कमलेश पांडेय
भारत की बढ़ती परमाणु शक्ति से दुनिया में व्यापक भय कम और रणनीतिक सतर्कता अधिक है, क्योंकि भारत की सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक ताकत जितनी बढ़ेगी, उसकी परमाणु क्षमताओं पर वैश्विक चर्चा और निगरानी भी उतनी ही बढ़ेगी। भारत आज उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनकी सामरिक शक्ति वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
दरअसल, SIPRI 2026 रिपोर्ट का संदेश यह है कि भारत की परमाणु शक्ति में वृद्धि संख्या के स्तर पर सीमित है, लेकिन उसकी गुणवत्ता, तैनाती और परिचालन क्षमता में हो रहे बदलाव कहीं अधिक महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। ताज़ा Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI) रिपोर्ट के अनुसार भारत की परमाणु क्षमता में क्रमिक लेकिन महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। SIPRI Yearbook 2026 के अनुसार भारत की परमाणु क्षमता में लगातार वृद्धि और आधुनिकीकरण जारी है।
# रिपोर्ट के कुछ प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं:-
पहला, भारत के परमाणु वारहेड (nuclear warheads) का अनुमानित भंडार जनवरी 2026 तक बढ़कर 190 हो गया है, जो पिछले वर्ष लगभग 180 था।
दूसरा, SIPRI ने पहली बार आकलन किया है कि भारत के लगभग 12 परमाणु वारहेड “तैनात” (deployed) अवस्था में हैं। पहले भारत आमतौर पर वारहेड और डिलीवरी सिस्टम (मिसाइल/विमान) को अलग-अलग रखता था।
तीसरा, भारत का परमाणु आधुनिकीकरण अब अधिकाधिक China तक पहुंच रखने वाली लंबी दूरी की मिसाइलों, समुद्री प्रतिरोधक क्षमता (sea-based deterrence) और नई डिलीवरी प्रणालियों पर केंद्रित है।
चौथा, भारत का परमाणु आधुनिकीकरण अब अधिकाधिक लंबी दूरी की उन प्रणालियों पर केंद्रित है जो पूरे China तक पहुंचने में सक्षम हों। भारत की रणनीतिक योजना में Pakistan के साथ पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता अभी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन चीन को ध्यान में रखकर भी क्षमताओं का विस्तार किया जा रहा है।
पांचवां, भारत की परमाणु त्रिस्तरीय क्षमता (भूमि, वायु और समुद्र आधारित प्रतिरोधक शक्ति) परिपक्व हो रही है और समुद्र-आधारित प्रतिरोधक क्षमता को विशेष महत्व दिया जा रहा है।
# SIPRI की रिपोर्ट में भारत-पाकिस्तान-चीन तुलना इस प्रकार है- देश/अनुमानित परमाणु वारहेड (जनवरी 2026)- China- लगभग 620, India- लगभग 190 और
Pakistan- लगभग 170.
# समझिए, आखिर दुनिया क्यों ध्यान दे रही है?
SIPRI का कहना है कि भारत उन देशों में शामिल है जो अपने परमाणु शस्त्रागार का आधुनिकीकरण कर रहे हैं। विशेष चिंता इस बात को लेकर है कि वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की भूमिका फिर बढ़ रही है और कई देश अधिक परिचालन-तत्पर (operationally ready)
परमाणु बल विकसित कर रहे हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत केवल वारहेड की संख्या नहीं बढ़ा रहा, बल्कि नई मिसाइल प्रणालियां, लंबी दूरी की क्षमताएं, MIRV तकनीक तथा समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर रहा है। इससे भारत की “द्वितीय प्रहार क्षमता” (Second Strike Capability) और अधिक मजबूत होती है।
# सवाल: क्या यह चिंता भारत-विरोधी है?
आवश्यक नहीं, क्योंकि भारत को अक्सर एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में देखा जाता है, जिसने अपेक्षाकृत संयमित परमाणु नीति अपनाई है। फिर भी, क्योंकि परमाणु हथियारों का प्रभाव वैश्विक होता है, इसलिए भारत की बढ़ती क्षमता को लेकर दुनिया में स्वाभाविक रूप से रणनीतिक विश्लेषण, निगरानी और सतर्कता बनी रहती है।
# यक्ष प्रश्न: क्या दुनिया वास्तव में भारत से डरती है?
अधिकांश पश्चिमी देशों और रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का परमाणु कार्यक्रम मुख्यतः “विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध” (Credible Minimum Deterrence) और “पहले उपयोग नहीं” (No First Use) जैसे सिद्धांतों पर आधारित रहा है। इसलिए भारत को आमतौर पर एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में देखा जाता है। हालांकि उसके पड़ोसी देशों और कुछ रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए उसकी बढ़ती क्षमता चिंता का विषय हो सकती है।
# जानिए इसके राजनीतिक और सामरिक मायने
पहला, भारत अब केवल दक्षिण एशिया की नहीं, बल्कि व्यापक एशियाई शक्ति-संतुलन की गणना में शामिल हो चुका है। China और Pakistan दोनों को ध्यान में रखकर भारत अपनी प्रतिरोधक क्षमता को उन्नत कर रहा है। एशिया में चीन, भारत और पाकिस्तान के बीच सामरिक संतुलन आने वाले वर्षों में वैश्विक सुरक्षा विमर्श का प्रमुख विषय बना रह सकता है।
दूसरा, भारत की “विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध” (Credible Minimum Deterrence) नीति बरकरार है, लेकिन परिचालन तत्परता (operational readiness) बढ़ने के संकेतों ने वैश्विक रणनीतिक समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। इस प्रकार से भारत अब केवल न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता अधिक विश्वसनीय और त्वरित प्रतिक्रिया योग्य बन रही है।
तीसरा, समुद्र-आधारित परमाणु क्षमता और लंबी दूरी की मिसाइलों के कारण भारत की “दूसरे प्रहार” (second-strike) की क्षमता मजबूत हो रही है।
चौथा, ताज़ा SIPRI रिपोर्ट भारत को एक ऐसी परमाणु शक्ति के रूप में देखती है जो संख्या की दृष्टि से धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उसकी परमाणु क्षमता पहले की तुलना में अधिक आधुनिक, तैनात और परिचालन रूप से सक्षम होती जा रही है।
# आखिर क्यों भारत की परमाणविक क्षमता को लेकर दुनिया में सतर्कता और रणनीतिक चिंता दिखाई देती है?
भारत की परमाणविक क्षमता को लेकर दुनिया में जो सतर्कता और रणनीतिक चिंता दिखाई देती है, उसके पीछे कई भू-राजनीतिक और सामरिक कारण हैं। यह चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं है; किसी भी परमाणु शक्ति के बारे में वैश्विक समुदाय इसी प्रकार सतर्क रहता है।
एक, एशिया में बदलता शक्ति-संतुलन: भारत आज एशिया की प्रमुख शक्तियों में से एक है। उसकी बढ़ती सैन्य और आर्थिक क्षमता का प्रभाव सीधे China, Pakistan और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर पड़ता है। इसलिए भारत की परमाणु शक्ति में हर वृद्धि क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित करती है।
दो, एशिया के दो परमाणु पड़ोसियों के साथ जटिल संबंध:
भारत की सीमाएं दो परमाणु-संपन्न देशों—China और Pakistan—से जुड़ी हैं। सीमा विवाद, आतंकवाद और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण किसी भी संकट की स्थिति में परमाणु आयाम जुड़ जाने की आशंका रणनीतिक विशेषज्ञों को चिंतित रखती है।
तीन, लंबी दूरी की मिसाइलों का विकास: भारत की उन्नत मिसाइल प्रणालियां उसकी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाती हैं। लेकिन जब कोई देश दूरस्थ लक्ष्यों तक मार करने वाली क्षमता विकसित करता है, तो अन्य देश उसके दीर्घकालिक सामरिक उद्देश्यों और शक्ति-प्रक्षेपण क्षमता का अध्ययन करने लगते हैं। भारत की Agni-V और उससे आगे विकसित हो रही मिसाइल प्रणालियां एशिया के बड़े हिस्से तक पहुंचने में सक्षम हैं। इससे भारत की प्रतिरोधक (deterrence) क्षमता बढ़ी है, जो वैश्विक रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित करती है।
चार, हिंद महासागर का बढ़ता महत्व: भारत की समुद्री परमाणु क्षमता, विशेषकर परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती, हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करती है। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए यहां शक्ति-संतुलन में बदलाव दुनिया का ध्यान आकर्षित करता है। इससे
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बना है। भारत की बढ़ती सामरिक ताकत का सीधा प्रभाव एशिया के शक्ति-संतुलन पर पड़ता है। विशेषकर China और Pakistan भारत की सैन्य क्षमताओं पर बारीकी से नजर रखते हैं। इससे क्षेत्रीय हथियार प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका बनी रहती है।
पांच, वैश्विक शक्ति के रूप में भारत का उदय: भारत केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि एक बड़ी अर्थव्यवस्था, तकनीकी केंद्र और उभरती वैश्विक कूटनीतिक शक्ति भी है। जब किसी देश का वैश्विक प्रभाव बढ़ता है, तो उसकी परमाणु क्षमता का महत्व भी बढ़ जाता है। इसलिए प्रमुख शक्तियां भारत की रक्षा और परमाणु नीतियों पर विशेष नजर रखती हैं। अब भारत केवल परमाणु शक्ति ही नहीं, बल्कि तेजी से उभरती आर्थिक और भू-राजनीतिक शक्ति भी है। इसलिए विश्व की बड़ी शक्तियां भारत की सैन्य क्षमताओं को उसके बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के संदर्भ में देखती हैं।
छह, संकट प्रबंधन की चुनौती: दुनिया की चिंता का एक कारण यह भी है कि परमाणु हथियारों से लैस देशों के बीच किसी भी सैन्य टकराव का प्रभाव सीमाओं से बहुत आगे तक जा सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहता है कि सभी परमाणु शक्तियां संयम, संवाद और विश्वसनीय कमान-नियंत्रण व्यवस्था बनाए रखें।
सात, परमाणु हथियारों के प्रसार को लेकर चिंता:दुनिया के अधिकांश देश चाहते हैं कि परमाणु हथियारों की संख्या और भूमिका सीमित रहे। किसी भी देश की बढ़ती परमाणु क्षमता को इसलिए भी सावधानी से देखा जाता है ताकि वैश्विक हथियार नियंत्रण व्यवस्था पर उसका प्रभाव समझा जा सके।
आठ, भारत की बढ़ती सैन्य-तकनीकी क्षमता: भारत ने पिछले दो दशकों में अपनी परमाणु त्रिस्तरीय क्षमता (Nuclear Triad) को मजबूत किया है। यानी भारत अब भूमि, वायु और समुद्र—तीनों माध्यमों से परमाणु हथियार दागने की क्षमता रखता है। इसमें INS Arihant जैसी परमाणु पनडुब्बियों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
यही वजह है कि भारत की परमाणु शक्ति को लेकर दुनियावी सतर्कता का सबसे बड़ा कारण भय नहीं, बल्कि यह तथ्य है कि भारत अब वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने वाली प्रमुख शक्तियों में शामिल हो चुका है। जितना बड़ा देश का सामरिक प्रभाव होगा, उतनी ही अधिक उसकी क्षमताओं, नीतियों और निर्णयों पर अंतरराष्ट्रीय नजर रहेगी। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार भी बताते हैं कि भारत की बढ़ती परमाणु क्षमताओं को लेकर दुनिया का दृष्टिकोण पूरी तरह “घबराहट” का नहीं, बल्कि “सतर्कता और रणनीतिक चिंता” का है।
कमलेश पांडेय