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क्या नया परीक्षा कानून और तकनीकी सुधार बचा पाएंगे युवाओं का भविष्य

दुर्गेश्वर राय

देश के लाखों युवाओं के सपनों और उनके भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में परीक्षाओं की शुचिता वर्तमान समय का सबसे ज्वलंत और संवेदनशील विषय बना हुआ है। हाल ही में नीट जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में हुए पेपर लीक विवाद और उसके बाद भड़के राष्ट्रव्यापी छात्र आंदोलनों ने देश की परीक्षा प्रणाली की खामियों को पूरी तरह से बेपर्दा कर दिया। इन व्यापक विरोध प्रदर्शनों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए दबाव के बीच तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा, जिसके बाद प्रह्लाद जोशी ने शिक्षा मंत्रालय का नया कार्यभार संभाला है। छात्रों के इस आक्रोश ने स्पष्ट कर दिया कि केवल कागजी कानून से काम नहीं चलने वाला हैं। इन कानूनों के कठोरता से क्रियान्वयन और व्यवस्था में आमूलचूल तकनीकी सुधार करना ही होगा। इसी पृष्ठभूमि में, व्यवस्था को पारदर्शी बनाने और छात्रों का खोया हुआ विश्वास बहाल करने के लिए प्रशासनिक और विधायी स्तर पर बड़े कदम उठाए जा रहे हैं जिनमें हालिया संशोधन विधेयक और एक नई विशेषज्ञ समिति का गठन प्रमुख है।

इस नई व्यवस्था की आवश्यकता को समझने के लिए इसके मूल कानून, ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम, 2024’ पर दृष्टि डालना आवश्यक है। फरवरी 2024 में पारित इस कानून का मुख्य उद्देश्य यूपीएससी, एसएससी और रेलवे जैसी संस्थाओं द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अनुचित साधनों के प्रयोग को रोकना था। उस कानून में परीक्षा में व्यक्तिगत रूप से गड़बड़ी करने वालों के लिए तीन से पांच साल की सजा और दस लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान था, जबकि संगठित माफिया या संस्थागत संलिप्तता के मामले में पांच से दस साल की कैद और न्यूनतम एक करोड़ रुपये के जुर्माने की व्यवस्था की गई थी। हालांकि, वर्तमान में देश भर में हुए आंदोलनों ने यह साबित कर दिया कि ये सजाएं संगठित अपराध को रोकने के लिए पर्याप्त निवारक नहीं बन सकीं। यही कारण है कि नए संशोधन विधेयक के माध्यम से इन दंडात्मक प्रावधानों को और अधिक सख्त बनाने की रूपरेखा तैयार की गई है, ताकि शिक्षा माफियाओं के भीतर कानून का वास्तविक भय पैदा किया जा सके और मुकदमों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित की जा सके।

विधायी सख्ती के साथ-साथ, परीक्षा प्रणाली की तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और ठोस प्रशासनिक कदम भी उठाया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह से लीक-प्रूफ और तकनीक-संचालित बनाने के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त टास्क फोर्स के गठन की घोषणा की है। इस महत्वपूर्ण समिति का नेतृत्व भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के पूर्व अध्यक्ष व इन्फोसिस के सह-संस्थापक और प्रख्यात प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणी करेंगे। यह एक बहु-विषयक समिति है जिसमें इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस सोमनाथ, इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास के निदेशक वी कामकोटी, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ अमृत लाल मीणा जैसे अनुभवी दिग्गज शामिल हैं। इस टास्क फोर्स का मुख्य जोर विशेष रूप से राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की परीक्षा प्रणाली को तकनीकी दृष्टिकोण से सुधारने और पुनर्गठित करने पर होगा। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठा रही है कि हमारी परीक्षा प्रणाली विश्वसनीय और पारदर्शी हो, तथा छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा न जाए। हालांकि, राजनीतिक मोर्चे पर कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे केवल प्रधानमंत्री की छवि सुधारने का एक प्रयास करार दिया है।

अब यह यक्ष प्रश्न उठता है कि क्या ये नए कदम और विधेयक वास्तव में सुचिता पूर्ण परीक्षा सुनिश्चित कर पाएंगे। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहां सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा करोड़ों युवाओं के लिए सामाजिक-आर्थिक उत्थान का एकमात्र साधन है, वहां ऐसे सख्त कानूनों और तकनीकी सुधारों का महत्व अत्यधिक है। एक त्रुटिहीन परीक्षा प्रणाली न केवल योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों की रक्षा करती है, बल्कि राष्ट्र के निर्माण में भी सही प्रतिभाओं का योगदान सुनिश्चित करती है। नंदन नीलेकणी जैसे विशेषज्ञ के नेतृत्व में तकनीक का एकीकरण और नए विधेयक के सख्त दंडात्मक प्रावधान मिलकर एक ऐसा मजबूत तंत्र विकसित कर सकते हैं, जिसे भेद पाना संगठित माफियाओं के लिए लगभग असंभव हो जाए। इस पूरी कवायद की सफलता पूरी तरह से इसके जमीनी क्रियान्वयन और व्यवस्था में बैठे लोगों की सत्यनिष्ठा पर निर्भर करेगी। यदि इन सुधारों को इनकी सच्ची भावना के साथ लागू किया गया, तो यह निश्चित रूप से देश के मेहनती युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा।

दुर्गेश्वर राय