विश्ववार्ता

क्या अमेरिका-चीन के ‘वैश्विक चक्रब्यूह’ में घिर चुके भारत को रूस व अन्य मित्र देशों की मदद मिलेगी?

कमलेश पांडेय

गुटनिरपेक्ष देश भारत आज एक जटिल वैश्विक शक्ति-संघर्ष में फँसा दिखाई देता है, जहाँ एक तरफ अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत चीन के विरुद्ध अपने प्रमुख साझेदार के रूप में देखना चाहता है, तो वहीं दूसरी तरफ चीन एशिया में अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए भारत पर सामरिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए हुए है जबकि, भारत इन सबसे बेपरवाह रहते हुए अपने पुराने सदाबहार मित्र रूस के साथ अपने संतुलित रिश्ते प्रगाढ़ बनाए हुए है। साथ ही, फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, जापान और इजरायल आदि से द्विपक्षीय रिश्ते मजबूत कर चुका है।

ऐसे में स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठता है कि क्या रूस और फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, जापान और इजरायल आदि जैसे मजबूत अन्य मित्र देश भारत को इस “अमेरिका-चीन के वैश्विक चक्रब्यूह” से बचाने हेतु  निर्णायक भूमिका निभा पाएंगे? दो टूक उत्तर होगा कि वैश्विक परिस्थितियां ही सबकुछ तय करेंगी। लिहाजा आइए सबसे पहले यह समझते हैं कि आखिर रूस भारत के लिए क्यों इतना महत्वपूर्ण है? चूंकि रूस और भारत के संबंध केवल सामरिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक विश्वास पर आधारित रहे हैं। इसलिए अविश्वास अनुचित होगा।

कहना न होगा कि रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और कूटनीति में रूस ने दशकों तक भारत का साथ दिया है। चूंकि आज भी भारत के रक्षा उपकरणों का बड़ा हिस्सा रूसी मूल का है। साथ ही रूस भारत को सस्ता तेल, परमाणु सहयोग और संयुक्त सैन्य तकनीक उपलब्ध करा रहा है लेकिन 2026 की वास्तविकता यह है कि रूस स्वयं भी भारी पश्चिमी प्रतिबंधों और आर्थिक दबावों के कारण चीन पर काफी हद तक निर्भर हो चुका है। कई विश्लेषक मानते हैं कि रूस-चीन संबंध “रणनीतिक निकटता” में बदल चुके हैं, भले ही वह औपचारिक सैन्य गठबंधन न हो। 

यक्ष प्रश्न है कि क्या रूस भारत के पक्ष में चीन के विरुद्ध खड़ा होगा? उत्तर होगा कि यह संभावना सीमित है। इसके पीछे कई कारण हैं- पहला, रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता, क्योंकि यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस का व्यापार, ऊर्जा निर्यात और तकनीकी आपूर्ति काफी हद तक चीन पर निर्भर हो गया है। इसलिए रूस खुलकर भारत के पक्ष में चीन का विरोध नहीं करेगा।

दूसरा, भारत की तरह ही अब रूस की “संतुलन नीति” भी अपना महत्व जतलायेगी। चूंकि रूस चाहता है कि भारत और चीन दोनों उसके साथ बने रहें। इसलिए वह रिक (RIC-Russia-India-China) और ब्रिक्स (BRICS) जैसे मंचों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। चूंकि भारत भी रूस के लिए रणनीतिक संतुलन है, क्योंकि रूस नहीं चाहता कि भारत पूरी तरह अमेरिका के खेमे में चला जाए। इसलिए वह भारत को हथियार, ऊर्जा और कूटनीतिक समर्थन देकर “रणनीतिक स्वायत्तता” बनाए रखने में मदद करेगा। लेकिन यह मदद चीन-विरोधी सैन्य गठबंधन के रूप में नहीं होगी। 

ऐसे में स्वाभाविक पूरक प्रश्न है कि आखिर भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है? तो जवाब होगा कि भारत के सामने चुनौती केवल अमेरिका या चीन नहीं, बल्कि “निर्भरता” है। अरब देशों के समूह, यूरोपीय संघ, अफ्रीकी संघ आदि पर भी यही बात लागू होती है। यदि भारत पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर होता है, तो उसकी विदेश नीति पश्चिमी दबावों में आ सकती है। वहीं यदि चीन के साथ आर्थिक निर्भरता बढ़ती है, तो सुरक्षा खतरे बढ़ सकते हैं और यदि रूस अत्यधिक चीन पर निर्भर हो गया, तो वह भारत के लिए पहले जैसा स्वतंत्र शक्ति-संतुलनकर्ता नहीं रह पाएगा।

ऐसे में यही प्रश्न सबकी जेहन में उठेगा कि तो फिर भारत को क्या करना चाहिए? स्पष्ट जवाब होगा कि भारत को “बहुध्रुवीय संतुलन” की नीति पर आगे बढ़ना होगा और अपने आपमें तीसरी महत्वपूर्ण शक्ति/धुरी बनने की रणनीति अपनानी होगी। इसके खातिर अमेरिका से तकनीक और निवेश, रूस से रक्षा और ऊर्जा सहयोग, 

यूरोप से व्यापार, पश्चिम एशिया से कनेक्टिविटी और इंडो-पैसिफिक में सामरिक साझेदारी बनानी होगी। यानी कि भारत को किसी एक ध्रुव का उपग्रह बनने के बजाय स्वयं एक स्वतंत्र ध्रुव बनना होगा।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि रूस भारत को पूरी तरह से “बचाने” नहीं आएगा, क्योंकि आज रूस स्वयं चीन के साथ गहरे रणनीतिक समीकरण में बंधा हुआ है। लेकिन रूस भारत को इतना अवश्य सहारा देगा कि भारत पूरी तरह अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र में न चला जाए। अंततः भारत की सुरक्षा किसी बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि उसकी अपनी आर्थिक शक्ति, तकनीकी आत्मनिर्भरता, सैन्य क्षमता और कूटनीतिक संतुलन से तय होगी। यही 21वीं सदी की वास्तविक “रणनीतिक स्वायत्तता” है।

तो क्या फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और इजरायल आदि भारत के साथ आएंगे?

भारत के लिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या वह अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच “तीसरा संतुलित वैश्विक ध्रुव” बना सकता है? इस संदर्भ में फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, और इजरायल जैसे देशों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन सभी देश एक समान कारणों से भारत के साथ नहीं आएंगे। तो फिर यही बात समझते हैं कि आखिर कौन किस कारण से भारत के करीब आ सकता है?

जहां तक फ्रांस की बात है तो वह भारत के सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदारों में एक है। वास्तव में फ्रांस, यूरोप में शायद वह शक्ति है जो भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” को सबसे बेहतर समझती है। राफेल, परमाणु सहयोग और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग इसका प्रमाण हैं। चूंकि फ्रांस नहीं चाहता कि दुनिया केवल अमेरिका और चीन के बीच बँट जाए, इसलिए वह भारत को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में उभरते देखना चाहता है। इसलिए फ्रांस भविष्य में भारत के साथ रक्षा, समुद्री सुरक्षा और एआई-तकनीक में और गहरा सहयोग कर सकता है।

जहां तक जर्मनी की बात है तो वह भारत का आर्थिक सहयोगी है लेकिन सीमित सामरिक शक्ति रखता है। इसलिए जर्मनी भारत के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक और तकनीकी साझेदार बन सकता है। खासकर हरित ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर सेक्टर्स में सहयोग बढ़ रहा है लेकिन जर्मनी पारंपरिक रूप से सैन्य-रणनीतिक मामलों में आक्रामक भूमिका नहीं निभाता। क्योंकि वह चीन के साथ अपने व्यापारिक संबंध भी पूरी तरह खराब नहीं करना चाहता। इसलिए जर्मनी भारत के साथ रहेगा, परन्तु “सुरक्षा गठबंधन” की सीमा तक शायद नहीं जाएगा।

जहां तक जापान की बात है तो चीन को संतुलन में रखने के लिए वह भारत का बड़ा एशियाई साथी है। जापान भारत के सबसे महत्वपूर्ण एशियाई सहयोगियों में उभर रहा है। चूंकि चीन के विस्तारवाद से जापान स्वयं चिंतित है। क्वाड, इंडो-पैसिफिक और सप्लाई-चैन डायवर्सिफिकेशन  में भारत-जापान सहयोग बढ़ रहा है। जापान, भारत में बड़े निवेश कर रहा है। लिहाजा अगर एशिया में चीन का दबाव बढ़ता है, तो जापान, भारत के और करीब आएगा।

जहां तक ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की बात है तो दोनों प्रमुख देश ग्लोबल साउथ (वैश्विक दक्षिण) की राजनीति में साझेदार हैं। लिहाजा ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका भारत के साथ “ग्लोबल साउथ” की आवाज़ मजबूत कर सकते हैं।

ब्रिक्स (BRICS), क्लाइमेट जस्टिस (climate justice) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) में सुधार जैसे मुद्दों पर इनकी सोच मिलती है। ये देश पश्चिम और चीन दोनों से संतुलित दूरी बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन इनकी सैन्य या तकनीकी क्षमता इतनी नहीं कि वे भारत के लिए सुरक्षा कवच बन सकें।

जहां तक इजरायल की बात है तो वह भारत के लिए रक्षा और तकनीक में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इजरायल, भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रक्षा-तकनीकी साझेदार है। ड्रोन्स, मिसाइल डिफेंस, साइबर सिक्युरिटी, और इंटेलीजेंस में इजरायल की विशेषज्ञता भारत के लिए उपयोगी है। चूंकि इजरायल, भारत को आतंकवाद और सीमा-सुरक्षा के संदर्भ में समझता है। लेकिन इजरायल का आकार और भौगोलिक सीमाएँ उसे वैश्विक शक्ति-संतुलन का अकेला स्तंभ नहीं बनने देतीं।

ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि क्या ये सभी देश मिलकर भारत के साथ “तीसरा ध्रुव” बना सकते हैं? तो जवाब होगा कि सैद्धांतिक रूप से हाँ, लेकिन व्यवहार में यह आसान नहीं होगा। क्योंकि जर्मनी और जापान अभी भी अमेरिकी सुरक्षा ढाँचे से जुड़े हैं। वहीं ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका चीन से आर्थिक रूप से जुड़े हैं। वहीं इजरायल पश्चिमी रणनीतिक ढाँचे के निकट है। भले ही फ्रांस अपेक्षाकृत स्वतंत्र है, लेकिन अकेला यूरोपीय स्तंभ पर्याप्त नहीं।

फिर भी, इन देशों के साथ भारत का “मल्टी-अलाइनमेंट मॉडल” उभर सकता है क्योंकि फ्रांस औऱ भारत मिलकर सामरिक स्वायत्तता बनाएंगे जबकि जापान और भारत मिलकर इंडो-पैसिफिक संतुलन कायम करेंगे जबकि इजरायल और भारत मिलकर रक्षा-तकनीक बढ़ाएंगे। वहीं जर्मनी और भारत मिलकर उद्योग और हरित ऊर्जा को मजबूत करेंगे। इसके अलावा ब्राजील/दक्षिण अफ्रीका और भारत मिलकर ग्लोबल साउथ को नेतृत्व प्रदान करेंगे।

इससे एक बात साफ हो चुकी है कि आने वाले दशक में दुनिया केवल अमेरिका बनाम चीन की लड़ाई नहीं रहेगी क्योंकि डॉनल्ड ट्रम्प और शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात इसी बात की चुगली करती है। इससे इतर कई मध्यम और बड़ी शक्तियाँ एक ऐसा वैश्विक ढाँचा चाहेंगी जिसमें वे किसी एक महाशक्ति यानी अमेरिका या चीन के अधीन न हों। भारत यदि रूसी मदद से आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति के रूप से मजबूत बना रहता है, तो यही देश उसके साथ एक “बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था” बनाने में सहयोग कर सकते हैं लेकिन यह गठबंधन नाटो (NATO) जैसा कोई औपचारिक सैन्य संगठन नहीं होगा, बल्कि साझा हितों, संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित लचीला नेटवर्क होगा।