राजेश श्रीवास्तव
भारत ने 27 जनवरी को यूरोपीय यूनियन के साथ एफटीए अनाउंस कर दिया। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय यूनियन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर ने इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है। ईयू 27 देशों का ग्रुप और दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक ब्लॉक है। वहीं भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है। दोनों के साथ आने से 2०० करोड़ लोगों का मार्केट बनेगा। साथ ही दुनिया की 25% जीडीपी कवर होगी। भारत-ईयू ने पिछले साल 12.5 लाख करोड़ रुपए का ट्रेड किया। एफटीए आने से भारत की बर्लिन, रोम, म्यूनिख जैसे यूरोपीय बाजारों में और यूरोप की दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे भारतीय बाजारों में पहुंच बन जाएगी। अनुमान है कि एफटीए होने से भारत-ईयू का व्यापार जल्द ही दोगुना हो जाएगा। मौजूदा वैश्विक उठापटक के बीच दुनिया अमेरिका और चीन का ऑप्शन खोज रही हैं। भारत-ईयूू के बीच ये डील होने से ग्लोबल सप्लाई चेन का चेहरा बदल जाएगा। उम्मीद है कि चीन की जगह भारत तेजी से प्रोडक्शन हब बनेगा। ईयू से ट्रेड बढ़ेगा और ट्रम्प के टैरिफ को मात दी जाएगी।
भारत और यूरोपियन यूनियन (ईयूु) ने मंगलवार को मदर ऑफ ऑल डील्स की घोषणा की है। इस समझौते पर दुनिया की नजर है लेकिन खासतौर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह पसंद नहीं आएगा। इसकी वजह ट्रंप प्रशासन की हालिया महीनों में भारत और यूरोप पर दबाव बनाने की कोशिश की है, जिसमें उन्होंने व्यापार को हथियार बनाया। ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रंप ने लगातार यूरोप को धमकियां दी हैं तो भारत को 5० फीसदी टैरिफ लगाकर दबाने की कोशिश है। इन दोनों दोनों पक्षों ने अब एक-दूसरे के साथ बड़ा समझौता किया है। डोनाल्ड ट्रंप जिन दो ताकतों यानी भारत और यूरोप को किनारे लगाने की कोशिश में थे, उनके बीच महत्वपूर्ण ट्रेड डील साइन होना निश्चित रूप से उन्हें चुभेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति इसे खुली चुनौती के तौर पर देखेंगे क्योंकि भारत-अमेरिका की ट्रेड डील अटकी हुई है। दूसरी ओर ईयू ने भी अमेरिका के साथ अपनी ट्रेड डील की मंजूरी रोक दी है। ईयू और भारत ने एक तरह से ट्रंप के दबाव में ना झुकते हुए चुनौती देने का काम किया है। पिछले साल नाटो चीफ ने डोनाल्ड ट्रंप को ‘डैडी’ उपनाम दिया था। इसके बाद ये यह ट्रंप को एक प्रभावशाली तानाशाह के रूप में पेश करने का शॉर्टहैंड बन गया है, जिसे विरोधियों और सहयोगियों दोनों को कंट्रोल करना पसंद है। भारत-ईयू ट्रेड डील ने ‘डैडी’ को परेशान कर दिया है। यह परेशानी उनके ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के बयान में साफ झलकती है, जिसमें उन्होंने यूरोप को धोखेबाज तक कह दिया है। इंडिया-ईयू की लंबे समय से अटकी ट्रेड डील के फाइनल होने में डोनाल्ड ट्रंप के रुख को भी कुछ एक्सपर्ट अहम मान रहे हैं। अमेरिका ने भारत पर 5०% टैरिफ लगाए, जिससे संबंधों में तनाव आया। दूसरी ओर ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिश का विरोध करने पर यूरोपीय देशों के खिलाफ भी टैरिफ का सहारा लेने की कोशिश की। इससे यूरोप में अमेरिका के खिलाफ नाराजगी बढ़ी और वह भारत के करीब आया।
दिल्ली में हुई इस ट्रेड डील से भारत ने अमेरिका को मैसेज भेजा है कि है कि वह ट्रंप की धमकियों के आगे झुकेगा नहीं। भारत ने यूके, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ जरूरी ट्रेड एग्रीमेंट करने के लिए भी तेजी से कदम उठाए हैं। इस डील के फायदे पर एक्सपर्ट का कहना है कि यह ट्रेड डील अगले साल ही लागू होगी, जो भारत और यूरोप दोनों के लिए फायदे का सौदा साबित होगी।
ईयू और भारत के करीब आने से अमेरिका के लिए कई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर छूट सकता है । अमेरिका और ईयू दुनिया के सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर है। ग्लोबल गुड्स ट्रेड में इनकी हिस्सेदारी 3०% और ग्लोबल सर्विस ट्रेड में 43% है। अभी अमेरिका ईयू का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। 2०24 में दोनों के बीच 15० लाख करोड़ से ज्यादा का व्यापार हुआ। ईयू अपना 17.3% ट्रेड अमेरिका के साथ करता है। अब ईयू के भारत से एफटीए साइन करने से अमेरिका और ईयू के व्यापार पर असर पड़ सकता है। रूस से तेल खरीदने के चलते अमेरिका ने भारत पर टैरिफ बढ़ाकर 5०% कर दिया था। इसके बाद भारत ने रूस से तेल खरीदना कम भी किया लेकिन भारत-अमेरिका के बीच कोई ट्रेड डील नहीं हो पाई। ग्लोबल थिक टैंक ओआरएफ में इकोनॉमी और ग्रोथ प्रोग्रा के डायरेक्टर सेंटर मिहिर शर्मा के मुताबिक,’ट्रम्प ताकत का सम्मान करते हैं। यूरोप और ब्राजील के ऊपर उनका दबाव काम करता है, लेकिन चीन और रूस पर यह बेअसर है। उसी तरह भारत-ईयू ट्रेड डील ईयू को यह मानने पर मजबूर करेगी कि भारत के पास ऑप्शंस हैं और वह उन पर काम भी कर सकता है।’ ओआरएफ के वाइस प्रेसिडेंट हर्ष पंत के मुताबिक, भारत-ईयू के बीच एफटीए दो बड़े इकोनॉमिक प्लेयर्स का साथ आना है। यह अमेरिका के लिए सिग्नल है कि दोनों देश अपने एजेंडा पर आगे बढ़ने को तैयार हैं। मिहिर शर्मा के मुताबिक, ‘ट्रम्प के टैरिफ की वजह से भारत और ईयू दोनों को ही काफी नुकसान हो चुका है। एफटीए की वजह से अमेरिका की अहमियत एक ट्रेड पार्टनर के रूप में कम हो सकती है। सिर्फ भारत और यूरोप ही नहीं दूसरे देश भी अब इसी तरह अमेरिका का विकल्प ढूंढ रहे हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर बीजिग 28 जनवरी को चीन यात्रा पर पहुंचे। 8 साल बाद कोई ब्रिटिश पीएम चीन की यात्रा पर गया है। उनके साथ दर्जनों ब्रिटिश बिजनेस एग्जिक्यूटिव्स भी होंगे यानी यात्रा का मकसद व्यापार ही है। बीते दिनों कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने भी ट्रम्प के टैरिफ का विरोध कर देश के लोगों से स्वदेशी सामान खरीदने की अपील की। अब वो खालिस्तान के मुद्दे पर भारत से खराब हुए रिश्तों को भी सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। मार्च में कार्नी भारत दौरे पर आएंगे। तीन दिन के दौरे पर चीन गए कीर स्टारमर ने 29 जनवरी को शी जिनपिग से मुलाकात की। अंतरराष्ट्रीय मामलों में जेएनयू के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिह कहते हैं, ‘इन घटनाओं ने ईयू को नाटो से इतर साझेदारियां तलाशने की इच्छा को और मजबूत किया है। इसलिए ईयू-इंडिया-एफटीए सिर्फ इकोनॉमिक स्ट्रेटजी तक सीमित न रहकर, अमेरिका के खिलाफ ईयू के लिए एक जियो-पॉलिटिकल इंश्योरेंस के रूप में सामने आता है।’
भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ से अमेरिका भड़का हुआ है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यूरोप के लिए यूक्रेन युद्ध से ज्यादा जरूरी ट्रेड है। वह अपने खिलाफ युद्ध को फंड कर रहा है। बेसेंट ने कहा कि इस डील से भारत को ज्यादा फायदा होगा। भारत-ईयू की डील से अमेरिका इतना परेशान क्यों है, क्या वाकई भारत को इस डील से ज्यादा फायदा होगा और ट्रम्प के टैरिफ का असर घटेगा।
जब दो या ज्यादा देश आपस में ये तय कर लेते हैं कि वे एक-दूसरे के सामान और सेवाओं पर टैक्स, पाबंदियां और रुकावटें कम या खत्म कर देंगे, तो उसे फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी एफटीए कहते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो एफटीए व्यापार का ‘टोल फ्री हाईवे’ है।
भारत ने 27 जनवरी को यूरोपीय यूनियन के साथ एफटीए अनाउंस कर दिया। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय यूनियन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर ने इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है। ईयू 27 देशों का ग्रुप और दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक ब्लॉक है। वहीं भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है। दोनों के साथ आने से 2०० करोड़ लोगों का मार्केट बनेगा। साथ ही दुनिया की 25% जीडीपी कवर होगी।
भारत-ईयू ने पिछले साल 12.5 लाख करोड़ रुपए का ट्रेड किया। एफटीए आने से भारत की बर्लिन, रोम, म्यूनिख जैसे यूरोपीय बाजारों में और यूरोप की दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे भारतीय बाजारों में पहुंच बन जाएगी। अनुमान है कि एफटीए होने से भारत-ईयू का व्यापार जल्द ही दोगुना हो जाएगा। मौजूदा वैश्विक उठापटक के बीच दुनिया अमेरिका और चीन का ऑप्शन खोज रही हैं। भारत-ईयूू के बीच ये डील होने से ग्लोबल सप्लाई चेन का चेहरा बदल जाएगा। उम्मीद है कि चीन की जगह भारत तेजी से प्रोडक्शन हब बनेगा। ईयू से ट्रेड बढ़ेगा और ट्रम्प के टैरिफ को मात दी जाएगी।
लंदन के इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की सीनियर एनालिस्ट सुमेधा दासगुप्ता के मुताबिक, ‘मौजूदा हालातों की वजह से व्यापार डगमगा रहा है। ऐसे में भारत और क्ठ को भरोसेमंद ट्रेड पार्टनर की जरूरत है। भारत अमेरिकी टैरिफ के असर को कम करना चाहता है। जबकि क्ठ चीन पर निर्भरता घटाना चाहता है, जिसे वह भरोसेमंद नहीं मानता।’
नाराज अमेरिका गुस्सा जाहिर कर रहा
भारत और ईयू के बीच ट्रेड डील होने के बाद ट्रम्प सरकार के मंत्री इस डील की आलोचना कर रहे हैं। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने यूरोप के भारत के साथ ट्रेड डील करने को निराशाजनक बताया है। उन्होंने एक अमेरिकी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा, ‘यूरोप रूस-यूक्रेन युद्ध के फ्रंटलाइन में हैं। भारत ने रूस से सैंक्शन्ड कच्चा तेल खरीदना शुरू किया और रिफाइंड करके यूरोप को बेचने लगा। यूरोप खुद ही अपने खिलाफ चल रही जंग को फंड कर रहा है।’
बेसेंट ने कहा कि हमने भारत को रूसी तेल खरीदने से रोकने के लिए 25% टैरिफ लगाया। यूरोप ने हमारा साथ देने के बजाय, भारत से जाकर ट्रेड डील कर ली। वो व्यापार को यूक्रेन के लोगों के आगे रखते हैं। अमेरिकी ट्रेड रिप्रजेंटेटिव जैमिसन ग्रीर ने कहा है कि इस डील से भारत को ज्यादा फायदा है। उन्हें यूरोप के मार्केट में अपना सामान बेचने का ज्यादा मौका मिलेगा। ग्रीर ने यह भी संभावना जताई है कि ईयू की चेयरमैन वॉन डेर लेयेन ने यूरोप में भारतीय लेबर्स के आने-जाने पर बातचीत की है।
क्या वाकई इस डील से भारत को ज्यादा फायदा होगा?
भारत ने 2०25 में यूरोप को 6.8 लाख करोड़ रुपए का सामान बेचा। वहीं ईयू से 5.5 लाख करोड़ रुपए का सामान खरीदा। यानी दोनों देशों के बीच हो रहे व्यापार में भारत के पास पहले से 1.3 लाख करोड़ रुपए की बढ़त है। इसे टेक्निकल भाषा में ट्रेड सरप्लस भी कहते हैं।
इस डील के तहत भारत ने यूरोप से आने वाले करीब 96.6% चीजों से टैरिफ पूरी तरह हटा दिया है या बहुत कम कर दिया है। ऐसे ही यूरोप ने भी भारत से आने वाले 99.5% सामान पर टैरिफ खत्म कर दिया है या घटा दिया है।
डील के बाद ईयू का भारत पर लगने वाला एवरेज टैरिफ 3.8% से घटकर ०.1% हो गया है। भारत-ईयू की ट्रेड डील से भारत के इन सेक्टर्स को सबसे ज्यादा फायदा होगा।
यूरोप में भारतीय कपड़े ज्यादा बिकेंगे
भारत के कपड़े और चमड़े पर ईयू पहले 1०% ड्यूटी लगात था। एफटीए के बाद यह खत्म हो गई है । इस डील के तहत भारत के 9०.7% निर्यात पर तुरंत ड्यूटी (टैक्स) खत्म कर दी जाएगी। इससे यूरोप में भारतीय कपड़े, जूते सस्ते होंगे और उनकी डिमांड बढ़ेगी। इससे भारत में गारमेंट्स, लेदर, फुटवियर जैसी इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को सीधा फायदा होगा। इससे खास तौर पर मेहनत पर आधारित उद्योगों को फायदा होगा।
एफटीए के बाद भारत से निर्यात होने वाले 97.5% केमिकल्स को कोई टैरिफ नहीं लगेगा। फार्मा सेक्टर में भी ड्यूटी घटा दी गई है। इस डील की वजह से फार्मास्यूटिकल्स और केमिकल्स सेक्टर में भारत को हर साल 2०-3०% के ट्रेड का फायदा हो सकता है।
रेगुलेटरी अप्रूवल आसान होने और स्टैंडर्ड एक जैसे होने से भारत में बनने वाली जेनेरिक दवाएं और स्पेशल मेडिसिन की यूरोपीय मार्केट में एंट्री आसान होगी।
भारत में लग सकती हैं यूरोप की डिफेंस फैक्ट्रियां
फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और इटली जैसे ईयू देश भारत को एडवांस्ड वेपन बेचते हैं। 2०24 में भारत का डिफेंस प्रोडक्शन डेढ़ लाख करोड़ रुपए रहा। वहीं डिफेंस एक्सपोर्ट 25 हजार करोड़ रुपए रहा।
ईयू से एफटीए होने के बाद भारत को डिफेंस सप्लायर और मैन्युफैक्चरिग पार्टनर के बनाया जा सकता है। इससे इंडियन डिफेंस इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा भारत की हथियार कंपनियों को ईयू की डिफेंस जरूरतें पूरी करने वाले सेफ फंड्स की पहुंच मिल सकती है। ऐसा होने से यूरोप में भारतीय फैक्ट्रियां लग सकती है।
भारत के चमड़ा कारीगरों का व्यापार बढ़ेगा
लेदर और फुटवेयर पर ड्यूटी 17% से घटकर ०% हो गई है। इससे भारत की पहुंच ईयू के 1०० बिलियन डॉलर के लेदर और फुटवेयर मार्केट में बढ़ेगी। आगरा, कानपुर, कोल्हापुर के कारिगरों और डिजाइनर्स को सबसे ज्यादा फायदा होगा। 27 जनवरी 2०26 को क्ठ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत-ईयू एफटीए साइन की।
इसके अलावा भारत की हर तरह की ज्वेलरी पर लगने वाली ड्यूटी खत्म या बहुत कम हो जाएगी। भारत के लोगों को यूरोपियन शराब, यूरोपियन कारें और इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स सस्ते मिलेंगे, क्योंकि इन पर लगने वाले प्रीमियम टैरिफ कम हो जाएंगे। इस डील से भारत को फायदा तो होता दिख रहा है लेकिन यह कहना कि भारत को ज्यादा फायदा होगा अभी जल्दबाजी होगी।
यूरोपियन यूनियन को डील से क्या हासिल होगा?
भारत ने ईयू से आयात होने वाली 49.6% चीजों पर तुरंत टैरिफ खत्म कर दिया है। बाकी की 39.5% चीजों पर 5 से 1० साल में टैरिफ खत्म हो जाएगा। ईयू की ट्रेड डील से यूरोपियन यूनियन के इन सेक्टर्स को सबसे ज्यादा फायदा होगा। ट्रेड डील के बाद यूरोप से भारत में आने वाली वाइन, स्पिरिट्स और अन्य एल्कोहलिक ड्रिंक्स पर टैरिफ कम होगा। उदाहरण के लिए अभी वाइन पर 15०% टैरिफ लगता है। अभी यह कम होकर 75% हो जाएगा। आगे इसे 2०% तक कम किया जाएगा। इसके घटने से भारत में ये प्रोडक्ट सस्ते होंगे। यानी भारत में डिमांड बढ़ेगी, जिससे यूरोप में ज्यादा शराब बनेगी।
भारत में यूरोपीय कारों की डिमांड बढ़ेगी
यूरोपीय कार मैन्युफैक्चरर्स, खासकर प्रीमियम सेगमेंट की कंपनियां जैसे बीएमडब्लू, मर्सिडीज, वोल्क्सवैगन, पॉर्श वगैरह को भारत में एंट्री आसानी से मिलेगी। सरकार अभी तक इन पर 11०% टैरिफ लगाती थी। अगले 5 से 1० सालों में यह घटकर 1०% रह जाएगा। रॉयटर्स के मुताबिक, भारतीय सरकार ने कुछ चुनिदा यूरोप में बनी कारों पर तुरंत टैरिफ घटाने पर सहमति जताई है। ये कारें 15,००० यूरो यानी करीब 16.3 लाख रुपए से ज्यादा कीमत की होंगी।
इसके अलावा मशीनरी पर 44%, केमिकल्स पर 22% और फार्मा सेक्टर पर 11% लगने वाला टैरिफ भी आने वाले कुछ सालों में पूरी तरह खत्म हो जाएगा। यूरोप के आईटी, इंजीनियरिग, बिजनेस सर्विसेज और टेलिकॉम जैसे हाई-वैल्यू सर्विस सेक्टर को भी भारत में ज्यादा मौके मिलेंगे। क्योंकि इन सेक्टर में दूसरे देशों के मुकाबले टैरिफ कम लगेगा।
क्या ये डील ट्रम्प के टैरिफ को बेअसर कर देगी?
ट्रम्प ने भारत के सामानों पर फिलहाल 5०% टैरिफ लगा रखा है, जो उनके सत्ता में आने से पहले 1०% से भी कम था। इससे भारत के एक्सपोर्ट पर बेहद नेगेटिव इम्पैक्ट पड़ा है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव यानी जीटीआरआई के मुताबिक, नवंबर 2०25 में भारत ने करीब 3 लाख करोड़ रूपए का सामान निर्यात किया। ये साल 2०24 से 11% कम था। सिर्फ अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में 28.5% की कमी आई। मई 2०25 में भारत ने अमेरिका को लगभग 8० हजार करोड़ रुपए का निर्यात किया था। अक्टूबर में ये घटकर 56 हजार करोड़ रुपए रह गया।
जीटीआरआई के मुताबिक, भारत से अमेरिका को होने वाला निर्यात साल 2०24-25 में 86.5 अरब डॉलर था। यह 2०25-26 में घटकर करीब 5० अरब डॉलर रह सकता है। यानी भारतीय घरेलू बाजार को 3 लाख करोड़ रूपए का नुकसान होगा।
सबसे ज्यादा असर टेक्सटाइल, ज्वेलरी, झींगा (श्रिंप) और कालीन के निर्यात पर पड़ेगा। आशंका है कि इन सेक्टरों में निर्यात करीब 7०% तक गिर जाएगा, जिससे लाखों नौकरियों पर खतरा मंडरा सकता है।
ट्रेड डील के बाद ईयू ने एक्सपोर्ट के लिए भारत की कुछ सीफूड प्रोसेसिग फैसिलिटीज को भी मंजूरी दे दी है। इससे शिपमेंट्स बढ़ सकेंगी, खासकर ऐसे समय में जब कई प्रोड्यूसर्स को ठS के टैरिफ की वजह से दबाव झेलना पड़ रहा है।
अमेरिका को होने वाले इस निर्यात पर बढ़े टैरिफ का असर जमीन पर दिखने लगा है। सूरत जैसे प्रमुख हब से आ रही रिपोर्टों के मुताबिक हीरों के उत्पादन में कटौती शुरू हो चुकी है। सूरत की हीरा पॉलिशिग इंडस्ट्री 12 लाख लोगों को रोजगार देती है।
अर्थशास्त्री शरद कोहली कहते हैं कि ट्रेड डील से भारतीय सामान चीन जितना सस्ता हो सकता है, जिससे यूरोप में इसकी डिमांड बढ़ेगी। ट्रंप के टैरिफ की वजह से भारत को हीरों और जेम्स में जो नुकसान हुआ है, यूरोप से उसकी भरपाई हो सकती है। हालांकि, पूरी भरपाई के बारे में कहना संभव नहीं है। लेकिन 3 से 4 सालों में ईयू-भारत के बीच का व्यापार करीब 22 लाख करोड़ तक जा सकता है।
6 अगस्त 2०25 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत पर रूसी तेल खरीदने की वजह से 25% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। 6 अगस्त 2०25 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत पर रूसी तेल खरीदने की वजह से 25% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाने की घोषणा की थी।
चाइनीज एकेडमी ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड एंड इकोनॉमिक कॉर्पोरेशन के सीनियर रिसर्चर जोऊ मी के मुताबिक, अमेरिका को लग रहा है कि पूरी दुनिया उसके लॉजिक के हिसाब से चलेगी। इसमें भले ही उसके साझेदारों का नुकसान हो जाए। अब अमेरिका के साझेदार उसके हिसाब से नहीं चल रहे इसलिए वो ऐसे बयान दे रहा है।
राजेश श्रीवास्तव