दूध नहाए हैं सभी, फिर क्यों बिगड़े हाल?
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
सत्य छोड़कर चल दिए, छल की लेकर चाल।
फिर क्यों रोते घूमते, लेकर मन में ज्वाल॥
कर्मों का प्रतिफल मिला, कैसा फिरे मलाल—
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
नफ़रत के बीजों से कहाँ, उगते प्रेम-गुलाब।
काँटे ही काँटे मिले, सूख गए सब ख़्वाब॥
जैसी जिसकी सोच है, वैसा उसका हाल—
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
लोभ-मोह की आग में, जलते रहे उसूल।
स्वार्थों की आँधी चली, बिखर गए सब फूल॥
अपनों से ही दूर हो, कैसा यह भूचाल—
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
झूठ अगर सम्मान हो, सच हो जाए मौन।
फिर मत पूछो देश में, दोषी होगा कौन॥
नीति बिना समाज का, डगमग हर इक ताल—
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
‘सौरभ’ कर्मों का सदा, रहता सच्चा लेख।
समय कभी करता नहीं, पक्षपात या भेद॥
सत्य, दया, सद्कर्म से, सँवरें सबके हाल—
दूध नहाए हैं सभी, फिर क्यों बिगड़े हाल?
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
डॉ. सत्यवान सौरभ