बाबूलाल नागा
हाल में उत्तर प्रदेश के अमरोहा में 11वीं की एक छात्रा की कथित तौर पर लगातार जंक फूड खाने से मौत हो गई। अहाना नाम की छात्रा के पेट में इन्फेक्शन हो गया था। लोकल अस्पताल में इलाज के बाद उसे दिल्ली एम्स रेफर किया गया था। वहां उसने दम तोड़ दिया।
अहाना की मौत कोई साधारण हादसा नहीं है बल्कि यह उस खामोश महामारी का प्रतीक है जो आज हमारे घरों, स्कूलों और बाजारों में खुलेआम पल रही है—जंक फूड। चमकदार पैकेटों, आकर्षक विज्ञापनों और “टेस्टी” के नाम पर परोसे जा रहे जहर ने एक मासूम जिंदगी छीन ली। यह घटना केवल एक परिवार का निजी दुख नहीं बल्कि पूरे समाज, नीति-निर्माताओं और व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है।
आज जंक फूड सिर्फ खान-पान की आदत नहीं बल्कि एक सुनियोजित उद्योग बन चुका है, जो बच्चों को सबसे आसान शिकार मानता है। रंगीन विज्ञापन, कार्टून कैरेक्टर, मुफ्त खिलौने और स्कूलों के आसपास खुले स्टॉल—यह सब बच्चों को लुभाने की रणनीति है। अहाना भी इसी जाल में फंसी। स्वाद के नाम पर सेहत को गिरवी रखने की यह संस्कृति धीरे-धीरे बच्चों के शरीर को खोखला कर रही है। मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग, लीवर की समस्या—ये सब बीमारियां अब केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि बच्चों के हिस्से में भी आ चुकी हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जंक फूड का खतरा केवल लंबे समय में नहीं बल्कि तुरंत भी जानलेवा साबित हो सकता है। अत्यधिक नमक, चीनी, ट्रांस फैट और केमिकल्स से भरे खाद्य पदार्थ बच्चों के नाजुक शरीर पर सीधा हमला करते हैं। दिल की धड़कन से लेकर पाचन तंत्र तक, हर अंग पर इसका असर पड़ता है। अहाना की मौत ने यह कड़वा सच उजागर कर दिया है कि यह ‘धीमा ज़हर’ कभी-कभी अचानक भी जान ले सकता है।
यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या सिर्फ माता-पिता? या स्कूल? या फिर सरकार और खाद्य उद्योग? सच्चाई यह है कि यह सामूहिक विफलता है। माता-पिता की मजबूरी और अनभिज्ञता, स्कूलों की लापरवाही, सरकार की ढीली नीतियां और मुनाफे के पीछे भागता उद्योग—सब मिलकर इस त्रासदी के जिम्मेदार हैं। जब स्कूल कैंटीनों में पिज्जा, बर्गर और कोल्ड ड्रिंक्स आसानी से उपलब्ध हों तो बच्चों को सेहतमंद विकल्प चुनने की सीख कैसे मिले?
सरकार ने भले ही खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के माध्यम से कुछ दिशानिर्देश जारी किए हों लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। स्कूलों के आसपास जंक फूड की बिक्री पर रोक कागजों तक सीमित है। विज्ञापनों पर नियंत्रण की बातें भी खोखली साबित होती हैं, जब बच्चों के टीवी कार्यक्रमों और मोबाइल ऐप्स पर जंक फूड के प्रचार की बाढ़ आती है। क्या बच्चों की जान से बड़ा कोई मुनाफा हो सकता है?
यह भी विडंबना है कि जिस देश में कुपोषण एक गंभीर समस्या है, वहीं दूसरी ओर जंक फूड से उपजा मोटापा और बीमारियां नई चुनौती बन चुकी हैं। यह दोहरी मार है—एक तरफ भूख, दूसरी तरफ गलत भोजन। अहाना की मौत इस विरोधाभास को और भी निर्मम तरीके से सामने लाती है। क्या हम ऐसा भारत बनाना चाहते हैं, जहां बच्चे या तो भूख से मरें या गलत खाने से?
समाधान केवल शोक व्यक्त करने या कुछ दिनों की बहस तक सीमित नहीं होना चाहिए। सबसे पहले, जंक फूड को लेकर कड़े कानून लागू करने होंगे। स्कूलों और उनके आसपास जंक फूड की बिक्री पर सख्त और वास्तविक प्रतिबंध लगे। बच्चों को लक्षित विज्ञापनों पर पूर्ण रोक हो। पैकेटों पर बड़े और स्पष्ट चेतावनी संदेश अनिवार्य किए जाएं, जैसे तंबाकू उत्पादों पर होते हैं। यह संदेश सिर्फ लिखित नहीं, बल्कि चित्रात्मक और प्रभावी हों।
दूसरा, स्कूलों की भूमिका बेहद अहम है। कैंटीनों में पौष्टिक और स्थानीय भोजन को बढ़ावा दिया जाए। पोषण शिक्षा को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए, ताकि बच्चे कम उम्र से ही सही और गलत भोजन में फर्क समझ सकें। अभिभावकों के लिए भी जागरूकता कार्यक्रम हों क्योंकि अक्सर सुविधा और बच्चों की जिद के आगे वे समझौता कर लेते हैं।
तीसरा, समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। जन्मदिन, पार्टी और उत्सवों में जंक फूड को ‘स्टेटस सिंबल’ मानने की सोच बदलनी होगी। घरों में पारंपरिक और संतुलित भोजन की संस्कृति को फिर से जीवित करना होगा। यह केवल स्वास्थ्य का सवाल नहीं बल्कि भविष्य की पीढ़ी को बचाने का संघर्ष है।
अहाना अब लौटकर नहीं आएगी लेकिन उसकी मौत बेकार भी नहीं जानी चाहिए। यह घटना चेतावनी है— अगर अब भी नहीं चेते तो अगली खबर किसी और मासूम की हो सकती है। जंक फूड के खिलाफ लड़ाई केवल नीति की नहीं बल्कि नैतिकता की भी है। सवाल यह नहीं कि हमें क्या स्वादिष्ट लगता है, सवाल यह है कि हम अपने बच्चों को कैसा भविष्य देना चाहते हैं।
यदि अहाना की मौत हमें जगाने में सफल होती है तो शायद यह त्रासदी किसी बदलाव की शुरुआत बन सके अन्यथा, यह भी उन खबरों में दब जाएगी जिन्हें हम पढ़कर कुछ देर दुखी होते हैं और फिर अगले विज्ञापन के साथ भूल जाते हैं। अब वक्त है कि जंक फूड के खिलाफ निर्णायक कदम उठाए जाएं वरना सेहत के साथ यह खिलवाड़ और भी मासूम जिंदगियां निगलता रहेगा।
बाबूलाल नागा