लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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dawood and hafiz
सुरेश हिन्दुस्थानी
अभी कुछ ही दिन पूर्व दुनिया के खतरनाक देशों की सूची में आठवें नम्बर पर घोषित किए गए पाकिस्तान में आतंकवाद का वीभत्स चेहरा दिखाई दिया, जिसमें 132 छात्रों को गोलियों से भून दिया। इस बालसंहार की कल्पना मात्र से ही शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस घटना से पाकिस्तान के बारे में एक घटना अचानक ही स्मरण हो जाती है कि ”बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से होयÓÓ। वास्तव में पाकिस्तान ने अपने यहां पर वैश्विक आतंक फैलाने के लिए जो बोया है, पाकिस्तान उसी को काट रहा है। आतंक फैलाने के लिए जो बारूद पाकिस्तान ने इकट्ठा किया है, उस ढेर पर आज वह स्वयं बैठा हुआ दिखाई देता है। वर्तमान में पाकिस्तान के हालात देखकर यह कहा जा सकता है, वह विनाश के मार्ग पर अपने कदम बढ़ा चुका है, जिसे वह रोकना भी चाहे तो भी नहीं रोक सकता। क्योंकि जिन शक्तियों ने पाकिस्तान को इस खतरनाक स्थान तक पहुंचाया है, उसकी घुसपैठ काफी अंदर तक है।
पाकिस्तान में किए गए नौनिहालों के संहार से इंसानियत तार तार हो गई है, सारे विश्व को तड़पाने वाला यह रुदन आज पाकिस्तान के हृदय से भी उठ रहा है, और उठना भी चाहिए, क्योंकि आतंकवाद का दर्द क्या होता है, इसका साक्षात्कार आज पाकिस्तान को हो चुका है। लेकिन इस्लाम के नाम पर जो आतंक पूरे विश्व में खून की होली खेल रहा है, उसका विश्व के कई देशों को पहले ही एहसास है, कि आतंकवाद क्या होता है। नफरत के आधार पर अस्तित्व में आए पाकिस्तान ने अपने जन्म से ही यह आतंकवाद रूपी मारकाट का खेल प्रारम्भ कर दिया था, कौन भूला है, उन लाशों से भरी रेलगाडिय़ों को जो हिंदुओं के शवों से भरी थीं। अगर कोई भूल भी गया हो तो उस हृदय को इंसानियत के तराजू में मानवीय नहीं माना जा सकता। इसका मतलब साफ है कि हम या भारत में रहने वाले अन्य समुदाय के लोग मानवीयता के दुश्मन पाकिस्तान को भुला नहीं सकते।
पाकिस्तान में इंसानियत के दुश्मनों ने जो खेल खेला वह मानवता को शर्मसार कर रहा है। वर्तमान में आतंकवाद का जो स्वरूप पाकिस्तान की धरती पर फन फैलाए खड़ा है, उस सांप को खुद पाकिस्तान ने ही दूध पिला कर बड़ा किया है। आतंकवाद की घटनाओं को अपने संकेत पर संचालित करने वाले दुर्दांत आतंकवादियों की शरण स्थली बने पाकिस्तान ने यह शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन आतंक रूपी सांप खुद उसे ही डंसने लगेगा। वर्तमान में पाकिस्तान के समक्ष सबसे बड़ी दुविधा यही है कि जिस हाफिज सईद और दाऊद इब्राहिम के विरोध में सोचने पर ही पाकिस्तान की सरकार को पसीना छूट जाता है उनके बारे में कार्यवाही कैसे करेगी। पाकिस्तान अगर सच में ही आतंक के विरोध में कार्यवाही चाहता है या तो आतंक के इन दोनों अजगरों को फांसी देकर भारत को यह बताना होगा कि देखो हमने आपके दोनों दुश्मनों को मार दिया है। हाफिज सईद ने भारत में जो कहर बरपाया था, उसका दर्द आज मुंबई और पूरा देश भूला नहीं है। पाकिस्तान की सरकार छोटे तौर पर आतंक फैलाने वालों को समाप्त करके आतंक को समाप्त नहीं कर सकती, अगर आतंक समाप्त ही करना है तो बड़े स्तर पर कार्यवाही करनी होगी। आज भारत ही नहीं पूरी दुनिया को पाकिस्तान की भूमिका को लेकर संदेह हो रहा है, कि क्या वास्तव में पाकिस्तान अपने बयान के अनुसार आतंक के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करेगा या फिर पहले की तरह ही उसका अभियान फुस्स हो जाएगा। पाकिस्तान के पास यह अच्छा अवसर है कि वह विश्व में अपनी विश्वसनीयता को बढ़ाए और सच्चे मन से आतंक के विरोध में कार्यवाही करे। नहीं तो अभी तक तो विश्व के अन्य देश ही सवाल खड़े कर रहे थे, कहीं ऐसा न हो कि स्वयं पाकिस्तान ही सवाल खड़े करने लगे कि दाऊद इब्राहीम और हाफिज सईद को छूट क्यों?
पाकिस्तान में नवाज शरीफ सरकार ने यूं तो विश्व को दिखाने के लिए आतंकवाद के बारे में वक्तव्य देना प्रारंभ कर दिए हैं, परन्तु उनके परिणाम स्वरूप किस प्रकार का दृश्य सामने आएगा, यह अभी समय के गर्भ में छिपा हुआ है। हालांकि पाकिस्तान के एक कदम से उसका दोहरा चरित्र उजागर हो रहा है, एक तरफ जहां पाकिस्तान आतंक के खिलाफ शीघ्र कार्रवाई का मन बना रहा है, इसके अनुसार तीन हजार आतंकियों को 48 घंटे के अंदर फांसी पर चढ़ाने की तैयारी के बयान देता दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर मुंबई के 26/11 हमले के मास्टर माइंड और दुर्दांत आतंकवादी जकी उर रहमान लखवी को जमानत पर छोड़कर पाकिस्तान ने अपने आंतरिक इरादे प्रदर्शित कर दिए हैं। यहां पर सबसे उल्लेखनीय बात तो यह है कि जो हाफिज सईद आतंक की फसल उगा रहा है, उसका नाम तक भी इस आरोप पत्र में नहीं था, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हाफिज सईद को पाकिस्तान अभी तक आतंकवादी नहीं मानता। यह भी साफ है कि यदि तहरीक-ए-तालिबान सेना को चुनौती न देता, तो अन्य आतंकी संगठनों की तरह उसे भी सरकारी सहायता मिलती। हाफिज के संगठन को राष्ट्रीय बजट से छ: करोड़ रुपये दिये गये। केवल लश्कर-ए-तैयबा के दो हजार से अधिक ठिकाने पाकिस्तान में हैं।
पाकिस्तान ने जिस प्रकार से आतंकवादियों को फांसी देने की त्वरित बात कही है, उससे तो ऐसा ही लगने लगा है कि जो लोग आतंकवादी पैदा करते हैं, पाकिस्तान उनके विरोध में कार्रवाई करने का साहस पैदा नहीं कर पा रहा। छोटे छोटे अपराध करने वाले आतंकियों को फांसी दे देना ही इस समाप्त का सम्पूर्ण हल नहीं माना जा सकता। पाकिस्तान की सरकार के लिए आज एक तरफ कुआ तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति निर्मित हो गई है। अगर वह आतंकियों के विरोध में कार्रवाई करती है तो आतंकवाद अपनी कार्रवाई को और तेज करेंगे, जिससे पाकिस्तान में हर रोज कत्लेआम होंगे। इसके विपरीत अगर कार्रवाई नहीं करती तो पाकिस्तान पर सेना हावी होने का प्रयास करेगी। पहले से चला आ रहा सेना और आतंकियों का मिला जुला अभियान अब अलग अलग दिशाओं में जा चुका है, वर्तमान में सेना और आतंकवाद एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं।
पाकिस्तान की सेना का साफ कहना है कि सरकार आतंकवादियों को समाप्त करने का कदम अतिशीघ्र उठाए, अब तो सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने सरकार को अल्टीमेटम भी दे दिया है कि पाकिस्तान की जेलों में बन्द तीन हजार आतंकियों को शीघ्र फांसी दी जाए। इस चेतावनी के निहितार्थ देखने से पता चलता है कि पाकिस्तानी सरकार को फांसी चेतावनी के अनुसार ही देनी पड़ेगी, नहीं तो जैसा सेना करती आई है वैसा तख्तापलट भी कर सकती है। और नवाज शरीफ इस बार बिलकुल भी नहीं चाहेंगे कि उनकी सरकार का तख्तापलट हो, इसलिए वे सेना की चेतावनी को नजरअंदाज भी नहीं करेंगे और फांसी देने की कवायद जरूर करेंगे।

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