आरक्षण क्यों और किसे

यूं तो भारत का संविधान जाति, धर्म, लिंग, भाषा के आधार पर किसी भी वर्ग में भेद नहीं करता। लेकिन आज वो सब कुछ हो रहा है जो नही होना चाहिये मसलन जाति, धर्म लिंग भाषा के आधार पर ही हमारे चतुर नेता आदमी-आदमी के बीच महिला-महिला के बीच खाई बढ़ाने की पुरजोर कोशिश में दिन रात जुटे हुए हैं। फिर बात चाहे दंगे भड़काने के आरोपों की हो, चुनाव में टिकिट बांटने की हो, या आरक्षण की हो। संविधान निर्माण बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने सपने में भी नहीं सोचा होगा जिन दबे कुचले लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए जो 10 वर्ष का संकल्प लिया था उसे आजीवन जारी रख भविष्य में लोग इसी के इर्द-गिर्द राजनीति करेंगे।

यूं तो सुप्रीम कोर्ट नौकरियों पदोन्नति में आरक्षण को ले एवं तय सीमा से ज्यादा आरक्षण को लें समय-समय पर राज्य सरकारों को हिदायत देता रहा है एवं आरक्षण के पुनः रिव्यू की बात कह चुका है ताकि केवल जरूरतमदों को इसका न केवल वास्तविक लाभ मिल सके बल्कि नेक नियत की मंशा भी पूरी हो स्वतंत्रता के पश्चात् आरक्षण बढ़ा ही है जबकि समय-समय पर परीक्षण कर इसको कम करना चाहिए था।

हाल ही में जाट समुदाय के लोगों के आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द करते हुए जाति आधारित आरक्षण ही मूलतः गलत है यदि केाई एक गलती लंबे समय से चलती आ रही इसका मतलब ये कतई नहीं है कि अब इसे नहीं सुधारा जा सकता।

आज आरक्षण एक प्रिव्लेज है जो आरक्षण की मलाई खा रहे हैं वे इस दायरे से निकलना नहीं चाहते और जो इस दायरे में नहीं आते वे केवल इससे जुड़ने के लिए गृहयुद्ध की स्थिति को निर्मित करने पर उतारू है।

आज आरक्षण प्राप्त एक अभिजात्य वर्ग है जिसमें सांसद, विधायक, आई.ए.एस. प्रोफेसर, इंजीनियर, डाॅक्टर एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की लम्बी फौज है जो तीन पीढ़ियों से इस पर अपना हक जमाए बैठा है। 8 अगस्त 1930 को शोषित वर्ग के सम्मेलन में डाॅ. अम्बेडकर ने कहा था ‘‘हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा और स्वयं राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्या का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज में उनका उचित स्थान पाने में निहित हैं उनको अपना बुरा रहने का बुरा तरीका बदलना होगा, उनको शिक्षित होना चाहिए।’’

बाबा साहेब ने इस वर्ग के लोगों को शिक्षित होने पर ज्यदा जौर दिया वनस्पत थ्योरी के सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले से फिर एक नई बहस सी छिड़ गई है। मसलन आरक्षण क्यों? किसे, कैसे? कब तक जातिगत आरक्षण के जगह जाति रहित आरक्षण कैसे हो, इस पर विधायिका को जाति धर्म, वर्ग से ऊपर उठ सोचना चाहिए।

केवल जाति कैसे आरक्षण का आधार हो सकती हैं? पिछड़ापन क्या जातिगत हैं? आज आरक्षण को ले सामान्य वर्ग अर्थात् खुला संवर्ग क्या इन्हें भारत में जीने का अधिकार नहीं हैं? क्या ये भारत के नागरिक नहीं हैं? क्या इनके हितों की रक्षा सरकार का दायित्व नहीं हैं? क्या वर्ग संघर्ष का सरकार इंतजार कर रही हंै? फिर क्यों नहीं जाति रहित आरक्षण पर सभी नेता राजनीतिक पाटियों में एका होता?

आज मायावती, पासवान, मुलायम सिंह यादव जैसे अन्य समृद्ध शक्तिशाली किस मायने में अन्य से कम है। इन जैसे लोग जो शक्तिशाली हैं, क्यों नहीं जाति रहित आरक्षण की आवाज बुलन्द करते?

निःसंदेह आज जाति आधारित आरक्षण समाज में द्वेष फैलाने का ही कार्य कर रहा है। यह स्थिति एवं परिस्थिति न तो समाज के लिए शुभ है और न ही सरकारों के लिए। होना तो यह चाहिए गरीब, वास्तविक पिछड़े दलित लोगों को शिक्षा फ्री कर देना चाहिए ताकि बाबा भीमराव अम्बेडकर की मंशा के अनुरूप ये शिक्षित हो न कि केवल आरक्षण की वैशाखी हो। इसमें सभी माननीय सांसद, विधायक, बुद्धजीवियों को मिलकर एक मुहीम चला। संविधान में आवश्यक संशोधन कर स्वस्थ्य जाति रहित समाज के निर्माण में महति भूमिका निभानी होगी।

-डाॅ. शशि तिवारी

(लेखिका सूचना मंत्र की संपादक हेैं)

8 COMMENTS

  1. इसमे लिखी बातें काफी हद तक सही नही है। संविधान में ये कही नही लिखा है कि नियोजन में आरक्षण केवल 10 वर्षो के लिए दिया गया था।आप जिस 10 वर्ष की बात कर रही हैं वो लोक या विधान सभा के चुनाव के लिए दिए गए थे ना कि नियोजन के लिए……

  2. सवर्णों का तर्क है कि आरक्षण खत्म होना चाहिए क्योकि पिछड़ों ने अपनी प्रगति सुनिश्चित कर ली है । लेकिन जनगणना और तमाम सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट है कि जिस गति से उनका सामाजिक पिछड़ापन दूर करके उन्हें मुख्य धारा में शामिल करना था , वह आजादी के छः दशकों में भी न हो सका । किन्तु फिर भी यदि सरकार आरक्षण से छेड़खानी कर अभिजातों/संभ्रांतों को लाभान्वित करना चाहती है तो उसे कुछ सुझाव मानने होंगे । इन सुझावों में, मैं दावा करता हूँ कि जाति/ वर्ग संघर्ष समाप्त हो जाएगा । बस सरकार इन सुझावों को लागू करने के प्रबंध करे –
    सभी निजी शिक्षण संस्थानों को समाप्त कर , सबकी शिक्षा ( कोई भी वर्ग हो ) को सरकारी संस्थानों में पूर्ण करना सुनिश्चित करें ।
    सभी सरकारी शिक्षण संस्थानों को आवासीय बनाया जाय ( जिससे हर बालक को पढ़ने के समान अवसर के साथ साथ संसाधन भी एक ही जैसे मिल सके ) ।
    दलितों/गरीब छात्रो को स्कॉलरशिप की व्यवस्था की जाय । इसका आधार आर्थिक होगा ।
    ऐसे संस्थानों के सभी विद्यार्थी अपना सरनेम अपने पिता के नाम का पहला भाग लगाएंगे ।
    ऐसे छात्र स्वस्थ प्रतिष्पर्धा के लिए तैयार रहेंगे ।
    इस दौड़ में जो अव्वल होगा… वही होगा सिकंदर । फिर न कोई अभिजात होने की वजह से खुद को वंचित पायेगा और नही पिछड़ा या दलित होने की वजह से।

    मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इन अनुशंसाओं ( Recommendations ) का विरोध करने वाले सबसे ज्यादा अभिजात ही होंगे । जो तमाम मौलिक अधिकारो और स्वतंत्रता की दुहाई देकर इन्हें लागू करने से रोकेंगे । पहले जातिवाद समाप्त करें, दावा है मेरा आरक्षण खत्म करने की पहल पिछड़े/दलित ही करेंगे। अगर आप सहमत हैं तो लाइक करें और शेयर करना न भूलें ।

  3. आरक्षण क्यों होना चाहिए ? यदि नहीं तो क्या होगा उचित उपाय ?

    आरक्षण पिछडो के लिए जरूरी ? आरक्षण का आधार सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक पिछड़ापन क्यों कहा ?

    आरक्षण हटे तो सरकार को क्या करने होंगे प्रबंध ? इन्ही मुद्दों पर एक समग्र चिंतन ।
    आरक्षण : एक स्वस्थ समाज का आधार ?

    मैं शुरुवात करता हूँ – “ सुप्रीम कोर्ट के तमाम उन वक्तयों से जिनमें माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का आधार सामाजिक पिछड़ापन है , इसे आर्थिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता है । “
    सुप्रीम कोर्ट के इस प्रकार के वक्तयों से क्या सभी सामाजिक वर्ग संतुष्ट हैं / हो सकते हैं ? जवाब स्पष्ट और सरल है – बिलकुल नहीं । समाज की किसी भी व्यवस्था में हर वर्ग सन्तुष्ट नहीं रहता है । इसके पीछे के कारणों में मुख्यतः वैयक्तिक भिन्नता , वैचारिक वैविध्य और निजी स्वार्थ ( मनुष्य का स्वार्थी होना उसकी प्रकृति है ) हैं । इसको और अधिक सरल तरीके से कहूँ तो –
    आरक्षण समर्थक गुट में अधिकांशतः वही जनसमूह हैं जो इससे लाभान्वित हो रहें हैं ।
    आरक्षण विरोधी गुट में अधिकांशतः वहीं जनसमूह हैं जो इससे लाभान्वित नहीं हो रहे या औरों का लाभान्वित होना इनसे देखा नहीं जा रहा ।
    तो इन आधारों पर , वर्तमान में समाज मुख्यतः दो वर्गो में विभाजित होता जा रहा है – आरक्षण समर्थक गुट व आरक्षण विरोधी गुट । और आये दिन इन वर्गों में परस्पर संघर्ष होता भी दिखता है । संघर्ष विविध रूपों में हो रहा है – स्वस्थ एवं तार्किक बहस , पान की दूकान पर बहस , नाइ की दुकान पर बहस , अस्पतालों में बहस , शिक्षण संस्थाओं में बहस , संसद / विधानमण्डल में बहस और अदालतों में बहस । अंत की अदालती बहस सर्वोपरि है जो संविधान के मूल ढाँचे ( मूल भावना ) को बड़ी ही निष्ठा से सहेजकर लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना साकार करता है ।
    वर्तमान में जो सर्वाधिक ज्वलंत मुद्दा बन गया है – वह है कि “ आरक्षण का आधार आर्थिक ” बनाया जाय । सवर्णों का तर्क है कि गरीबी कहीं भी डेरा डाल सकती है और सवर्ण भी गरीब होते है । गरीबी सम्बन्धी तर्क सर्वथा उचित है । गरीबी हर वर्ग/ परिवार को प्रभावित कर सकती है । गरीब व्यक्ति के लिए जीवन- पालना बड़ा बोझिल हो सकता है ।
    लेकिन ये बोझ तब और अधिक हो जाता है जब गरीबी के साथ- साथ समाजिक ढांचा और वर्ग- विभाजन ( वर्ग विभाजन का आधार जाति, धर्म , वंश , नस्ल इत्यादि कुछ भी हो ) भी जीविका में दखलंदाज़ी करने लगते हैं । आये दिन समाज में अनेक ऐसे उदाहरण मिल ही जाते हैं जहां सामाजिक ढाँचे की चोट से हारकर व्यक्ति गलत कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाता है ।
    शायद इसी रुग्णता ( सामाजिक ढांचा ) को बाबा साहब ने बहुत ही करीब से देखा । इसीलिये बाबा साहब अम्बेडकर ( जिन्हें कुछ अल्पज्ञ संविधान के लेखक कहते हैं , बताना चाहूँगा कि संविधान निर्माण की एक समिति-प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे बाबा साहब ) ने अपना सम्पूर्ण जीवन इस सामाजिक रुग्णता को दूर करने में न्योछावर कर दिया । अपने स्वस्थ तर्कों के माध्यम से उन्होंने संविधान सभा ( जिसमे अधिकाँश सवर्ण बुद्धिजीवी ही थे ) को इस बुराई का अंत करनें के लिए राजी कर लिया ।
    इसी कारण से आरक्षण की एक व्यवस्था का जन्म हुआ और इसका आधार सामाजिक पिछड़ापन (सामाजिक ढाँचे की रुग्णता ) दिया गया । जो कि संविधान की मूल भावना में व्याप्त है । इसी मूल भावना को आधार बनाकर माननीय सुप्रीम कोर्ट ( जहां कोई भी अनुसूचित जाति/ जनजाति का जज है ही नहीं । यदि हैं तो संख्या एक या दो से अधिक नही होगी ) समय समय पर अपनी प्रतिक्रिया देता रहता है । सामाजिक ढांचा कैसे हमें प्रभावित करता है ?
    एक रेखाचित्र के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ । एक सवर्ण ( क्षत्रिय ) और दलित ( उदाहरण के लिए ‘ चमार ’ जाति का व्यक्ति ) , दोनों ही बेहद गरीब और किसान है और मुश्किल से अपने परिवार का भरण- पोषण कर पा रहे हैं । उन्हें मदद की जरुरत पड़ गयी और एक अन्य क्षत्रिय से मदद की गुहार लगानें जाना पड़ा । दोनों के साथ इस तीसरे क्षत्रिय के व्यवहार में बड़ी भिन्नता आती है । यह क्षत्रिय गरीब क्षत्रिय को भी सम्मान पूर्वक बैठाता है और समस्या पूछता है और जहां तक सम्भव होगा मदद का आश्वाशन देता है । किन्तु वहीं चमार जाति के व्यक्ति को बैठने के लिए भी नहीं कहता , बैठना तो दूर घर के बाहर ही मिलने के लिए कहता है और पीठ पीछे कुछ ऐसे कहते हैं । इसके विपरीत यदि कोई अभिजात/सम्भ्रांत भी दलित के पास जाकर उससे मदद की गुहार करता तो वह उसके घर नहीं जाता बल्कि उसे घर से बाहर बुलाकर उससे अपने मुद्दे की बात करता है और दलित द्वारा चाय/पानी पूछे जाने पर इंकार कर देता है या किसी बहाने टाल देता है । तो कहाँ हटा जाति का दिली निवास , जाति तो अभिजातों के दिल मे

  4. आपका नजरिया- आरक्षण क्या है? और क्यों जरूरी है?

    आरक्षण व्यवस्था भारतीय इतिहास के लिए कोई नई बात नहीं है। यह इस देश में तब से है जब आर्यों ने इस देश पर अपना शासन स्थापित किया और इस देश के मूल निवासी बहुसंख्यक लोगों पर वर्ण व्यवस्था लागू की। अतः भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था प्रारम्भ से ही विवाद का विषय रही है। देश की 15 प्रतिशत प्रभुसत्ता ब्राह्मण, 3.5 प्रतिशत क्षत्रिय, 5.56 प्रतिशत, वैश्य 6 प्रतिशत समाज ने यहां के 85 प्रतिशत आदिवासी मूल निवासी बहुजन समाज को जातीय भेदभाव का शिकार बनाकर सभी संसाधनों से वंचित समाज को पशुओं से भी बदतर जीवन जीने पर मजबूर कर दिया जो शैक्षिक व साामाजिक क्षेत्र में आज भी बरकरार है।

    1932 में हुए पूना पैक्ट के बाद अस्पृश्य जातियों की पहचान कर उनकी एक अनुसूची बनायी जिसके कारण वह अस्पृश्य वर्ग अनुसूचित जाति(341) और आदिवासी वर्ग अनुसूचित जनजाति(342) बना। पूना पैक्ट के आधार पर विधायिका में 1935 के भारत सरकार अधिनियम से लागू हो गया और यही पूना पैक्ट संविधान बनाते समय सरकारी नौकरियों में आरक्षण का आधार बना। धर्म जाति या नस्ल के आधार पर शोषित व शासित मूल निवासी बहुजन समाज तथाकथित वंचित समाज को सामाजिक न्याय स्थापित करने के लिए भारतीय संविधान में अपनायी गयी नीति को ही आरक्षण व्यवस्था कहा जाता है, तो अमेरिका, न्यूजीलैण्ड कनाडा जैसे विकसित देशों में यह नीति ‘अफरमेटिव एक्शन’(Affirmative Action) या डाइवर्सिटी के नाम से जानी जाती है। इन्द्रा साहनी वाले मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा ‘‘आरक्षण नीति का उद्देश्य केवल गरीबी दूर करना नहीं बल्कि आरक्षित वर्ग की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना है।’’(ए आई आर 1993 एस सी 477: (1992) 3 एस सी सी 217, पैरा 492) शिक्षा प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करना सरकार का दायित्व है। संविधान के अनुच्छेद 41 से 45 में नीति निर्देशक सिद्धान्तों में शामिल की गयी चूंकि ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले लोग जिनकी सत्ता में- प्रमुखता रही है जिसके कारण देश में प्रारम्भ से ही प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में दोहरी शिक्षा नीति लागू कर दी। जिसका परिणाम है कि मूल निवासी बहुजनों के 80 प्रतिशत बच्चे खस्ताहाल सरकारी स्कूलों में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करते हैं। जबकि अन्य बच्चे जो उच्च वर्गीय हैं या जिनकी देश में प्रभुसत्ता रही है। वे विदेशों में या महंगे स्कूलों (अंग्रेजी माध्यमों) में शिक्षा ग्रहण करते हैं। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 15 से 15(4), 16(4), 16(4)ए, 16(4)बी की व्यवस्था की ही इसीलिए गयी थी कि जिससे यदि राज्य सरकार देश के सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए कोई कार्य करती है तो उसे समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन के आधार पर चुनौती न दी जा सके। संविधान के अनुच्छेद 15 में सामाजिक बराबरी तथा अनुच्छेद 16 में राज्याधीन नौकरियों के संबंध में कहा गया है। आरक्षण विरोधी जानबूझकर अनुच्छेद 334 द्वारा प्रदत्त राजनैतिक आरक्षण से संबंधित 10 वर्ष की अवधि को रोजगार व शैक्षिक संस्थानों में अनुच्छेद 15(4) व 16(4) द्वारा प्रदत्त आरक्षण से जोड़ देते हैं। ताकि समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सके जबकि आज भी सरकारी नौकरियों में प्रथम श्रेणी में 12 प्रतिशत द्वितीय श्रेणी में 14 प्रतिशत तथा तृतीय श्रेणी में 17 प्रतिशत पद रिक्त पड़े हैं। क्योंकि इन पदों की भर्तियों पर आर्थिक, शैक्षिक (मेरिट) नामक प्रश्नचिह्न लगा होता है। इसके विपरीत न्यायपालिका (सर्वोच्च) निजी संस्थानों जिन्हें सरकार से सहायता प्राप्त है, में आरक्षण का प्रावधान ही नहीं है। परिणाम यह कि मूल निवासी बहुजनों को समता बंधुता, स्वतंत्रता एवं न्याय आज भी प्राप्त नहीं है। शिक्षा से समस्याओं का समाधान सम्भव है जबकि समान शिक्षा के लिए किसी भी वर्ग द्वारा कोई आंदोलन नहीं है। आज के परिवेश में (चुनावी दौर में) सभी राजनैतिक दल लुभावने विज्ञापन जैसे गरीबी मिटाओ, जातिवाद मिटाओ, नौकरियों में भर्ती, अच्छी शिक्षा की खूब बातें करते हैं। परन्तु शायद वे यह भूल जाते हैं कि भारत से बाहर जन्मे लोग भारतीय होने का दावा करते हैं जबकि भारत में जन्म लेने वाले लोगों को अपनी नागरिकता की पहचान के लिए जूझना पड़ता है। यह गैरबराबरी का ज्वलंत उदाहरण है। प्राचीन भारत में दलितों एवं पिछड़ों को जमींदार एवं जागीरदारों पर निर्भर रहना पड़ता था जबकि आज का पूंजीवाद जिसमें शिक्षा माफिया, व्यवसाय, एलपीजी से एसईजेड तक जमींदारी प्रथा एवं जागीरदारी प्रथा का ही परिमार्जित रूप है, 10 से 12 परिवार व्यापार मण्डल के मालिक हैं। 15 प्रतिशत उच्च वर्गीय लोगों को 50 प्रतिशत आरक्षण (सुरक्षित सीटें) प्राप्त हैं। जबकि 85 प्र्रतिशत जनसंख्या के बड़े भाग को 50 प्रतिशत आरक्षण!

  5. डॉ शशि तिवारी जी का लेख पढा है , समीचीन है .

    पूना पैक्ट में, कुछ सीटें( विधान सभाओं और केंद्र स्तर पर ) आरक्षित कर देने , एवं शिक्षा के लिए धन देने की ही बात थी , अब हर स्तर पर नौकरी , प्रमोसन आदि में आरक्षण क्या और क्यों जायज़ है ?
    न्यायालय में क्रीमी लेयर की परिभाषा तय करके क्यों अब तक प्रस्तुत नहीं की गई ?
    समाज की समरसता का यथार्थ सच से आंखें नटेरना नहीं हो सकता .

    कुछ लोगों की स्वार्थ प्रेरित जो भी ओछी ज़बान है , वह क्यों और किस आधार पर है ? क्या अंदर यही सब है .दूसरों पर कीचड ( गंदगी ) उछालना बहुत आसान काम है लेकिन घटिया.

    मैंने कई जगह संरक्षा के लिए बने कानून का दुरुपयोग होते देखा है .

    अब 65 साल बाद , बदले हुए प्रसंग में इस विषय पर नए सिरे से सोचा जाए . जैसा कि सब जानते हैं कि केवल परिवर्तन ही स्थाई होता है ,

  6. चिरजीवी आरक्षण समाज को पंगु बना देता है।
    उस समाजका भाग्य स्वयं गढने का स्वातंत्र्य छीन लेता है।
    उसका साहस नष्ट करता है।
    परावलम्बिता के कारण उसको सम्मानित होने में भी बाधा बनता है।
    आरक्षण कुछ समय के लिए सहा जा सकता है।
    सदा के लिए, आरक्षण आरक्षित प्रजा को आरक्षण की गुलामी में रख कर उसका विकास अवरुद्ध करता है।
    आरक्षण दिखने में सहायता दिखता है, पर अधिकतः उससे विकास रूक जाता है।
    कुछ अपवाद अवश्य होते हैं। पर वैसे अपवाद तो पहले भी थे।

  7. आरक्षण जातिगत आधार पर होने के कारण ही असंतोष है.ऐसा नहीं यह असंतोष सामन्य आरक्षित और जो पिछड़े लेकिन अनारक्षित के बीच कम है और अब आरक्षित और आरक्षित के बीच अधिक होगा. सोचें की मीरा कुमार जी ,मायावतीजी बहिन ,सत्यनारायणजी जटिया ,रामविलास जी पासवाऔर उनकी संतानो को आरक्षण न दिया जाकर उनके ही अन्य रिश्तेदार को दिया जाय ,तो ये मानेंगे ?दूसरा आरक्षण पारिवारिक आरक्षण. यदि सिंधिया परिवार, इंदिराजी के पोते ,पोती, बहु और आदरणीय मुलायमसिंघजी के परिवार के बेटे,बहु,पोते,भाई,को पारिवारिक आधार पर आरक्षण न दिया जाय और उनसे कहा जाय की ,आप सुदूर रिशतेदार को लाये जो आपके बेटे,,पोते,पोती,बहु ,भाई, और चाचा ,चाची नहीं हो तो क्या ये मानेंगे?क्या आदरणीय प्रकाशसिंघजी बादल ,उनके परिवार के सुदूर रिश्तेदारों को पद दिए जाने से खुश होंगे?आरक्षण चाहे जातिगत हो,पारिवारिक हो ,लम्बे समय के लिए हितकर नहीं है. अति दलित अति पिछड़े ,और सुदूर वनवासी तो आज तक आरक्षण के लाभ से वंचित हैञ्ज़िन्हे आरक्षण की रेवड़ियां मिल गयी हैं वे अपने परिवारों तक ही सीमित रखे हैं. जातिगत आरक्षण चाहे ५० वर्ष और चले ,किन्तु जो इसका लाभ एक पीढ़ी में ले चुके हैं उन्हें अगली पीढ़ी में इस लाभ से वंचित किया जाना चाहिए,और इतना ही नहीं उन्हें यह कहा जाना चाहिए की आप स्वयं आपके अन्य रिश्तेदार को जो आप से सीधे जुड़े नहीं हैं उन्हें यह लाभ दिलवाएं। अन्यथा आपको दिए दिए गए लाभ निरंतर नहीं दिए जाएंगे.

  8. निःसंदेह आज जाति आधारित आरक्षण समाज में द्वेष फैलाने का ही कार्य कर रहा है पर स्वस्थ्य समाज के निर्माण लिये हर क्ष्ेत्र में समान भागीदारी के साथ समामान शिक्ष और समान सम्मान भी जरूरी है जो इस देश का मनुवदी सोच रखने वाला ब्राहमन कभी नही होने देगा !

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