लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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भारत के भाल पर खूनी इबारत लिखने वाले दुर्दांत आतंकवादी याक़ूब मेनन के समर्थन में देश में उठ रहे विचारों का तूफान अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है। राष्ट्रीय विचार को सामने रखकर इस समर्थन के बारे में चिंतन किया जाये तो पहली बार में ही यह सिद्ध हो जाएगा कि ऐसे व्यक्ति का समर्थन करके हम सीधे तौर पर भारत की अस्मिता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। याक़ूब मेनन की फांसी के बाद जब उसको दफनाया गया तब ऐसा दृश्य दिखाई दे रहा था, कि याक़ूब मेनन कोई शहीद है। उसकी शवयात्रा में उमड़ी हजारों लोगों की भीड़ यह बताने के लिए काफी है कि भारत में रह रहे कुछ मुसलमानों के मन में आतंकवादियों के लिए कितना सम्मान है। इस घटना के बाद पूरे देश के नागरिकों में जो प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है, उससे समझ में आता है कि देश में आतंकियों के प्रति जबर्दस्त गुस्सा है। इतना ही नहीं याक़ूब का समर्थन करने वाले लोग भी जनता के गुस्से का शिकार बन रहे हैं।
हम जानते हैं कि पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित किए जा रहे आतंकवाद का दंश भारत लंबे समय से भोग रहा है, भारत में जब भी आतंकियों के विरोध में कठोर कदम उठाने की कवायद की जाती तब इसी देश में उनके समर्थक खड़े दिखाई देते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत में आतंकवादियों का नेटवर्क काम कर रहा है, यदि नहीं तो आतंक फैलाने वालों को इतने व्यापक स्तर पर समर्थन कैसे हासिल हो जाता है। यह सही है कि आतंक का समर्थन करना देश के लिए आत्मघाती कदम है, कहीं न कहीं हम स्वयं ही देश के साथ ऐसा खिलवाड़ कर रहे हैं जो देश को समाप्त करने की राह पर ले जाने वाला कदम है। ऐसी सोच रखने वाले लोगों से आज सावधान रहने की जरूरत है। अब सवाल तो यह भी आता है कि देश में उठ रहे इस समर्थन के स्वरों को हवा कहाँ से मिल रही है, कहीं इसके पीछे पाकिस्तान तो नहीं। अगर पाकिस्तान है तो हमें अपने स्तर पर यह विचार अवश्य ही करना चाहिए कि हम ऐसा कार्य करके क्या साबित करना चाह रहे हैं।
भारत देश में आतंकवादियों को किस प्रकार का समर्थन हासिल होता है, इसका साक्षात प्रमाण हम सभी को याक़ूब मेनन के बारे में मुस्लिम वर्ग में उपजी सहानुभूति से पता चल जाता है। इसके अलावा देश के कई अन्य नागरिक भी याक़ूब के समर्थन में वक्तव्य देते दिखाई दिये। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने हर बार की तरह इस बार भी आतंकवाद का एक प्रकार से समर्थन ही किया है। कांग्रेस नेता ने जहां याकोब की फांसी को गलत ठहराया, वही न्यायालय के निर्णय पर भी सवाल खड़े किए हैं। इस बात को सीधे सीधे न्याय पालिका का अपमान निरूपित किया जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं काही जानी चाहिए। अब सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस को ऐसा लगता है कि न्यायालय भी गलत या किसी के दबाव में निर्णय दे सकती है, यदि उनका ऐसा लगना सही है तो फिर यह आसानी से कहा जा सकता है कि कांग्रेस के शासन काल में जरूर निर्णयों को प्रभावित किया गया होगा, या किए जाने की कोशिश की गई होगी।
कांग्रेस का यह खेल भारत में फूट डालो और राज करो की नीति का हिस्सा है, इसी प्रकार की भावना के कारण हमारा देश कई बार विभाजन का दंश भोग चुका है। वैश्विक षड्यंत्र के झांसे में आकर देश में जिस प्रकार का जहर फैलाया जा रहा है, उसकी गिरफ्त में आज पूरा भारत देश दिखाई दे रहा है, आज आवश्यकता इस बात की है कि देश के नागरिक इस बारे में चिंतन करें कि हमारा देश किस प्रकार से प्रगति की राह पर अग्रसर हो।
वर्तमान में हमारे देश में जिस प्रकार की राजनीति की जा रही है, वैसा विश्व में किसी भी देश में दिखाई नहीं देता, क्योंकि वहाँ का नागरिक अपने देश के प्रति कर्तव्यों को अच्छी प्रकार से समझता है, और सुरक्षा के मामले में में तो सारे राजनीतिक दल और जनता एक स्वर में केवल वही भाषा निकालते हैं, जो देश हित में, लेकिन हमारे देश में क्या हो रहा है, कम से कम देश की सुरक्षा के नाम पर तो किसी प्रकार की राजनीति नहीं होना चाहिए। हमारे देश में याक़ूब मेनना को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सैकड़ों लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ। इन सभी समर्थन करने वालों से मैं केवल एक बात पूछना चाहूँगा कि क्या उन्होने उन परिवारों के बारे में सोचा है, जिनके परिवार के लोग मुंबई हमले में जान गंवा चुके थे, उन परिवारों के दर्द को यह लोग तभी महसूस कर सकते हैं जब इनके अंदर अपनेपन का भाव होगा, और देश के प्रति गहरी आत्मीयता का भाव होगा। अगर इस तरीके का चिंतन किया जाता तो शायद कभी भी याक़ूब मेनन को इतना बड़ा समर्थन नहीं मिलता। याक़ूब को फांसी देने के बाद अब देश में एक मांग और ज़ोर शोर से उठने लगी है, इन सभी आतंकी समर्थकों को राष्ट्रद्रोही घोषित कर इन पर प्रकरण दर्ज किया जाये। बात तो निकल चुकी है, अब देखना केवल यही है कि यह कितनी दूर तक जाएगी।
भारत के दुर्दांत अपराधी याक़ूब मेनन की फांसी दिये जाने के बाद पाकिस्तान में जिस प्रकार की हलचल की अपेक्षा की जा रही थी, कमोवेश वैसा ही दृश्य पाकिस्तान में दिखाई दे रहा है। याक़ूब को पाकिस्तान में पूरा समर्थन मिल रहा है, अब तो पाकिस्तान से ऐसे भी बयान आने लगे हैं कि भारत बदले की कार्यवाही के लिए तैयार रहे। मैं पाकिस्तान के सिपहसालारों से एक बात जरूर पूछना चाहूँगा कि याक़ूब मेनन को इतना समर्थन क्यों दिया जा रहा है, जबकि वह भारत का दुश्मन था, जिसने भारत के माँ के निर्दोष लालों को मौत के घाट उतार दिया था। ऐसे में क्या भारत को अपनी सुरक्षा करने का भी अधिकार नहीं है क्या? मैं समझता हूँ कि देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी अपराधी को किसी भी रूप में क्षमा नहीं करना चाहिए।
इसमें एक बात और गौर करमे लायक है कि याक़ूब को फांसी देने के बाद जब उसका जनाजा निकाला जा रहा था, तब उसकी शव यात्रा में भारत के एक वर्ग के लोग ऐसे शामिल गुए जैसे यह किसी शहीद की शव यात्रा हो? हजारों की संख्या में याक़ूब की शवयात्रा में शामिल लोग क्या सोचकर पहुंचे होंगे, यह तो वही बता सकते हैं, लेकिन इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि भारत के कुछ मुसलमानों के मन में आतंक के प्रति कहीं न कहीं समर्थन है। अगर नहीं होता तो ओवैसी जैसी लोग खुले रूप में याक़ूब का समर्थन नहीं करते।

2 Responses to “याक़ूब के समर्थन पर सवालों का घेरा”

  1. mahendra gupta

    कांग्रेस की नीतियों परिणाम है कि देश आज आतंकवाद के इस दंश को झेल रहा है , कांग्रेस ने शुरू से ही सत्ता में बने रहने के लिए बहुसंख्यक हिन्दू वर्ग का शमन किया व मुसलमानों की हितेषी बानी रही , इसी का परिणाम आज इनकी इतनी बढ़ी आबादी है , जिस गति से भारत में पिछले साठ सैलून में इनकी आबादी बढ़ी है , अन्य किसी देश में नहीं बढ़ी , यदि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया जाता। , जो की कांग्रेस के इशारों पर ही लिखवाई गयी थी तब तो हिन्दू भारत में दुसरे दर्जे के नागरिक ही बन जाते , हालाँकि अभी भी उसने कोई कमी नहीं रखी है
    याकूब के साथ सहानुभूति रखने वाले इन लोगों से कोई पूछे कि जिन 257 लोगों की मृत्यु हुई थी उनका क्या दोष था ? क्या उनके साथ इनकी सहानुभूति तब होती जब कि खुद इनके परिवार का कोई व्यक्ति इसका शिकार होता ?क्या उनका जीवन जीवन नहीं था? क्या उन्हें जीने का अधिकार नहीं था?रही न्याय की बात तो इसका विश्लेषण न्यायपालिका ही कर सकती है, हर व्यक्ति नहीं , अभी तो वे लोग भी इसकी आलोचना में जुटे हैं जिन्हें न्यायिक प्रकिर्या की पूरी सी जानकारी भी नहीं है
    यह केवल सुर्ख़ियों में बने रहने का मात्र एक मर्ज है , क्या ये अपने निजी जीवन में भी इतने मानवाधिकार वादी हैं ? इस हेतु खुद में झांक लेना चाहिए , सब मुखोटे लगा मीडिया में बने रहने के इच्छुक हैं और कुछ भी नहीं , इनकी कोई गरिमा नहीं ,कोई स्वाभिमान नहीं ,

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    • Shakil Sheikh

      आदरणीय महेंद्र गुप्ता जी,

      वैसे तो आंतकवाद को कोई धर्म नहीं होता लेकिन आंतकवाद को धर्मरुपी चश्मे से भी नहीं देखना चाहिए, आप 257 लोगो की मृत्यु पर तो सवाल कर रहे है लेकिन 909 लोगो की मृत्यु को भूल रहे है जो की 1992 – 93 मरे गए, क्युकी वो एक धर्म विशेष के थे ! फिर सवाल यह भी है की क्या सिर्फ याकूब मेमन ही आंतकवादी था ?? प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल प्रोहित, असीमानंद कौन है ?? क्या ये आंतकवादी नहीं है ??
      आप से विनती है की आंतकवाद को धर्मरुपी चश्मा न देखे आंतकवाद सिर्फ आंतकवाद है और उसकी सजा फ़ासी से काम नहीं है !!

      शकील शेख

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