राजेश श्रीवास्तव
देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी ने नए नियम जारी किए हैं जिसे सभी कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों को मानना होगा लेकिन आयोग के इस नए रेग्युलेशन पर कोहराम मच गया है. आखिर इन नियमों में ऐसा क्या है, जिससे लोग उबल गए हैं.
यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) ने देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए नए नियम जारी किए हैं. ये नियम देश के सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटी पर लागू होंगे. आयोग के मुताबिक, इन नियमों का सबसे बड़ा उद्देश्य छात्रों, शिक्षकों या कर्मचारियों को जाति, वर्ग या समुदाय के आधार पर होने वाले भेदभाव से बचाना है. अपने रेग्युलेशन में यूजीसी ने साफ कहा है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में सभी को बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए. वहां पर किसी को भी नीचा दिखाने या अलग व्यवहार करने की इजाजत नहीं दी जा सकती.
किसे माना जाएगा जातिगत भेदभाव ?
यूजीसी के नए नियमों के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति के साथ उसकी जाति या जनजाति के कारण गलत व्यवहार किया जाता है तो उसे जातिगत भेदभाव माना जाएगा. फिर वह भेदभाव चाहे खुले तौर पर हो या छुपे तौर पर, दोनों ही स्थितियों में उसे गलत माना जाएगा.
यूजीसी ने अपने रेग्युलेशन में साफ किया है कि ये नियम देश के सभी हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूटों में लागू होंगे. फिर चाहे वह कॉलेज हो, डीम्ड यूनिवर्सिटी, या यूनिवर्सिटी. इसके दायरे में टीचर, नॉन-टीचिग स्टाफ, स्टूडेंट्स और प्रशासन से जुड़े सभी लोग शामिल किए गए हैं.
हर संस्थान में बनेगा ‘इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर’ (ईओसी)
अपने सर्कुलर ने यूजीसी स्पष्ट किया है कि अब सभी कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में समान अवसर केंद्र यानी ईओसी बनाना होगा. यह केंद्र यह केंद्र वंचित वर्ग के छात्रों और कर्मचारियों की मदद करेगा. अगर किसी के साथ भेदभाव होता है तो यह उनसे जुड़ी शिकायतें ऑनलाइन दर्ज करने की सुविधा देगा. साथ ही पढ़ाई, सामाजिक और आर्थिक मदद देगा. अगर कोई कॉलेज खुद ऐसा केंद्र नहीं बना सकता तो ऐसी स्थिति में उससे जुड़ी यूनिवर्सिटी यह जिम्मेदारी निभाएगी.
शिकायतों के लिए बनेगी इक्विटी कमेटी
यूजीसी के नए नियमों में कहा गया है कि हर संस्थान को अनिवार्य रूप से एक इक्विटी कमेटी यानी समानता समिति बनानी होगी. इस कमेटी में अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व रखना होगा. यह कमेटी मिलने वाली शिकायतों की जांच करके अपनी रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को सौंपेगी. जिसके बाद उस पर फैसला लेना अनिवार्य होगा.
इसके साथ ही यूजीसी ने यह भी आदेश दिया है कि सभी संस्थानों को अनिवार्य रूप से 24 घंटे चलने वाला हेल्पलाइन नंबर भी जारी करना होगा जिससे भेदभाव का कोई मामला आने पर वहां शिकायत की जा सके. जो शख्स इस हेल्पलाइन पर कंप्लेंट करेगा. उसकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी.
भेदभाव हुआ तो कहां करेंगे शिकायत?
आयोग ने अपने नए नियमों में भेदभाव की शिकायत करने का तरीका भी बताया है. यूजीसी के अनुसार, जातिगत भेदभाव की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति हेल्पलाइन, ईमेल या ऑनलाइन पर अपनी शिकायत कर सकता है. वह अपनी कंप्लेंट लिखित में भी दे सकता है. अगर मामला आपराधिक हो तो उसे पुलिस के पास रैफर कर दिया जोगा.
यूजीसी ने कहा है कि अगर शिकायतकर्ता इक्विटी कमेटी की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं होता है तो वह एक महीने के अंदर कॉलेज में बनाए गए ऑम्बड्समैन के पास अपील कर सकता है. वहां तय समय में फैसला किया जाएगा. देशभर में इस सारी प्रक्रिया की यूजीसी खुद निगरानी करेगा. बीच-बीच में कॉलेज-यूनिवर्सिटीज का रैंडम इंस्पेक्शन किया जाएगा. साथ ही उनसे रिपोर्ट मांगी जाया करेगी.
संस्थानों को क्या-क्या करना होगा?
कॉलेज और यूनिवर्सिटी में इन नियमों का पालन करवाने की जिम्मेदारी संस्थान प्रमुख की होगी. प्रिंसिपल और वाइस चांसलर को सुनिश्चित करना होगा कि उनके यहां किसी भी तरह का भेदभाव न हो. उनके संस्थान में समानता को बढ़ावा मिले और वे यह देखें कि सभी को बराबरी का अवसर मिलें.
यूजीसी ने नए नियमों का पालन न करने पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी है. आयोग ने कहा है कि अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है तो यूजीसी सख्त कार्रवाई कर सकता है. इसमें उसे यूजीसी की योजनाओं से बाहर करने, कोर्स बंद करने, ऑनलाइन और डिस्टेंस एजुकेशन पर रोक और मान्यता रद्द करने के एक्शन लिए जा सकते हैं.
बेहतरीन कदम लेकिन विवाद भी शुरू
शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी के इस कदम को बेहतरीन बताया जा रहा है लेकिन इसके साथ ही सोशल मीडिया पर इसका विरोध भी हो रहा है. कहा जा रहा है कि इस रेग्युलेशन से समानता का दावा तो हो रहा है लेकिन असल में इसके जरिए कुछ खास वर्गों को फ़ेवर करने की कोशिश है.
सवाल उठाए जा रहे हैं कि अगर किसी कॉलेज-यूनिवर्सिटी में अपर कास्ट के छात्रों या स्टाफ के साथ जातिगत आधार पर उत्पीड़न हो और उसे करने वाला एससी-एसटी या ओबीसी समुदाय से जुड़ा हो तो वह पीड़ित अपनी शिकायत कहां करेगा. इसके बारे में कोई प्रावधान ही नहीं किया गया.
वहीं अगर कोई एससी-एसटी या ओबीसी समुदाय से जुड़ा व्यक्ति झूठ-मूठ में भी किसी पर आरोप लगा दे तो उस पर इकतरफा कार्रवाई हो सकेगी. लोग इस एक्ट में संशोधन की मांग उठा रहे हैं और जातिगत भेदभाव से पीड़ित सभी समुदायों के लिए खोलने की मांग कर रहे हैं. जिससे उत्पीड़न की स्थिति में कोई भी व्यक्ति बिना किसी डर के अपनी आवाज उठा सके.
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची बात
यूजीसी के नए नियमों को लेकर पूरे देश में इस समय विरोध जारी है. यूजीसी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को भी पत्र भेजा गया है. पत्र में ये आरोप लगाए गए हैं कि जातिगत भेदभाव करने के लिए ये बिल लाया जा रहा है. वहीं, कई संगठनों का कहना है कि ये नियम सवर्णों के खिलाफ है. यह भी कहा जा रहा है कि सरकार इसे लेकर बीच का रास्ता निकालने की तैयारी कर रही है.
कई सामाजिक संगठनों ने नए नियमों को संविधान विरोधी, सामाजिक न्याय विरोधी और सवर्ण वर्ग पर सीधा हमला करार दिया है. राष्ट्रपति को भेजे गए एक ज्ञापन में कहा गया है कि ये विनियम समानता की आड़ में सवर्ण वर्गों के छात्रों के शैक्षणिक अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास है. यह कदम उच्च शिक्षा संस्थानों में वर्षों से चले आ रहे सामाजित न्याय के संघर्ष को पीछे धकेलने वाला है.
उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी की तरफ से 13 जनवरी को अधिसूचित प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगलेशंस, 2०26 के एक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.
इस नियम को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें यूजीसी के नए नियम 3(सी) को मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है. याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नाम पर कुछ वर्गों (खासकर सामान्य वर्ग) के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देता है और इससे कुछ समूहों को शिक्षा से बाहर किया जा सकता है. याचिका में यह भी कहा गया है कि यूजीसी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के विपरीत है और उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाता है.
आखिर क्यों जरूरत पड़ी नये नियमों की ?
17 दिसंबर 2०12 से यूजीसी से मान्यता प्राप्त सभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में जातीय भेदभाव रोकने के लिए कुछ नियम लागू किए गए थे। ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस’ नाम के ये नियम सिर्फ सुझाव और जागरूकता के लिए थे। इनमें कोई सजा या अनिवार्यता नहीं थी। 17 जनवरी 2०16 को हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट रोहित वेमुला ने जातीय उत्पीड़न के चलते आत्महत्या कर ली। इसी तरह 22 मई 2०19 को महाराष्ट्र में दलित डॉक्टर पायल तडवी ने भी आत्महत्या कर ली। 29 अगस्त 2०19 को रोहित वेमुला और पायल तडवी के परिजनों ने कॉलेज में जातीय भेदभाव के नियमों को सख्त बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की। इसी साल आईआईटी ने एक स्टडी की, जिसमें पाया गया कि ‘ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों के 75% छात्र कॉलेज में भेदभाव का सामना करते हैं।’ जनवरी 2०25 में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने यूजीसी को जातीय भेदभाव की शिकायतों का डेटा इकठ्ठा करने को कहा, साथ ही नए नियम बनाने का निर्देश दिया।
फरवरी 2०25 में फीडबैक लेने के लिए इन नए नियमों का एक ड्राफ्ट जारी किया गया। ‘ऑल इंडिया ग्उए स्टूडेंट यूनियन’ का कहना था कि ड्राफ्ट के तहत यूनिवर्सिटीज में जातिगत भेदभाव की परिभाषा में यूजीसी को शामिल नहीं किया गया है, साथ ही कॉलेज में भेदभाव के मामलों पर कार्रवाई के लिए जो इक्वलिटी कमेटी बनाई जानी हैं, उनमें भी यूजीसी मेंबर शामिल करने का प्रावधान नहीं है।
ड्राफ्ट में जातीय भेदभाव की झूठी शिकायत करने पर दंड का प्रावधान था। इस पर कहा गया कि इससे भेदभाव का सामना कर रहे स्टूडेंट्स शिकायत करने से डरेंगे। ड्राफ्ट में जातीय भेदभाव की कोई स्पष्ट परिभाषा भी नहीं थी। संसद की शिक्षा, महिला, बाल और युवा संबंधी मामलों की संसदीय समिति ने ड्राफ्ट की समीक्षा करने के बाद इसे 8 दिसंबर 2०25 को केंद्र सरकार को सौंपा। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिह इस समिति के चेयरमैन थे।
समिति ने यूजीसी को अपनी सिफारिशें दीं जिनमें कहा गया कि भेदभाव वाले नियम की परिभाषा और इक्विटी कमेटी में ओबीसी को भी शामिल किया जाए। इसके बाद यूजीसी ने ड्राफ्ट में कई बदलाव करके 13 जनवरी 2०26 को नए नियम नोटिफाई कर दिए। 15 जनवरी से ये नियम यूजीसी से मान्यता प्राप्त सभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में लागू हो गए हैं।
प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशंस 2०26 में 3 बड़े बदलाव हुए हैं । इस परिभाषा में कहा गया है, ‘जाति, धर्म, नस्ल, लिग, पैदाइश के स्थान, विकलांगता के आधार पर कोई भी अनुचित या पक्षपाती व्यवहार, जो पढ़ाई में बराबरी में बाधा बने या मानव गरिमा के खिलाफ हो, उसे जातिगत भेदभाव माना जाएगा।’ जबकि ड्राफ्ट में जातीय भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा नहीं थी। इस परिभाषा में ‘एससी/एसटी के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी छात्रों को शामिल किया गया है। कहा गया है कि इनके खिलाफ किसी भी अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार को जाति-आधारित भेदभाव माना जाएगा जबकि ड्राफ्ट में ओबीसी को शामिल नहीं किया गया था।
ड्राफ्ट में झूठी शिकायतों को कम करने के लिए प्रावधान था। इसमें कहा गया था कि अगर झूठी या जानबूझकर दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी के खिलाफ शिकायत की गई, तो शिकायत करने वाले को आर्थिक दंड या कॉलेज से सस्पेंड भी किया जा सकता है। अब लागू हुए फाइनल नियमों से ये प्रावधान हटा लिया गया है। कॉलेजों में ईक्वल अपॉर्च्यूनिटी सेंटर यानी ईओसी बनेंगे। ये कॉलेज कैंपस में पिछड़े और वंचित लोगों को शैक्षिक, वित्तीय और दूसरे मामलों में सलाह देंगे और उनके साथ भेदभाव से जुड़ी शिकायतों का समाधान करेंगे। कॉलेज जातीय भेदभाव को रोकने के लिए समाज, मीडिया, जिला प्रशासन और गक्वग्, स्टूडेंट्स और अभिभावकों के साथ मिलकर काम करेगा और कानूनी मदद के लिए जिले और राज्य की लीगल अथॉरिटीज यानी कोर्ट्स का सहयोग लेगा। यूजीसी के तहत हर कॉलेज को एक इक्वलिटी कमेटी यानी समता समिति बनानी होगी। इसके अध्यक्ष कॉलेज के प्रमुख होंगे।
यूजीसी के खिलाफ यूपी में प्रदर्शन : भाजपा विधायक बोले- दोहरे मापदंडों पर गहन विवेचना हो, भाजपा नेताओं का इस्तीफा
यूजीसी के खिलाफ उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शन हो रहा है। अलग-अलग जिलों में संगठनों ने सड़क पर उतरकर अपना विरोध दर्ज करा रहे है। मथुरा में ब्राह्मण संगठनों के नेतृत्व में प्रदर्शन कर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा । वहीं बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट के इस्तीफ़े के बाद यूजीसी को लेकर नाराजगी और तेज हो गई है जिसका असर आजमगढ़ में भी दिखेग, जहां विरोध प्रदर्शन हुआ। इसके अलावा मेरठ में भी संगठनों द्बारा यूजीसी के खिलाफ प्रदर्शन किया गया । प्रदेशभर में एक साथ हो रहे इन प्रदर्शनों से प्रशासन अलर्ट मोड में है। गोंडा से भाजपा विधायक प्रतीक भूषण सिह ने यूजीसी मुद्दे को लेकर फ़ेसबुक पोस्ट के जरिए तीखा निशाना साधा है। विधायक ने अपनी पोस्ट में इतिहास के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाते हुए लिखा कि जहां बाहरी आक्रांताओं और उपनिवेशी ताकतों के अत्याचारों को अतीत की बात कहकर भुला दिया जाता है, वहीं भारतीय समाज के एक वर्ग को लगातार ऐतिहासिक अपराधी बताकर वर्तमान में प्रतिशोध का शिकार बनाया जा रहा है।
भाजपा युवा मोर्चा नोएडा महानगर के जिला उपाध्यक्ष राजू पंडित ने पद से इस्तीफा दे दिया। लेटर में उन्होंने लिखा- यूजीसी जैसा कानून सवर्ण जाति के बच्चों के भविष्य के लिए घातक है। यूजीसी बिल को वापस लिया जाना चाहिए। देशभर में युवाओं और सामाजिक संगठनों में नाराजगी है। रायबरेली में भाजपा किसान मोर्चा के मंडल अध्यक्ष (सलोन ब्लॉक) श्याम सुंदर त्रिपाठी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने बताया कि यूजीसी द्बारा सवर्ण बच्चों के विरोध में लाए गए काले कानून से नाराज होकर उन्होंने यह कदम उठाया है। श्याम सुंदर त्रिपाठी ने कहा- सवर्ण जाति के बच्चों के साथ सरकारों द्बारा पहले से ही जातिगत राजनीति की जाती रही है। ऐसे में इस कानून के लागू होने से बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है।
बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफ़े की वजह यूजीसी का नया कानून और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों की पिटाई बताई है। मेरठ में छात्रों समेत अन्य लोगों ने विरोध प्रदर्शन कर कलेक्ट्रेट में ज्ञापन सौंपा। छात्र नेता विमल चौहान ने नियमों को शिक्षा सुधार के नाम पर छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय बताया। कहा- इससे सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों में भय, तनाव और असुरक्षा का माहौल बन रहा है। सीतापुर : राष्ट्रीय हिदू शेर सेना के कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया और नारेबाजी की। कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रपति के नाम संबोधित ज्ञापन मजिस्ट्रेट को सौंपते हुए बिल को वापस लेने की मांग की। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में जातिगत आधार पर कानून बनाना सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देगा। प्रयागराज के कोरांव में सवर्ण समाज के लोगों ने प्रदर्शन किया। ब्लॉक मुख्यालय से शुरू होकर तहसील मुख्यालय तक प्रदर्शन करते हुए गए। यहां यूजीसी को ज्ञापन सौंपा। यूजीसी कानून के खिलाफ नारेबाजी करते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की। चेतावनी दी कि मांग न माने जाने पर आंदोलन और तेज किया जाएगा। प्रदर्शन में भाजपा और कांग्रेस सहित विभिन्न दलों के कार्यकताã भी मौजूद रहे।
कानून वापस लेने या बदलाव के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं एससी/एसटी कानून के दुरुपयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और संसद में कई बार बहस हुई है। ऐसे में यूजीसी के नए नियमों के दुरुपयोग को रोकने के लिए भी सख्त व्यवस्था बनानी होगी। केंद्र सरकार के पास इन नियमों को पूरी तरह से वापस लेने या इन्हें तर्कसंगत तरीके से दुरुस्त करने का पूरा अधिकार हासिल है। संविधान में भी भेदभाव के खिलाफ प्रावधान हैं जिनके अनुसार समानता का व्यवहार जरूरी है
हालांकि छात्र राजनीति में इन नए नियमों की आड़ में झूठी शिकायतें और मुकदमेबाजी बढ़ सकती है। इसे रोकने के लिएयूजीसी और केंद्र सरकार को प्रभावी कदम उठाने चाहिए। अगर सरकार इसमें नाकाम रही तो, नए नियमों का दुरुपयोग होगा और निर्दोष छात्रों की अभिव्यक्ति की आजादी और सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है जिसके बारे में संविधान के आर्टिकल 19 और 21 में प्रावधान है।
राजेश श्रीवास्तव