डॉ. शैलेश शुक्ला
समय की सजीव सरगम में जब विकास की धारा दिशाओं को द्रुत गति से बदलती है, तब कुछ प्रदेश ऐसे होते हैं जो परिवर्तन के प्रतीक बन जाते हैं। उत्तर प्रदेश आज उसी परिवर्तन, प्रगति और प्रबंधन का पर्याय बनकर उभर रहा है। कभी पिछड़ेपन, बेरोजगारी और अव्यवस्था के लिए चर्चा में रहने वाला यह प्रदेश अब विकास, निवेश और नवाचार का केंद्र बनता जा रहा है। प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि “उत्तर प्रदेश मॉडल” देश भर में चर्चा, आकर्षण और अनुकरण का विषय बन गया है। इसका उत्तर केवल राजनीतिक विमर्श में नहीं बल्कि प्रमाणिक आँकड़ों, नीतिगत निर्णयों और जमीनी बदलावों में छिपा हुआ है।
सबसे पहले यदि आर्थिक परिप्रेक्ष्य में इस परिवर्तन को समझें तो उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था ने पिछले वर्षों में उल्लेखनीय विस्तार किया है। राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार वर्ष 2016-17 में जहाँ सकल राज्य घरेलू उत्पाद लगभग 13.30 लाख करोड़ रुपये था, वहीं यह बढ़कर 2024-25 में 30.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया और 2025-26 में इसके 36 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान व्यक्त किया गया है, जो लगभग 10.8 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाता है। यह वृद्धि केवल संख्यात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक है क्योंकि इसमें उद्योग, सेवा और कृषि तीनों क्षेत्रों का संतुलित योगदान शामिल है।
प्रति व्यक्ति आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार यह आय 2016-17 के 54,564 रुपये से बढ़कर 2024-25 में 1,09,844 रुपये हो गई है । यह दोगुनी वृद्धि इस बात का संकेत है कि विकास का लाभ केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि आम नागरिक तक पहुँच रहा है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश का विकास मॉडल “समावेशी विकास” के रूप में भी देखा जा रहा है।
निवेश के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश ने जो छलांग लगाई है, वह इस मॉडल की लोकप्रियता का प्रमुख कारण है। राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार 50 लाख करोड़ रुपये से अधिक की निवेश पाइपलाइन तैयार की गई है । हाल ही में आयोजित निवेश सम्मेलनों और उनके फॉलोअप कार्यक्रमों के माध्यम से लाखों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों को धरातल पर उतारा गया है, जैसा कि समकालीन समाचार रिपोर्टों में उल्लेख किया गया है कि 7.5 लाख करोड़ रुपये की नई परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं और पूर्व सम्मेलनों के माध्यम से लगभग 15 लाख करोड़ रुपये के निवेश को क्रियान्वित किया जा चुका है। यह निवेश केवल कागजों तक सीमित नहीं बल्कि औद्योगिक इकाइयों, रोजगार और उत्पादन में परिवर्तित होता दिखाई दे रहा है।
औद्योगिक विकास की दृष्टि से भी उत्तर प्रदेश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार राज्य में कारखानों की संख्या 30,000 से अधिक होने जा रही है और पिछले छह वर्षों में इसमें 800 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। यह वृद्धि दर्शाती है कि उत्तर प्रदेश अब केवल कृषि आधारित अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि औद्योगिक शक्ति के रूप में भी उभर रहा है। यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक क्षेत्र में 3,400 करोड़ रुपये के निवेश और हजारों रोजगार सृजन जैसी परियोजनाएँ इस परिवर्तन को और अधिक सुदृढ़ करती हैं।
अवसंरचना विकास इस मॉडल की रीढ़ है। उत्तर प्रदेश ने स्वयं को “एक्सप्रेसवे हब” के रूप में स्थापित किया है, जहाँ 22 एक्सप्रेसवे विकसित किए जा रहे हैं या निर्माणाधीन हैं। हालिया रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया है कि पिछले नौ वर्षों में 63,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण और सुदृढ़ीकरण किया गया है तथा 35,000 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण हुआ है। यह व्यापक नेटवर्क न केवल परिवहन को सुगम बनाता है, बल्कि उद्योग, पर्यटन और व्यापार को भी गति देता है।
विमानन और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में भी उत्तर प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य में 24 हवाई अड्डों के विकास की योजना, जिसमें पाँच अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे शामिल हैं, इसे वैश्विक संपर्क का केंद्र बना रही है। 28 मार्च 2026 से प्रचालन शुरू किए जाने वाले नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर जैसी परियोजनाएँ इसे रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना रही हैं।
कृषि क्षेत्र, जो उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था की आत्मा है, उसमें भी महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। राज्य देश का सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक है और राष्ट्रीय उत्पादन में लगभग 20.6 प्रतिशत का योगदान देता है)। दूध उत्पादन में भी इसका योगदान 15.66 प्रतिशत है, जो इसे इस क्षेत्र में अग्रणी बनाता है। सिंचाई क्षेत्र के विस्तार और फसल विविधीकरण के कारण कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई है, जिससे किसानों की आय में सुधार हुआ है।
कानून व्यवस्था में सुधार भी उत्तर प्रदेश मॉडल की लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण है। हालिया रिपोर्टों में यह उल्लेख किया गया है कि राज्य में शांति, सुरक्षा और विश्वास का वातावरण विकसित हुआ है, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। बेहतर कानून व्यवस्था के कारण उद्योगों और व्यापारिक गतिविधियों को स्थिरता मिली है, जो आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है।
डिजिटल शासन और पारदर्शिता भी इस मॉडल की विशेषता है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के माध्यम से योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाया जा रहा है। हाल ही में 90,000 लाभार्थियों को 900 करोड़ रुपये सीधे उनके खातों में हस्तांतरित किए गए। इससे भ्रष्टाचार में कमी आई है और शासन की विश्वसनीयता बढ़ी है।
रोजगार सृजन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रयास किए गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार 2017 से अब तक 13.45 लाख युवाओं को रोजगार मेलों के माध्यम से निजी क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध कराया गया है। इसके अतिरिक्त विदेशी रोजगार के अवसरों से भी राज्य के युवाओं को जोड़ा गया है, जिससे उनकी आय और कौशल दोनों में वृद्धि हुई है। विश्व के विभिन्न देशों में उत्तर प्रदेश के कुशल श्रमिकों की मांग निरंतर बढ़ रही है।
सामाजिक क्षेत्र में भी सुधार देखने को मिला है। स्वास्थ्य बजट में वृद्धि, चिकित्सा संस्थानों का विस्तार और शिक्षा के क्षेत्र में निवेश ने मानव विकास सूचकांकों में सुधार किया है। यह दर्शाता है कि विकास केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक भी है।
उत्तर प्रदेश मॉडल की लोकप्रियता का एक और कारण है “डबल इंजन सरकार” का समन्वय। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल के कारण योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन संभव हुआ है, जिससे विकास की गति तेज हुई है। हालाँकि, इस मॉडल की कुछ आलोचनाएँ भी हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से औद्योगिकीकरण के साथ पर्यावरणीय संतुलन और क्षेत्रीय असमानताओं पर भी ध्यान देना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, प्रति व्यक्ति आय अभी भी राष्ट्रीय औसत से कम है, जो यह संकेत देता है कि विकास की यात्रा अभी अधूरी है। फिर भी, यह तथ्य अस्वीकार्य नहीं है कि उत्तर प्रदेश ने विकास के क्षेत्र में एक नई दिशा प्रस्तुत की है और पिछले 9 वर्षों में उल्लेखनीय बहुआयामी प्रगति की है। यह मॉडल केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं, बल्कि यह प्रशासनिक सुधार, तकनीकी नवाचार, सामाजिक समावेशन और निवेश आकर्षण का समन्वित रूप है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश मॉडल की लोकप्रियता का मूल कारण उसका बहुआयामी स्वरूप है। यह केवल आंकड़ों की चमक नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव की सच्चाई है। यह मॉडल बताता है कि यदि नीति, नियत और प्रयास में संतुलन हो, तो कोई भी प्रदेश पिछड़ेपन से प्रगति की पराकाष्ठा तक पहुँच सकता है। समय की सशक्त सीख यही है कि विकास केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से आता है। उत्तर प्रदेश का अनुभव इस बात का प्रमाण है कि जब शासन, समाज और संसाधनों का समुचित समन्वय होता है, तब विकास केवल लक्ष्य नहीं, बल्कि वास्तविकता बन जाता है। यही कारण है कि आज देश भर में उत्तर प्रदेश मॉडल चर्चा, प्रेरणा और अनुकरण का केंद्र बनता जा रहा है।