राजनीति

ट्रांसजेंडरों के लिए आवंटित धन के बंटवारे में कंजूसी क्यों?

ट्रांसजेंडर समुदाय के जीवन को बदलने वाली सरकारी योजनाएं जमीन पर नहीं उतर पाईं। केंद्र सरकार द्वारा पिछले 5 वर्षों के दौरान बजट के रूप में आवंटित भारी भरकम धनराशि प्रशासनिक लापरवाहियों के चलते खर्च ही नहीं हो सकी? प्रत्येक वर्ष का पैसा वापस जाता रहा। जबकि, किन्नरों को भी मुख्यधारा से जोड़ने को केंद्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रयास हुए थे। अगर ईमानदारी से पूरा पैसा खर्च किया जाता, तो किन्नर समुदाय में भारी बदलाव आया होता। सरकार-समाज ये दोनों वर्ग अच्छे से परिचित हैं कि किन्नरों को हमेशा से सामाजिक स्वीकार्यता से दूर रखा गया है। ट्रांसजेंडरों की संख्या भारत में लगभग 6 लाख के आसपास है। पिछली जनगणना में 4,87,803 संख्या सामने आई थी। उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक है वहां 1,37,465 किन्नर रहते हैं। पर, अफसोस विकसित होते समाज में भी ये समूची आबादी अब भी हाशिए पर है।

हाल में संपन्न हुए संसद सत्र में इसी मुद्दे को सांसद संजय सिंह से राज्यसभा में पुरजोर से उठाकर व्यवस्था तंत्र का ध्यानाकर्षण करवाया। तभी, केंद्र सरकार ने नए सिरे से समीक्षा करने का मन भी बनाया है। समाज के दूसरे पारंपरिक समुदायों के मुकाबले ट्रांसजेंडर भी तरक्कर करें, देश के विकास की मुख्यधारा में लोगों के साथ कदमताल मिलाएं, को ध्यान में रखकर ही इनके कल्याण के लिए तमाम सारी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का शुभारंभ किया गया था। प्रत्येक वर्ष करोड़ों का बजट आवंटन होना आरंभ हुआ। लेकिन, दुर्भाग्य किसी भी साल पूरी धनराशि किन्नर कल्याण पर खर्च नहीं हुई। पैसा खर्च नहीं होना, निश्चित रूप से बड़ा मजाक ही कहा जाएगा।

पिछले 4-5 वर्षों में आवंटित धनराशि पर गौर करें, तो महसूस होगा कि वास्तव में कितना बड़ा विश्वासधात किन्नरों के साथ किया गया? काविड-19 के बाद साल 2021-22 के केंद्रीय बजट में ट्रांसजेंडरों के लिए केंद्रीय बजट में 20 करोड़ रूपए आवंटित किए गए, जिसमें मात्र एक करोड़ 91 लाख ही खर्च हुए। यानी केवल 9.55 फीसदी धन खर्च हुआ। बाकी पैसा फिर से वापस चला गया। 2022-23 में इस धनराशि में इजाफा किया गया। 20 के जगह 30 करोड़ आवंटित हुए। लेकिन उसे भी खर्च नहीं किया गया। मात्र 12 लाख खर्च किए। संपूर्ण धनराशि का केवल आधा ही फीसदी? उसके बाद साल 2023-24 में और बढ़ोतरी करके 52 करोड़ 91 लाख रूपए किन्नर कल्याण कोष को दिए। दुर्भाग्य वह पैसा भी खर्च नहीं हुआ? सिर्फ 6 करोड़ 59 लाख खर्च हुए। यानी 12.45 फीसदी। 2024-25 में 68 करोड़ 46 लाख रूपए आवंटित किए, जिनमें भी केवल 5 करोड़ 14 लाख रूपए ही खर्च हुए। सिर्फ 7.5 फीसदी ही विभाग खर्च कर पाया। ये मजाक नहीं तो और क्या है?

किन्नर कल्याण योजना क्यों फिसड्डी साबित हुई? जवाबदेही किसकी है? ये बहस का बड़ा मुद्दा हो सकता था, लेकिन सामाजिक विमर्श से बाहर है। इसे प्रशासनिक सुस्ती कहें या सामाजिक बहिष्कार? कभी ऐसा प्रतीत होता है कि किन्नर-विकलांग जैसे लोगों के लिए योजनाएं जमीनी हकीकत को समझे बिना बनाई जाती हैं। ऐसे आयोगों में प्रमुख भी उन्हीं के बीचे से होने चाहिए जिससे लक्षित लाभार्थियों तक योजना पहुंच सके। आवंटित धनराशि का खर्च न होना और अपेक्षित परिणाम नहीं निकलने के पीछे क्या किन्नरों की सही से पहचान न होना तो मुख्य बाधाएं नहीं हैं? ऐसा है तो उसकी भी पड़ताल की जानी चाहिए। कुछ राज्य ऐसे हैं जहां किन्नरों की आबादी बहुतायत संख्या में है जिनमें उत्तर प्रदेश, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार प्रमुख हैं। इन पांच राज्यों में करीब 3 लाख 80 हजार किन्नर हैं।

किन्नर समुदाय सुप्रीम कोर्ट से लेकर केंद्र सरकार तक खुद को तीसरी श्रेणी में रखने की मांग लंबे समय से करते आए थे। मांग मानी भी गई। उसके बाद योजना आयोग ने ‘यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ की परियोजना में किन्नरों को अलग श्रेणी में रखने की अनुशंसा की। वर्ष 2010 में गृह मंत्रालय ने किन्नरों को पुरुष और महिला के अतिरिक्त तीसरी श्रेणी में रखने की मंजूरी दी। तब उम्मीद जगी कि अब किन्नरों को मुख्यधारा से जोड़ दिया जाएगा। पौराणिक मान्यताओं में किन्नरों को भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप का अवतार माना है, जहां उन्हें ना पूर्ण पुरुष और न ही पूर्ण स्त्री समझा गया है। इसलिए उन्हें शिव और शक्ति का संयुक्त रूप माना गया है। दरअसल, इस समय किन्नरों में शिक्षा का स्तर लगातार बढ़ रहा है। पिछले 10 वर्षों में इनमें शैक्षणिक स्कोर 37 फीसदी तक बढ़ा है। पढ़-लिखकर किन्नर विभिन्न किस्म के रोजगार में अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं। अब ये भीख मांगना नहीं चाहते, दुआओं-दुत्कारों से छुटकारा पाना चाहते हैं। इनके भीतर अब इज्जत भरा जीवन जीने की ख्वाहिशें हैं।

सदियों से किन्नर सर्वाधिक अनक्षर रहे हैं। सरकारी योजनाओं से पूरी तरह अनभिज्ञ भी? योजनाओं का लाभ पाने को लेकर हमेशा दस्तावेजीकरण संबंधित जटिलताएं आईं। जैसे, सिविल सर्जन से किन्नर होने का प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज इनके आसानी से नहीं बन पाते। सामाजिक रूढ़िवादिता और भेदभाव के चलते किन्नर अक्सर योजनाओं के लिए आवेदन करने से भी कतराते हैं। यही कारण है कि अधिकांश किन्नर अब भी पारंपरिक रूप से बधाई मांगना, नाच-गाना या भिक्षावृत्ति से ही जुड़े हैं, जो उन्हें मुख्यधारा की रोजगार योजनाओं से दूर रखते हैं। केंद्र सरकार ने किन्नरों की विभिन्न मांगों को सुनकर ही सालाना बजट में इनकी हिस्सेदारी को भी सुनिश्चित किया है। योजनाएं फिसड्डी साबित न हों, इसके लिए दोबारा से प्रयास और समीक्षा करने की जरूरत है।

डा.रमेश ठाकुर