डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
भारत की स्वाधीनता अपने 79 बसंत पूर्ण कर 80 वें वर्ष में प्रवेश कर रहे है रही है। आज़ादी के 79 वर्ष के साथ-साथ भारत भी विश्व का युवा देश है। इसी बीच बीते एक दशक से भारत आंदोलन विहीन तो होता जा रहा था किन्तु बीतें दिनों नई दिल्ली के जंतर मंतर से युवाओं की अराजकता और अमर्यादित भाषा का दर्शन भी भारत ने किया। नीट पर्चा लिक होने वाले मुद्दे पर युवा जिन्हें जेन जी कह कर सम्बोधित किया जा रहा है वह जंतर-मंतर पर एकत्रित हुए, धीरे-धीरे उस छात्र आंदोलन में राजनैतिक लोगों का प्रवेश प्रारम्भ हुआ और एक दिन वह आंदोलन अराजक हो गया। उस आंदोलन के दौरान लड़के व लड़कियों ने जिस घटिया और नग्न भाषा का प्रयोग भारत के प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री के साथ-साथ सरकार के प्रति किया वह निश्चित रूप से भारत की तरुणाई के भाषाई और बौद्धिक पतन की ओर इशारा करती है।
दिल्ली के छात्र आंदोलन की पूरी संकल्पना और आधारभूत संरचना पर विचार किया जाएं तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि आंदोलन की दिशा जब से राजनीती से प्रेरित होने लगी, विकृत मानसिकता और राष्ट्रविरोधी तत्त्वों का समावेश होना प्रारम्भ हो गया। कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से बनें सोशल मीडिया मंच ने उस आंदोलन में पहले किसी राजनैतिक लोगों को घुसने नहीं दिया फिर अचानक से सरकार विरोधी तत्त्वों को आमंत्रित कर लिया, इसी के बाद आंदोलन सरकार विरोधी होते-होते अभद्र भाषा और देश विरोधी हो गया। इसके साथ वहाँ भाषा का स्तर इतना गिर गया कि लड़के और लड़कियाँ दोनों ही देश के प्रधानमंत्री और अन्य लोगों के विरदुद्ध गालियाँ और असामाजिक शब्दावलियों के प्रयोग पर आमादा हो गए।
छात्र आंदोलन के भड़कने का एक मुख्य कारण संवाद की कमी भी रहा, यदि समय रहते सरकार के लोग छात्रों से संवाद करते और उनकी मांग पर उचित बातचीत करते तो सम्भवतः छात्र इतना भी न भड़कते जो संसद मार्ग को बाधित करना या सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने की घटना को देश ने देखा। आज मुख्य समस्या संवाद की कमी की ही है। स्वाधीन भारत के शुभ दिवस पर हमें संकल्प यह भी लेना चाहिए कि देश में संवादहीनता न हो, युवा भारत, युवा सरकार जीतना सुनने में अच्छा लगता है उतना ही धरातल पर कार्यरत नज़र आना चाहिए। युवाओं के बीच राष्ट्र के विषयों को रखने वाले लोगों की बौद्धिक क्षमता का उपयोग कर सरकारें भी संवाद जारी रख सकती है। संवाद की कमी हमेशा किसी भी मुद्दें को आक्रामक बना देती है और यह दायित्व देश के नेताओं के साथ-साथ अफसरशाही का भी है।
किसी भी विषय पर सरकार और सरकार के नुमाइंदे यदि जन संवाद करते रहेंगे तो देशवासियों की पीड़ाओं से भी जुड़े रहेंगे और उन्हें हल करने की दिशा में भी आवश्यक प्रयास होंगे। चाहे जंतर मंतर हो चाहे झारखण्ड, आंदोलन करने वाले युवा भी इसी देश के निवासी है। वे जेन जी भटकाव की ओर तब मुड़ेंगे जब नीति निर्धारक उन्हें उपेक्षित रखकर उनकी बात तक सुनना बंद कर देंगे। भविष्य में इस तरह का जेन जी आंदोलन फिर न खड़ा हो इसके लिए इस युवा भारत को युवाओं से संवाद जारी रखना होगा।
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’