी जिद्द पर अड़ा हुआ है। पहलगाम हमले से कुछ दिन पहले ही पाकिस्तानी जनरल मुनीर ने कहा था कि हिन्दू और मुस्लिम दो अलग राष्ट्र हैं और भारत हमारा शत्रु राष्ट्र है। आज पाकिस्तान में एक तरह से मुनीर का शासन चल रहा है, ऐसे में दोनों देशों के संबंध कैसे सुधर सकते हैं।

आतंकवादी हमलों का जवाब देकर भारत ने बताया है कि अब वो आतंकवाद को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। जिन लोगों ने भारत की तरफ से पत्र लिखा है, उन्हें आतंकवाद का विरोध करना चाहिए था और लिखना चाहिए था कि पाकिस्तान को इस नीति का त्याग करना चाहिए। कितनी अजीब बात है कि आज आतंकवाद की सबसे ज्यादा मार पाकिस्तान को ही पड़ रही है, लेकिन वो अपनी आतंकवाद की नीति को छोड़ने को तैयार नहीं है। ये बात तो दोनों देशों के पत्र लिखने वाले भी जानते हैं लेकिन वो चाहते हैं कि भारत संबंध सुधारे। सवाल यह है कि क्या भारत ने संबंध बिगाड़े हैं जो उसे पत्र लिखा गया है। क्या पत्र लिखने वाले मानते हैं कि दोनों देशों के सम्बंध बिगड़ने के लिए दोनों देश बराबर के जिम्मेदार हैं।

वास्तव में पत्र लिखने वाले समस्या का समाधान चाहते हैं लेकिन समस्या क्या है उसे नहीं जानते। दूसरे शब्दों में कहें तो जानते सब कुछ हैं, लेकिन बोलना नहीं चाहते। जब तक पाकिस्तान की सच्चाई सामने नहीं लाई जाती, तब तक ऐसे पत्र लिखने का कोई फायदा नहीं है। आप पीड़ित और पीड़क को  एक पलड़े में नहीं रख सकते। भारत को पत्र लिखने से पहले उन्हें पाकिस्तान को अपनी नीतियों में सुधार लाने के लिए पत्र लिखना चाहिए था। अगर पाकिस्तान सुधर जाता है तो भारत आगे बढ़कर पाकिस्तान का हाथ थाम लेगा लेकिन पाकिस्तान के सुधरने की उम्मीद नहीं की जा सकती।