लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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-सिद्धार्थ शंकर गौतम-   aap
2007 का क्रिकेट विश्वकप सभी के जेहन में ज़िंदा होगा, जब ग्रुप बी के दूसरे मैच में अपेक्षाकृत कमजोर बांग्लादेश की टीम ने 2003 की रनर-अप टीम इंडिया को 5 विकेट से हराकर सनसनी मचा दी थी| उस मैच के परिणामस्वरूप टीम इंडिया विश्वकप के पहले ही चरण से बाहर हो गई थी और बांग्लादेश की टीम अगले चरण में प्रवेश कर गई थी| इस मैच के परिणाम का दूसरा पहलू; बांग्लादेश की टीम अगले चरण में प्रवेश तो कर गई थी किन्तु 6 मैचों में से उसे मात्र एक जीत हासिल हुई| यहां तक कि खुद से कमजोर टीम आयरलैंड से भी वह मैच हार गई थी| इसका मतलब टीम इंडिया की बांग्लादेश के हाथों हार मात्र एक तुक्का थी| यानी बांग्लादेश ने टीम इंडिया की शुरुआत तो खराब की ही, खुद भी खिताब की दावेदार न बन सकी| यह कुछ-कुछ ऐसा ही है मानो; हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे| टीम केजरीवाल को देखकर मुझे बांग्लादेश क्रिकेट टीम की याद आती है| भानुमति का कुनबा बन चुकी टीम केजरीवाल भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर का ऐसा स्याह पक्ष है जो राजनीति को गर्त में धकेलने के सिवा कुछ नहीं कर रही| आम आदमी की राजनीति के नाम पर जो ढोंग का मुखौटा केजरीवाल ने पहन रखा था, अब धीरे-धीरे ही सही मगर उतर रहा है| पूर्व मंत्री डॉ. वालिया को हराकर विधायक बने विनोद कुमार बिन्नी की बगावत ने पार्टी के अंदरखाने की सड़ांध को बाहर निकाला है| अण्णा हज़ारे के कंधों का सहारा लेकर राजनीति की सीढ़ियां चढ़े केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री पद का सुख भोग रहे हैं जबकि पार्टी में आम आदमी की हैसियत सवालों के घेरे में है| टीम केजरीवाल में बिन्नी ही एकलौते चेहरे हैं जो दो बार पूर्व पार्षद रहे हैं और जिनकी खुद की राजनीतिक पहचान है| दिल्ली सरकार के गठन के वक़्त भी बिन्नी के बगावती सुर सामने आए थे पर चूंकि तब सत्ता की मलाई करीब थी; इसलिए केजरीवाल ने स्वयं मीडिया के समक्ष आकर बात संभाल ली थी| तब ऐसी चर्चा थी कि बिन्नी मंत्री न बनाए जाने को लेकर नाराज हैं जिसे केजरीवाल में खुद नकारा था| अब वही केजरीवाल बिन्नी मामले को मंत्री न बनाए जाने से उपजी नाराजगी बता रहे हैं| बिन्नी ने केजरीवाल के फैसलों से दुखी होकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो आरोप लगाए हैं, वे काफी हद तक सत्यता के करीब हैं| फिर बिन्नी ही क्यों; खबर है कि ‘आप’ के चार विधायक केजरीवाल की तानाशाही से दुखी होकर भाजपा के संपर्क में हैं| हाल ही में ‘आप’ कार्यकर्ता टीना शर्मा ने भी पार्टी की कार्यप्रणाली से लेकर कथनी-करनी के अंतर को सार्वजनिक किया था| यहां तक कि आगामी लोकसभा चुनाव के संभावित पांच प्रत्याशियों के नाम भी मीडिया में आ गए थे| टीना का भी आरोप था कि जब केजरीवाल और उनके कुछ ख़ास पार्टी के सभी फैसले बंद कमरों में ले लेते हैं तो जनता को बरगलाने का ढोंग क्यों? केजरीवाल के झूठ लगातार उजागर हो रहे हैं और मीडिया का एक तबका उन्हें अब भी आम आदमी का नायक घोषित किए हुए है। दिल्ली की जनता को 700 लीटर मुफ्त पानी देने के फैसले के पीछे केजरीवाल ने बड़ी चतुराई से जल बोर्ड के घाटे को पाटने का काम किया है| 700 लीटर से 1 लीटर भी अधिक पानी का इस्तेमाल दिल्ली की जनता को 701 लीटर पानी का बिल भरकर चुकाना होगा| वहीं मार्च 2013 में केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से वादा किया था कि उनके बढ़े हुए बिजली बिल वे माफ़ करवाएंगे; अब तक झूठ ही साबित हुआ है| छोटे-मोटे कवी सम्मेलनों की पहचान कुमार विश्वास आज केजरीवाल के सानिध्य में आकर बड़ा नाम हो गए हैं| पांच से 10 हज़ार रुपए प्रति कार्यक्रम लेने वाले विश्वास आज अनमोल हो गए हैं| केजरीवाल का उनपर अतिविश्वास भी किसी से छिपा नहीं है; दिल्ली सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप करते देखे जा सकते हैं| राखी बिड़ला से लेकर सोमनाथ भारती तक सत्ता के मद में चूर होकर आम आदमी को छल रहे हैं| क्या सत्ता का यही चरित्र दिखाने के लिए केजरीवाल ने आम आदमी के नाम को गाली दी? क्या कांग्रेस की बी टीम बनकर केजरीवाल एक तीर से दो निशाने नहीं साध रहे? केजरीवाल राजनीति के जिस कीचड में उतरकर उसकी सफाई करने निकले थे; खुद उसका हिस्सा बनकर आम आदमी की बेबसी पर कुटिल मुस्कान बिखेर रहे हैं|
जो लोग ‘आप’ को राजनीति का धूमकेतु मान बैठे थे अब सदमे में होंगे|  ‘आप’ को लेकर आम आदमी ने भी जिस तत्परता से जनादेश दिया वह चौंकाने वाला था| हालांकि यह सत्य है कि आम आदमी राजनीतिक दलों से आजिज आ चुका था किन्तु ‘आप’ जैसे नए-नवेले दल को जनादेश सौंपने के पीछे आम आदमी की क्या मजबूरी थी| दरअसल हम हिन्दुस्तानी भावुक होते हैं| भावना का हावी होना हमारी तार्किक क्षमताओं को खत्म कर देता है| केजरीवाल एंड पार्टी ने आम आदमी की उसी कमजोर नस को पकड़ा और सत्तासीन हो गए| जिस साफगोई से केजरीवाल पार्टी सफ़ेद झूठ बोलती है उसका वर्तमान राजनीति में कोई सानी नहीं है| दिल्ली की सत्ता से देश की सत्ता पर काबिज होने का उनका सपना एक ऐसे भारत निर्माण का खाका पेश कर रहा है जहां सिर्फ और सिर्फ धोखा है| आम आदमी परेशान है लेकिन ‘आप’ को जनसमर्थन उसे दूरगामी परिणामों के रूप में सिर्फ तकलीफ ही देगा| लोकसभा चुनाव के बाद यदि ‘आप’ के विधायक भाजपा या कांग्रेस में चल दें तो इस पार्टी का क्या अस्तित्व बचेगा? फिर ऐसा भी नहीं है कि 400 लोकसभा सीटों पर लड़कर ‘आप’ केंद्र में सत्तासीन हो ले| कुल मिलाकर ‘आप’ को मिलने वाले वोट कांग्रेस-भाजपा का खेल तो बिगाड़ सकते हैं मगर उसे सत्ता के शीर्ष तक नहीं पहुंचा सकते| और यह तथ्य देश का आम आदमी भी भली-भांति जानता है| तब एनजीओ रुपी संगठन से राजनीतिक पार्टी बनी ‘आप’ को इतना सर क्यों चढ़ाना? जब उनके पितामह अण्णा हज़ारे ने केजरीवाल एंड कंपनी पर भरोसा नहीं जताया तब आप और हम क्यों उनके झांसे में आएं| जो कॉर्पोरेट दिग्गज आज ‘आप’ से जुड़ रहे हैं, उन्हें एनजीओ की कमाई नज़र आ रही है वरना कलयुग में ऐसा कौन सरफिरा होगा जो लाखों-करोड़ों की कमाई छोड़कर सिर्फ आम आदमी के लिए राजनीति में आए? आम आदमी अपनी भावुकता पर लगाम लगाए और ‘आप’ जैसे संगठनों के झांसे में आए| यदि दिल्ली में कुछ समय बाद पुनः चुनाव होते हैं तो उस प्रक्रिया में लगने वाला धन आम आदमी का होगा| ऐसे में ‘आप’ को मिश्रित जनादेश सौंपकर आम आदमी आखिर क्या साबित करना चाहता है? चूचू का मुरब्बा बन चुकी ‘आप’ में मुझे तो कोई भविष्य नज़र नहीं आता और न ही देशहित की व्यापक सोच ही लक्षित होती है| हां, ‘आप’ को कितना सर-माथे बिठाना है यह अब उस आम आदमी को तय करना है जिसकी दम पर ‘आप’ सत्तासीन होते ही उसे भूल गई|

2 Responses to “‘आप’ से किसे है ‘आस’?”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    कुछ लोगों को पहले भी आप कि शक्ति नज़र नही आ रही थी और ८ दिसंबर को जब वोटो कि गिनती हुई तो इनकी आँखें फ्टी रेह गयी ये लोग एक बार फिर बीजेपी और कांग्रेस प्रेम में केजरीवाल को गलत आंक रहे हैं लोकसभा के चुनाव के बाद इनको फिर झटका लगेगा. आप की सरकार आम आदमी के हिसाब से चल रही है और उसके फैसले आम आदमी को पसंद भी आ रहे हैं मीडिया का बड़ा हिस्सा पूंजीवादी है इसलिए वो आप को बदनाम क्र रहा है.

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    आपने बहुत कुछ लिखा है.यह भी सही है कि अगर लोकसभा का चुनाव नजदीक नहीं होता तो आम आदमी पार्टी के लिए ऐंटि डेफ़ेक्शन क़ानून लागू होने केपहले भाजपा आआप के चार विधायक खरीद चुकी होती.लोकसभा के चुनाव के बाद ऐसा हो सकता है, यह हो सकता है कि आआप के बिन्नी जैसे लोगों को लोकसभा का टिकट न देना इसी आशंका के मद्दे नजर हो. बिन्नी के बारे में लिखने से पहले आपलोग उनके बारे में विस्तृत जानकारी लीजिये तब कुछ लिखिए. योही ढोल पीटने से कोई लाभ नहीं. रही बात टीना शर्मा की ,तो वे आआप में कब आयीं? उनको भाजपा का जासूस क्यों न माना जाए? पानी और बिजली के बारे में बहुत कुछ कहा गया है.बिन्नी आआप के कोर समिति के सदस्य हैं. क्या उन्होंने ये सब प्रश्न वहाँ उठाये थे? आआप ने चंद दिनों में जो किया है,वह अन्य सरकारें आज तक नहीं कर पायीं. ऐसे बिन्नी जब पहली बार २००७ में आर,डब्ल्यू .ए. के उम्मीदवार के रूप में किसी तरह जीते थे,तो वे चंद दिनों में ही बसपा में शामिल हो गए थे.बाद में न जाने क्यों वे वहाँ से हट कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे. कुछ कारण बस २०१२ में कांग्रेस ने उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं बनाया ,तो वे कांग्रेस छोड़कर फिर चुनाव लड़े और बहुकोणीय मुकाबले में थोड़े मार्जिन से फिर चुनाव जीत गए.अब वे फिर किसी पार्टी का सहारा ढूंढने लगे .बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा और एक नयी पार्टी आ गयी. कुछ कसमकस के बाद वे १५ मार्च को आआप में शामिल कर लिए गए. हो सकता है कि आपने जिस अनुभव का जिक्र किया है,उसी गलतफहमी में आआप ने उन्होंने हाथोहाथ उठा लिया और वे आआप के लिए राष्ट्रीय चेहरा बन गए.१५ मार्च के पहले न उन्होंने किसी आंदोलन में भाग लिया और न किसी धरने का हिस्सा बने. हाँ फर्रूखावाद अवश्य गए थे.

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