डॉ. नीरज भारद्वाज
मीडिया में पिछले कई दिनों से एपस्टीन फाइल्स का नाम बहुत तेजी से चल रहा है। एपस्टीन फाइल्स नाम अपने आप में चौंका देने वाला है। लोग इसके फोटो, इसके कामकाज, शैली और इसके अंदर दिखाए जाने वाले कुकर्मों पर चर्चा कर रहे हैं। चारों तरफ भय का वातावरण बना दिया गया है। विश्व के लगभग सभी बड़े चेहरे इसमें दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों का यह काला सच है। अमेरिका और बहुत से यूरोपीय देशों में सेक्स की बात होना साधारण सी बात हो सकती है क्योंकि ओपन सेक्स और खुला व्यापार वहां की नीति का हिस्सा है लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को मारना, उनका माँस खाना, उनका यौन उत्पीड़न करना आदि इंसानियत के नाम पर काला धब्बा है।
अब चलते हैं भारतीय जीवन शैली की ओर। भारतीय जीवन शैली अध्यात्म से जुड़ी हुई है. यह आत्मा के मुक्त होने की साधना पर चलती है। यहां आवागमन के चक्कर से मुक्ति का सबसे बड़ा काम होता है। भारतीय सनातन संस्कृति की जब हम बात करते हैं तो यहां भोगवादी संस्कृति नहीं बल्कि आध्यात्मिक संस्कृति का सबसे बड़ा काम होता है। यहां पर तीज-त्यौहार, व्रत इतने हैं कि लोग उन्हीं में अपने जीवन की व्यवस्था और व्यस्तता को रखते हैं। सुयोग्य वर या वधू के लिए सोलह सोमवार का व्रत करना(भगवान शिव की आराधना करना), ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए युवा मंगलवार का व्रत करते हैं और अपने साधन तथा सिद्धि को प्राप्त करते हैं। एकादशी को कितने ही स्त्री-पुरुष व्रत करते हैं। ज्येष्ठ मास में तो निर्जला एकादशी का व्रत, जब सूर्य अपने ताप पर होता है और वहां जल के बिना जीव का रहना, कितनी बड़ी साधना का काम है। इसके साथ जब हम भारतीय संस्कृति की बात करें तो आप देखेंगे कि कृष्ण जन्माष्टमी के दिन लोग पूरे दिन पानी तक नहीं पीते और रात्रि 12:00 बजे या चंद्रमा के दिखाई देने पर ही अपने व्रत को चरणामृत तथा फल आदि खाकर खोलते हैं। इतने बड़े संकल्प सिद्धि के इस देश में भोगवादी संस्कृति कहां टिकने वाली है।
कल्पवास के समय भी प्रयागराज में लोग महीना भर अपना घर त्याग कर, व्रत कर के, बहुत से समाधि पर बैठ जाते हैं। बहुत से कल्पवास में एक ही प्रकार का भोजन करते हैं। यह सब पारिवारिक लोग हैं जो परिवार की व्यवस्था में हैं। यह व्रत और तीज-त्योहार का पालन पारिवारिक लोग ही कर रहे होते हैं। जब करवा चौथ की बात होती है तो अपने सुहाग की लंबी आयु के लिए महिलाएं पूरे दिन कुछ भी नहीं खाती, चंद्रमा को देखकर ही व्रत को खोलती हैं। छठ मईया का व्रत तो पूरी रात जल में खड़ा रहना और सूर्योदय के साथ उसको खोलना है । यह व्रत कई दिनों तक चलता है। इसके साथ और भी बहुत सारे व्रत और तीज-त्योहार जुड़े हुए हैं। वैभव लक्ष्मी का व्रत भी माताएं करती हैं। संतोषी मां का भी व्रत करती हैं। बृहस्पतिवार अर्थात गुरुवार का व्रत भी करते हैं यानी कि भारतीय संस्कृति में व्रत की महिमा है। खाने-पीने या भोग की प्रवृत्ति न होकर अन्न-जल और विषय वस्तुओं को त्याग कर एक साधारण जीवन जीने की बहुत बड़ी सार्थकता है। आंकड़े बताते हैं कि सन 2025 प्रयागराज के महाकुंभ में लगभग साठ करोड़ लोगों ने स्नान किया।
यह सारी बातें जो हो रही हैं, यह सब पारिवारिक लोगों के साथ जुड़ी हुई हैं जबकि संत समाज की यदि हम बात करें तो वह ज्ञान का प्रकाश पुंज हैं। अध्यात्म, दर्शन, भक्ति, योग, साधना आदि के सच्चे साधक सभी साधु, संत, महात्माओं को सादर प्रणाम। यह हम सब सामान्य लोगों को दिव्य ज्ञान देते हैं। संत हम सब लोगों को इस भौतिक या भोगवादी युग से दूर ले जाकर आध्यात्मिक चिंतन की ओर जोड़ते हैं। हमारे वेद, शास्त्र, पुराण, कथाएं आदि वैश्विक ज्ञान परंपरा में अग्रणीय हैं। कथाओं के अंदर त्याग ही त्याग है, आत्म शुद्धि है। आत्म शुद्धि के साथ-साथ आवागमन के चक्कर से मुक्ति है।
हम यहां भोग के लिए नहीं, बल्कि आत्म शुद्धि और कर्म प्रधान समाज में कर्म करते हुए, आवागमन के चक्र से मुक्त होना चाहते हैं जबकि इसके दूसरी ओर यदि आप यूरोपीय या अमेरिका के अन्य देशों की बात करें तो वहां पर अध्यात्मवादी नहीं बल्कि भोगवादी संस्कृति आप देखोगे, वहां सेक्स का खुलापन है। वहां कपड़े पहनना ना पहनना, एक स्त्री अनेक पुरुषों के साथ, पुरुष अनेक स्त्रियों के साथ, अपने संबंध स्थापित कर लेता हैं। ऐसे ही वहां संतान उत्पत्ति हो भी रही है। परिवार के प्रति बहुत कम लोगों का रुझान देखने को मिलता है। बहुत सारे लोग तो शादी ही नहीं करते बल्कि अपनी दैहिक भूख मिटाने के लिए बाजार का सहारा लेते हैं। सही मायनों में यही एपस्टीन फाइल्स हैं । इन देशों में देह बाजार में बिकती है, लोग उपभोग की वस्तु का मूल्य देकर सुख भोग लेते हैं।इन देशों में हर चीज बाजार है। हर वस्तु का भोग ही भोग है। मनुष्यता के नाम पर भी नर-नारी के बीच के संबंधों को ज्यादा महत्ता नहीं देते। यदि एक ऐसी फाइल्स अमेरिका और यूरोप के लोगों को लेकर खुलती है, जिसमें सेक्स के माध्यम से अलग-अलग देशों के बड़े-बड़े धनपति और उद्योगपति दिखाई देते हैं तो कोई बड़ी बात नहीं है।
दूसरी ओर शोर मच रहा है कि वहां पर कम उम्र के बच्चों के साथ यौवन शोषण हो रहा था। वह उन देशों की विडंबना है। वह किस तरीके से उन सब संबंधों को देखते-समझते रहते हैं, यह उनकी समझ है। माना कि बच्चों के साथ यौन शोषण होना किसी भी हद तक ठीक नहीं है। इन्हें सजा मिलनी चाहिए। इनकी पद, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान सभी कुछ इनसे ले लेना चाहिए। दूसरी ओर भारतीय परिवेश अर्थात सनातन संस्कृति में ऐसी चर्चाओं को करके हम क्या साबित करना चाह रहे हैं? क्या हम भी इस ओर बढ़ रहे हैं? भारतीय लोगों की प्रवृत्ति ऐसी नहीं है। अपवाद तो हर जगह मिल ही जाते हैं।
विचार करें तो जितने भी आक्रांता और आक्रमणकारी भारत में आए, उन्होंने हमारी संस्कृति को ही तो तोड़ा। हमारे आचार-विचार, सामाजिक व्यवस्थाओं को भंग किया। समाज में अस्थिरता पैदा की, अपने धर्म का प्रचार-प्रसार किया। समाज को खंड-खंड कर दिया। चारों ओर भय का वातावरण पैदा किया गया। इतना कुछ होने के बाद भी हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार,पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे अंदर जीवित रहे। यह जरूर कहा जा सकता है कि समय के प्रवाह के साथ कुछ एक अपवाद जरूर रह जाते हैं। अब कुछ एक लोग ऐसी प्रवृत्ति के यहाँ भी देखे जा सकते हैं लेकिन पूरी समाज व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न नहीं लगाया जा सकता है।
इसके साथ ही एक ओर बात भी यहां सोची-समझी जा सकती है। आज पूरा विश्व आर्थिक कमजोरी की स्थिति में फंसा हुआ है। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में उपनिवेशवाद को लेकर युद्ध हुआ, अब उपनिवेशवाद नहीं है अर्थात कोई किसी का गुलाम देश नहीं है। विश्व के बड़े देश बाजार को साधने में लगे हुए हैं। सभी अपने वर्चस्व को बचाने के लिए लगे हुए हैं। विश्व चारों तरफ युद्ध के माहौल से जूझ रहा है। इसमें यूरोपीय देश और अमेरिका यह सब वैश्विक मंदी से डर महसूस कर रहे हैं। ऐसे में विश्व का ध्यान युद्ध, डॉलर की टूटती हुई कीमतें, उद्योग और वहां के व्यापार में हो रहे घाटे को देखते हुए विश्व का ध्यान भंग करने के लिए अमेरिका और अन्य देश मिलकर ऐसी चर्चा को विश्व में जीवित करना चाह रहे हैं जिससे कि विश्व का ध्यान उन सब बातों से हट जाए। डी डॉलराइजेशन, वहां की मार्केट में क्राइसिस आना, उद्योगपतियों का उसे देश के प्रति ध्यान हटना आदि, एशियाई देशों का वर्चस्व बढ़ना, व्यापारियों का वहां खर्च करना, नए उद्योग-धंधों का शुरू करना आदि भी इन देशों को खटक रहा है। वहां डर का माहौल बना हुआ है, इस डर के माहौल से उबरने के लिए अमेरिका, उसके सहयोगी देश या वहां की सरकार ऐसे खुलासे दुनिया के सामने रख देना चाहती है। लोगों का ध्यान भंग हो जाएगा और वह यहीं उलझ कर रह जाएंगे तथा अपना काम निकालने की सोच रहे हैं जबकि यह सारी घटना या इन फाइल्स के जो भी कार्य हैं, वह बहुत साल पुराने हैं और कुछ ताजा भी हैं ।
लोग इतिहास को भूल जाते हैं. जरा इस ओर भी नजर दौड़ाकर देखेंगे तो पता चल जाएगा कि इन देशों में ऐसा सभी कुछ होता रहा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद मित्र देशों अर्थात सोवियत, अमेरिकी, ब्रिटिश और फ्रेंच की सेनाओं द्वारा जर्मनी में लगभग 400,000 “कब्जे के बच्चे” (Occupational children/Besatzungskinder) पैदा हुए थे जिन्हें अक्सर उस समय नाजायज या “युद्ध के बच्चे” माना जाता था। इन बच्चों के पिता विदेशी सैनिक थे और इनमें से लगभग 3 लाख बच्चे केवल सोवियत संघ की रेड आर्मी से संबंधित थे। ऐसी कितनी ही घटनाएं गिनाई जा सकती हैं। इसे आप क्या कहेंगे? इन देशों का वास्तविक चेहरा यही है. निर्णय आपको लेना है।
डॉ. नीरज भारद्वाज